रजनीगन्धा खिले पराए आँगन में!

आज एक बार फिर से मैं हिन्दी के एक श्रेष्ठ गीतकार स्वर्गीय किशन सरोज जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| किशन सरोज जी ने अपने गीतों में प्रेम के सुकोमल भावों को बड़ी महारत के साथ अभिव्यक्त किया है|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय किशन सरोज का यह गीत–

मन की सीमा के पास-पास
तन की सीमा से दूर-दूर,
तुमने यों महकाईं मेरी सूनी गलियाँ
ज्यों रजनीगन्धा खिले पराए आँगन में।


भुजपाशों में भी सिहर उठे जब रोम-रोम
प्रियतम कहने में भी जब अधर थरथराएँ।
क्या होगा अन्त प्रीति का ऐसी तुम्हीं कहो
जब मिलने की वेला में भी दृग भर आएँ।

हृदय-स्पन्दन के पास-पास
दैहिक बन्धन से दूर-दूर,
तुम छोड गए यों प्राणों पर सुधि की छाया
ज्यों कोई रूप निहारे धुन्धले दर्पन में।


जीवन की सार्थकता है जब गति हो उसमें
अपना अनुभव कह लो या सन्तों की बानी।
जब तक बहता है तब तक ही पावनता है
जमुना-जल हो नयनों का खारा पानी।

अन्तर्दाहों के पास-पास
सुख की चाहों से दूर-दूर,
तुमने यों विवश किया जीवन भर जीने को
ज्यों आग कहीं लग जाए किसी गीले वन में।

सम्भव है कभी सुधर जाए संकेतों से
राहों में यदि भटकाए भूल निगाहों की।
पर जब साँसों में भी घुल जाए अँधियारा
रोशनी नहीं, है वहाँ ज़रूरत बाँहों की।


तम की देहरी के पास-पास
स्वर के प्रहरी से दूर-दूर,
यों धीर बँधाते रहे विलग रहकर भी तुम
ज्यों नदी पार दीवा जलता हो निर्जन में।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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