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एक नहीं मिलता जो प्यार से पुकारे!

हिन्दी काव्य मंचों के एक श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक साहित्यिक गीत आज शेयर कर रहा हूँ| अवस्थी जी का यह गीत बहुत लोकप्रिय रहा है और जीवन, उसके एकाकीपन के बारे में कुछ बहुत सुंदर अभिव्यक्तियाँ इस गीत में हैं|


लीजिए प्रस्तुत है यह प्यारा सा गीत-

भीड़ में भी रहता हूँ वीरान के सहारे
जैसे कोई मंदिर किसी गाँव के किनारे।


जाना-अनजाना शोर आता बिन बुलाए,
जीवन की आग को आवाज में छुपाए|
दूर-दूर काली रात साँय-साँय करती,
मन में न जाने कैसे कैसे रंग भरती|
अनजाना, अनचाहा अंधकार बार-बार,
करता है तारों से न जाने क्या इशारे।


चारों ओर बिखरे हैं धूल भरे रास्ते,
पता नहीं कौन इनमें है मेरे वास्ते|
जाने कहाँ जाने के लिए हूँ यहाँ आया,
किसी देवी-देवता ने नहीं ये बताया|
मिलने को मिलता है सारा ही ज़माना,
एक नहीं मिलता जो प्यार से पुकारे।


तन चाहे कहीं भी हो मन है सफ़र में,
हुआ मैं पराया जैसे अपने ही घर में|
सूरज की आग मेरे साथ-साथ चलती,
चाँदनी से मिली-जुली रात मुझे छलती|
तन की थकन तो उतार दी है पथ ने,
जाने कौन मन की थकन को उतारे।


कोई नहीं लगा मुझे अपना पराया,
दिल से मिला जो उसे दिल से लगाया|
भेदभाव नहीं किया शूल या सुमन से,
पाप-पुण्य जो भी किया, किया पूरे मन से|
जैसा भी हूँ, वैसा ही हूँ समय के सामने,
चाहे मुझे प्यार करे, चाहे मुझे मारे।



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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बूंद बन-बन टूट जाऊँगा वहां

हिन्दी के गीत- कविता संसार के एक और अनमोल रत्न स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी को आज याद कर रहा हूँ| पहले भी इनके कुछ गीत मैंने शेयर किए है| भावुकता का अजीब संसार होता है इन लोगों के पास, जिसमें ये जीते हैं और अपनी अनूठी अनुभूतियों से हमें परिचित कराते हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का यह गीत-  
              

प्यार से मुझको बुलाओगे जहां,                                                                 एक क्या सौ बार आऊँगा वहां|

पूछने की है नहीं फ़ुर्सत मुझे,
कौन हो तुम क्या तुम्हारा नाम है|
किसलिए मुझको बुलाते हो कहां,
कौन सा मुझसे तुम्हारा काम है|


फूल से तुम मुस्कुराओगे जहाँ,
मैं भ्रमर सा गुनगुनाऊँगा वहां|

कौन मुझको क्या समझता है यहां,
आज तक इस पर कभी सोचा नहीं|
आदमी मेरे लिए सबसे बड़ा,
स्वर्ग में या नरक में वह हो कहीं|


आदमी को तुम झुकाओगे जहां,
प्राण की बाजी लगाऊँगा वहां|

जानता हूँ एक दिन मैं फूल-सा,
टूट जाऊँगा बिखरने के लिए|
फिर न आऊंगा तुम्हारे रूप की,
रौशनी में स्नान करने के लिए|


किन्तु तुम मुझको भुलाओगे जहां,
याद अपनी मैं दिलाऊँगा वहां|

मैं नहीं कहता कि तुम मुझको मिलो,
और मिलकर दूर फिर जाओ चले|
चाहता हूँ मैं तुम्हें देखा करूं,
बादलों से दूर जा नभ के तले|


सर उठाकर तुम झुकाओगे जहां,
बूंद बन-बन टूट जाऊँगा वहां|


आज के लिए इतना ही, नमस्कार|

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मौसम नहीं, मन चाहिए !

एक बार फिर से आज हिन्दी काव्य मंचों पर गीत परंपरा के एक लोकप्रिय स्वर रहे, स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| इस गीत में यही संदेश दिया गया है कि अगर हमारे हौसले बुलंद हों, अगर हमारे मन में पक्का संकल्प हो तो हम कुछ भी कर सकते हैं, किसी भी चुनौती का मुक़ाबला कर सकते हैं|

लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक लोकप्रिय गीत-

कुछ कर गुज़रने के लिये मौसम नहीं, मन चाहिए !

थककर बैठो नहीं प्रतीक्षा कर रहा कोई कहीं,
हारे नहीं जब हौसले
तब कम हुये सब फासले,
दूरी कहीं कोई नहीं, केवल समर्पण चाहिए !

कुछ कर गुज़रने के लिये मौसम नहीं, मन चाहिए !

हर दर्द झूठा लग रहा, सहकर मजा आता नहीं,
आँसू वही आँखें वही
कुछ है ग़लत कुछ है सही,
जिसमें नया कुछ दिख सके, वह एक दर्पण चाहिए !

कुछ कर गुज़रने के लिये मौसम नहीं, मन चाहिए !

राहें पुरानी पड़ गईं, आख़िर मुसाफ़िर क्या करे !
सम्भोग से सन्यास तक
आवास से आकाश तक,
भटके हुये इन्सान को, कुछ और जीवन चाहिए !

कुछ कर गुज़रने के लिये मौसम नहीं, मन चाहिए !

कोई न हो जब साथ तो, एकान्त को आवाज़ दें !
इस पार क्या उस पार क्या !
पतवार क्या मँझधार क्या !!
हर प्यास को जो दे डुबा वह एक सावन चाहिए !

कुछ कर गुज़रने के लिये मौसम नहीं, मन चाहिए !

कैसे जियें कैसे मरें यह तो पुरानी बात है !
जो कर सकें आओ करें
बदनामियों से क्यों डरें,
जिसमें नियम-संयम न हो, वह प्यार का क्षण चाहिए!

कुछ कर गुज़रने के लिये मौसम नहीं, मन चाहिए !

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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हम उसी प्यास के समन्दर थे !

आज मैं हिन्दी गीत कविता के एक प्रमुख हस्ताक्षर रहे स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| अवस्थी जी अत्यंत भावुक और सृजनशील कवि थे और उनको कवि सम्मेलनों में बहुत आदर के साथ सुना जाता था|

अवस्थी जी का यह गीत भी एक अलग प्रकार के अनुभव को चित्रित करता है, कैशौर्य और युवावस्था के वे बेफिक्री भरे दिन, अलग ही तरह के होते हैं| लीजिए इस गीत का आनंद लीजिए-

 

 

याद आते हैं फिर बहुत वे दिन
जो बड़ी मुश्किलों से बीते थे !

 

शाम अक्सर ही ठहर जाती थी
देर तक साथ गुनगुनाती थी !
हम बहुत ख़ुश थे, ख़ुशी के बिन भी
चाँदनी रात भर जगाती थी !

 

हमको मालूम है कि हम कैसे
आग को ओस जैसे पीते थे !

 

घर के होते हुए भी बेघर थे
रात हो, दिन हो, बस हमीं भर थे !
डूब जाते थे मेघ भी जिसमें
हम उसी प्यास के समन्दर थे !

 

उन दिनों मरने की न थी फ़ुरसत,
हम तो कुछ इस तरह से जीते थे !

 

आते-जाते जो लोग मिलते थे
उनके मिलने में फूल खिलते थे !
ज़िन्दगी गंगा जैसी निर्मल थी,
जिसमें हम नाव जैसे चलते थे !

 

गंगा की ऊँची-नीची लहरों से
हम कभी आगे कभी पीछे थे !

 

कोई मौसम हो हम उदास न थे
तंग रहते थे, पर निराश न थे !
हमको अपना बना के छोड़े जो
हम किसी ऐसे दिल के पास न थे !

 

फूल यादों के जल गए कब के
हमने जो आँसुओं से सींचे थे ।

 

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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