मन!

आज फिर से एक बार मैं स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ, अवस्थी जी बहुत सरल भाषा में सहजता से अपनी बात कहते थे, जैसे मन से मन का संवाद हो|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का यह गीत –

मन को वश में करो
फिर चाहे जो करो ।

कर्ता तो और है
रहता हर ठौर है
वह सबके साथ है
दूर नहीं पास है
तुम उसका ध्यान धरो ।
फिर चाहे जो करो ।

सोच मत बीते को
हार मत जीते को
गगन कब झुकता है
समय कब रुकता है
समय से मत लड़ो ।
फिर चाहे जो करो ।


रात वाला सपना
सवेरे कब अपना
रोज़ यह होता है
व्यर्थ क्यों रोता है
डर के मत मरो ।
फिर चाहे जो करो ।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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चंदन है तो महकेगा ही!

एक बार फिर से मैं आज स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| रमानाथ अवस्थी जी एक श्रेष्ठ गीतकार थे और उन्होंने मन की कोमल भावनाओं को हमेशा बहुत सुंदर तरीके से व्यक्त किया है|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का यह गीत –


चंदन है तो महकेगा ही
आग में हो या आँचल में|

छिप न सकेगा रंग प्यार का
चाहे लाख छिपाओ तुम
कहने वाले सब कह देंगे
कितना ही भरमाओ तुम
घुंघरू है तो बोलेगा ही
सेज में हो या साँकल में|

अपना सदा रहेगा अपना
दुनिया तो आनी जानी
पानी ढूँढ़ रहा प्यासे को
प्यासा ढूँढ़ रहा पानी
पानी है तो बरसेगा ही
आँख में हो या बादल में|


कभी प्यार से कभी मार से
समय हमें समझाता है
कुछ भी नहीं समय से पहले
हाथ किसी के आता है
समय है तो वह गुज़रेगा ही
पथ में हो या पायल में|

बड़े प्यार से चाँद चूमता
सबके चेहरे रात भर
ऐसे प्यारे मौसम में भी
शबनम रोई रात भर
दर्द है तो वह दहकेगा ही
घन में हो या घानल में|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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कभी कभी !

हिन्दी काव्य मंचों के अत्यंत कुशल गीतकार स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी के कुछ गीत मैंने पहले भी शेयर किए हैं, हिन्दी गीत साहित्य में उनका अमूल्य योगदान रहा है|
आज मैं स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूं-

कभी कभी जब मेरी तबियत
यों ही घबराने लगती है,
तभी ज़िन्दगी मुझे न जाने
क्या-क्या समझाने लगती है|

रात, रात भर को ही मिलती
दिन भी मिलता दिन भर को,
कोई पूरी तरह न मिलता
रमानाथ लौटो घर को|

घर भी बिन दीवारों वाला
जिसकी कोई राह नहीं,
पहुँच सका तो पहुँचूँगा मैं
वैसे कुछ परवाह नहीं|


मंज़िल के दीवाने मन पर
जब दुविधा छाने लगती है,
तभी ज़िन्दगी मुझे न जाने
क्या-क्या समझाने लगती है|

पूरी होने की उम्मीद में
रही सदा हर नींद अधूरी,
तन चाहे जितना सुंदर हो
मरना तो उसकी मज़बूरी|

मज़बूरी की मार सभी को
मज़बूरन सहनी पड़ती है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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इंसान!

एक बार फिर से आज मैं, अपने समय के प्रमुख गीत कवियों में शामिल और कवि सम्मेलनों में अपने गीतों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करने वाले स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| इस गीत में कुछ उदाहरण देकर यह बताया गया है इंसान को कैसा होना चाहिए, वास्तव में हम सीखना चाहें तो जीवन में किसी से भी सीख सकते हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का यह गीत-


मैंने तोड़ा फूल, किसी ने कहा-
फूल की तरह जियो औ मरो
सदा इंसान ।

भूलकर वसुधा का शृंगार,
सेज पर सोया जब संसार,
दीप कुछ कहे बिना ही जला-
रातभर तम पी-पीकर पला-
दीप को देख, भर गए नयन
उसी क्षण-
बुझा दिया जब दीप, किसी ने कहा
दीप की तरह जलो, तम हरो
सदा इंसान ।

रात से कहने मन की बात,
चँद्रमा जागा सारी रात,
भूमि की सूनी डगर निहार,
डाल आँसू चुपके दो-चार

डूबने लगे नखत बेहाल
उसी क्षण-
छिपा गगन में चाँद, किसी ने कहा-
चाँद की तरह, जलन तुम हरो
सदा इंसान।

साँस-सी दुर्बल लहरें देख,
पवन ने लिखा जलद को लेख,
पपीहा की प्यासी आवाज़,
हिलाने लगी इंद्र का राज,

धरा का कण्ठ सींचने हेतु
उसी क्षण –
बरसे झुक-झुक मेघ, किसी ने कहा-
मेघ की तरह प्यास तुम हरो
सदा इंसान ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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ऐसा कभी होगा नहीं!

स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी अपने समय में हिन्दी काव्य मंच के एक प्रमुख हस्ताक्षर थे, जिन लोगों को गीत पढ़ने और सुनने का शौक है उनको हमेशा अवस्थी जी के नए गीत सुनने की भी लालसा रहती थी| अवस्थी जी के अनेक गीत मुझे प्रिय रहे हैं और मैंने शेयर भी किए हैं, जैसे एक है ‘सो न सका मैं, याद तुम्हारी आई सारी रात, और पास ही बजी कहीं शहनाई सारी रात‘, ‘चाहे मकान का हो, चाहे मसान का हो, धुएं का रंग एक है‘ आदि|

लीजिए आज प्रस्तुत है रमानाथ अवस्थी जी का एक और लोकप्रिय गीत, जिसमें उन्होंने अपने अनूठे अंदाज़ में अभिव्यक्ति की है-


ऐसा कहीं होता नहीं
ऐसा कभी होगा नहीं।

धरती जले बरसे न घन,
सुलगे चिता झुलसे न तन।
औ ज़िंदगी में हों न ग़म।

ऐसा कभी होगा नहीं
ऐसा कभी होता नहीं।

हर नींद हो सपनों भरी,
डूबे न यौवन की तरी,
हरदम जिए हर आदमी,
उसमें न हो कोई कमी।

ऐसा कभी होगा नहीं,
ऐसा कभी होता नहीं।


सूरज सुबह आए नहीं,
औ शाम को जाए नहीं।
तट को न दे चुम्बन लहर
औ मृत्यु को मिल जाए स्वर।

ऐसा कभी होगा नहीं
ऐसा कभी होता नहीं।

दुख के बिना जीवन कटे,
सुख से किसी का मन हटे।
पर्वत गिरे टूटे न कन,
औ प्यार बिन जी जाए मन।

ऐसा कभी होगा नहीं
ऐसा कभी होता नहीं।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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अँधेरे का सफ़र मेरे लिए है!

एक बार फिर से आज, हिन्दी कवि सम्मेलनों को अपने सुरीले गीतों से चमत्कृत करने वाले स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ|


अवस्थी जी की काव्य मंचों पर अपनी एक अलग पहचान थी, मुझे आशा है कि आपको यह गीत भी अलग तरह का लगेगा-

तुम्‍हारी चाँदनी का क्‍या करूँ मैं,
अँधेरे का सफ़र मेरे लिए है|

किसी गुमनाम के दुख-सा
अजाना है सफ़र मेरा,
पहाड़ी शाम-सा तुमने
मुझे वीरान में घेरा|


तुम्‍हारी सेज को ही क्‍यों सजाऊँ,
समूचा ही शहर मेरे लिए है|

थका बादल, किसी सौदामिनी
के साथ सोता है,
मगर इंसान थकने पर
बड़ा लाचार होता है|


गगन की दामिनी का क्‍या करूँ मैं,
धरा की हर डगर मेरे लिए है|

किसी चौरास्‍ते की रात-सा
मैं सो नहीं पाता,
किसी के चाहने पर भी
किसी का हो नहीं पाता|

मधुर है प्‍यार, लेकिन क्‍या करूँ मैं,
जमाने का ज़हर मेरे लिए है|


नदी के साथ मैं, पहुँचा
किसी सागर किनारे,
गई ख़ुद डूब, मुझको
छोड़ लहरों के सहारे|

निमंत्रण दे रही लहरें करूँ क्‍या,
कहाँ कोई भँवर मेरे लिए है ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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आज मन भारी है!

स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी के अनेक गीत मैंने पहले शेयर किए हैं, आज एक और गीत शेयर कर रहा हूँ| अवस्थी जी भावुकता के अर्थात मन के कवि थे| कोई कवि अपनी कविताओं में वीरता बघार सकता है, परंतु मन की बात तो उसको भावुक होकर ही कहानी होगी|

लीजिए प्रस्तुत है मन के व्यथित अथवा किसी भी कारण से, भारी होने की स्थिति का यह गीत-

न जाने क्या लाचारी है
आज मन भारी-भारी है

हृदय से कहता हूँ कुछ गा
प्राण की पीड़ित बीन बजा
प्यास की बात न मुँह पर ला


यहाँ तो सागर खारी है
न जाने क्या लाचारी है
आज मन भारी-भारी है

सुरभि के स्वामी फूलों पर
चढ़ाए मैंने जब कुछ स्वर
लगे वे कहने मुरझाकर


ज़िन्दगी एक खुमारी है
न जाने क्या लाचारी है
आज मन भारी-भारी है

नहीं है सुधि मुझको तन की
व्यर्थ है मुझको चुम्बन भी
अजब हालत है जीवन की


मुझे बेहोशी प्यारी है
न जाने क्या लाचारी है
आज मन भारी-भारी है

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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दर्द भी सहे हैं होकर के मशहूर!

हिन्दी के एक प्रतिष्ठित और लोकप्रिय गीतकार हैं स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक और गीत आज शेयर कर रहा हूँ| अवस्थी जी मन के बहुत सुकोमल भावों को बहुत बारीकी से अभिव्यक्त कराते थे और कवि सम्मेलनों में बहुत लोकप्रिय थे|

जैसा कहते हैं, जीवन का नाम ही चलना है, हम एक जगह नहीं ठहर सकते, बहुत से दायित्व, वचन बद्धताएँ हमें निरंतर पुकारती रहती हैं| लीजिए इसी संदर्भ में इस रचना का आनंद लीजिए-

रोको मत जाने दो जाना है दूर|

वैसे तो जाने को मन ही होता नहीं,
लेकिन है कौन यहाँ जो कुछ खोता नहीं
तुमसे मिलने का मन तो है मैं क्या करूँ?
बोलो तुम कैसे कब तक मैं धीरज धरूँ ।
मुझसे मत पूछो मैं कितना मज़बूर ।

रोको मत जाने दो जाना है दूर|


अनगिन चिंताओं के साथ खड़ा हूँ यहाँ
पूछता नहीं कोई जाऊँगा मैं कहाँ ?
तन की क्या बात मन बेहद सैलानी है
कर नहीं पाता मन अपनी मनमानी है ।
दर्द भी सहे हैं होकर के मशहूर|

रोको मत जाने दो जाना है दूर|


अब नहीं कुछ भी पाने को मन करता
कभी-कभी जीवन भी मुझको अखरता|
साँस का ठिकाना क्या आए न आए
यह बात कौन किसे कैसे समझाए|
होना है जो भी वह होगा ज़रूर ।

रोको मत जाने दो जाना है दूर ।


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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सुन ले खेतों के राजा, घर की रानी !

आज फिर से मैं हिन्दी काव्य मंचों के एक प्रमुख हस्ताक्षर रहे स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| इस रचना में अवस्थी जी ने यही व्यक्त किया है कि हमारी व्यक्तिगत आस्थाएँ, आकांक्षाएँ और धार्मिक रुझान कुछ भी हों, हमारे लिए सबसे पहले देश का स्थान है|

लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी की यह रचना-



जो आग जला दे भारत की ऊँचाई,
वह आग न जलने देना मेरे भाई ।

तू पूरब का हो या पश्चिम का वासी
तेरे दिल में हो काबा या हो काशी
तू संसारी हो चाहे हो सन्यासी
तू चाहे कुछ भी हो पर भूल नहीं
तू सब कुछ पीछे, पहले भारतवासी ।

उन सबकी नज़रें आज हमीं पर ठहरीं
जिनके बलिदानों से आज़ादी आई ।


जो आग जला दे भारत की ऊँचाई,
वह आग न जलने देना मेरे भाई ।

तू महलों में हो या हो मैदानों में
तू आसमान में हो या तहखानों में
पर तेरा भी हिस्सा है बलिदानों में
यदि तुझमें धड़कन नहीं देश के दुख की
तो तेरी गिनती होगी हैवानों में ।

मत भूल कि तेरे ज्ञान सूर्य ने ही तो
दुनिया के अँधियारे को राह दिखाई ।


जो आग जला दे भारत की ऊँचाई,
वह आग न जलने देना मेरे भाई ।

तेरे पुरखों की जादू भरी कहानी
गौतम से लेकर गाँधी तक की वाणी
गंगा जमना का निर्मल-निर्मल पानी
इन सब पर कोई आँच न आने पाए
सुन ले खेतों के राजा, घर की रानी ।

भारत का भाल दिनों-दिन जग में चमके
अर्पित है मेरी श्रद्धा और सच्चाई ।


जो आग जला दे भारत की ऊँचाई,
वह आग न जलने देना मेरे भाई ।

आज़ादी डरी-डरी है आँखें खोलो
आत्मा के बल को फिर से आज टटोलो
दुश्मन को मारो, उससे मत कुछ बोलो
स्वाधीन देश के जीवन में अब फिर से
अपराजित शोणित की रंगत को घोलो ।

युग-युग के साथी और देश के प्रहरी
नगराज हिमालय ने आवाज़ लगाई ।


जो आग जला दे भारत की ऊँचाई,
वह आग न जलने देना मेरे भाई ।


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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सौ बातों की एक बात है !

लीजिए आज फिर से मैं कभी काव्य-मंचों के अत्यंत लोकप्रिय कवि रहे स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ, जिसमें उन्होंने बड़ी भावुकता के साथ यह चित्रण किया है, कि किस प्रकार हमको जीवन के सभी रंगों, सभी प्रकार की परिस्थितियों, कभी साथ और कभी अकेलेपन का सामना करना पड़ता है|

लीजिए आज प्रस्तुत कर रहा हूँ स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का यह गीत-



सौ बातों की एक बात है ।

रोज़ सवेरे रवि आता है।
दुनिया को दिन दे जाता है,
लेकिन जब तम इसे निगलता,
होती जग में किसे विकलता|
सुख के साथी तो अनगिन हैं,
लेकिन दुःख के बहुत कठिन हैं|

सौ बातो की एक बात है |


अनगिन फूल नित्य खिलते हैं,
हम इनसे हँस-हँस मिलते हैं|
लेकिन जब ये मुरझाते हैं,
तब हम इन तक कब जाते हैं|
जब तक हममे साँस रहेगी,
तब तक दुनिया पास रहेगी|

सौ बातों की एक बात है |


सुन्दरता पर सब मरते हैं,
किन्तु असुंदर से डरते हैं|
जग इन दोनों का उत्तर है,
जीवन इस सबके ऊपर है|
सबके जीवन में क्रंदन है,
लेकिन अपना-अपना मन है|

सौ बातों की एक बात है ।



आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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