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चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ!

हिन्दी काव्य मंचों के एक अत्यंत लोकप्रिय कवि रहे स्वर्गीय रामावतार त्यागी जी का एक प्रसिद्ध गीत आज शेयर कर रहा हूँ, जिसमें कवि ऐसे भाव व्यक्त करता है कि अपने महान राष्ट्र के लिए सब कुछ समर्पित करने के बाद भी हम उसका ऋण नहीं उतार सकते|


लीजिए प्रस्तुत है राष्ट्रप्रेम की भावना से भरपूर यह गीत –



मन समर्पित, तन समर्पित,
और यह जीवन समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।

माँ तुम्‍हारा ऋण बहुत है, मैं अकिंचन,
किंतु इतना कर रहा, फिर भी निवेदन-
थाल में लाऊँ सजाकर भाल मैं जब भी,
कर दया स्‍वीकार लेना यह समर्पण।


गान अर्पित, प्राण अर्पित,
रक्‍त का कण-कण समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।

माँज दो तलवार को, लाओ न देरी,
बाँध दो कसकर, कमर पर ढाल मेरी,
भाल पर मल दो, चरण की धूल थोड़ी,
शीश पर आशीष की छाया धनेरी।


स्‍वप्‍न अर्पित, प्रश्‍न अर्पित,
आयु का क्षण-क्षण समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।

तोड़ता हूँ मोह का बंधन, क्षमा दो,
गाँव मेरे, द्वार-घर मेरी, ऑंगन, क्षमा दो,
आज सीधे हाथ में तलवार दे-दो,
और बाऍं हाथ में ध्‍वज को थमा दो।


सुमन अर्पित, चमन अर्पित,
नीड़ का तृण-तृण समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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मेरी थकन उतर जाती है!

हिन्दी काव्य मंचों के प्रमुख एवं लोकप्रिय कवियों की रचनाएँ प्रस्तुत करने के क्रम में आज मैं स्वर्गीय रामावतार त्यागी जी का एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| रामावतार त्यागी जी स्वाभिमान से भरी, एवं ओजपूर्ण कविताएं लिखने के लिए विख्यात थे|


लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय रामावतार त्यागी जी का यह गीत- –

हारे थके मुसाफिर के चरणों को धोकर पी लेने से,
मैंने अक्सर यह देखा है, मेरी थकन उतर जाती है।

कोई ठोकर लगी अचानक, जब-जब चला सावधानी से,
पर बेहोशी में मंजिल तक, जा पहुँचा हूँ आसानी से,
रोने वाले के अधरों पर, अपनी मुरली धर देने से,
मैंने अक्सर यह देखा है, मेरी तृष्णा मर जाती है॥


प्यासे अधरों के बिन परसे, पुण्य नहीं मिलता पानी को,
याचक का आशीष लिये बिन, स्वर्ग नहीं मिलता दानी को,
खाली पात्र किसी का अपनी, प्यास बुझा कर भर देने से,
मैंने अक्सर यह देखा है, मेरी गागर भर जाती है॥

लालच दिया मुक्ति का जिसने, वह ईश्वर पूजना नहीं है,
बन कर वेदमंत्र-सा मुझको, मंदिर में गूँजना नहीं है,
संकटग्रस्त किसी नाविक को, निज पतवार थमा देने से,
मैंने अक्सर यह देखा है ,मेरी नौका तर जाती है॥


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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आँचल बुनते रह जाओगे!

लीजिए आज प्रस्तुत है, स्वर्गीय रामावतार त्यागी जी का लिखा एक सुंदर गीत| रामावतार त्यागी जी किसी समय हिन्दी कवि सम्मेलनों में गूंजने वाला एक प्रमुख स्वर हुआ करते थे| यह गीत भी उनकी रचनाशीलता का एक उदाहरण है-

मैं तो तोड़ मोह के बंधन
अपने गाँव चला जाऊँगा,
तुम आकर्षक सम्बन्धों का,
आँचल बुनते रह जाओगे|

मेला काफी दर्शनीय है
पर मुझको कुछ जमा नहीं है,
इन मोहक कागजी खिलौनों में
मेरा मन रमा नहीं है|


मैं तो रंगमंच से अपने
अनुभव गाकर उठ जाऊँगा,
लेकिन, तुम बैठे गीतों का
गुँजन सुनते रह जाओगे|

आँसू नहीं फला करते हैं
रोने वाले क्यों रोता है?
जीवन से पहले पीड़ा का,
शायद अंत नहीं होता है|


मैं तो किसी सर्द मौसम की
बाँहों में मुरझा जाऊँगा,
तुम केवल मेरे फूलों को
गुमसुम चुनते रह जाओगे|

मुझको मोह जोड़ना होगा
केवल जलती चिंगारी से,
मुझसे संधि नहीं हो पाती
जीवन की हर लाचारी से|


मैं तो किसी भँवर के कंधे
चढकर पार उतर जाऊँगा,
तट पर बैठे इसी तरह से
तुम सिर धुनते रह जाओगे|

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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प्रश्न किया है मेरे मन के मीत ने!

आज मैं हिन्दी काव्य मंचों के ओजस्वी कवि स्वर्गीय रामावतार त्यागी जी का एक अत्यंत प्रभावशाली गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| त्यागी जी जुझारूपन से भरे गीतों के लिए प्रसिद्ध रहे हैं, परंतु यह अत्यंत रूमानी और भावपूर्ण गीत है|

लीजिए इस गीत का आनंद लीजिए-

 

 

प्रश्न किया है मेरे मन के मीत ने,
मेरा और तुम्हारा क्या संबंध है|

 

वैसे तो संबंध कहा जाता नहीं
व्यक्त अगर हो जाए तो नाता नहीं,
किन्तु सुनो लोचन को ढाँप दुकूल से
जो संबंध सुरभि का होता फूल से,
मेरा और तुम्हारा वो संबंध है|

 

मेरा जन्म दिवस ही जग का जन्म है,
मेरे अन्त दिवस पर दुनिया खत्म है,
आज बताता हूँ तुमको ईमान से
जो संबंध कला का है इंसान से,
मेरा और तुम्हारा वो संबंध है|

 

मैं न किसी की राजनीति का दाँव हूँ
दे दो जिसको दान न ऐसा गाँव हूँ,
झूठ कहूँगा तो कहना किस काम का
जो संबंध प्रगति का और विराम का,
मेरा और तुम्हारा वो संबंध है|

 

करता हूँ मैं प्यार सुनाता गीत हूँ
जीवन मेरा नाम सृजन का मीत हूँ,
और निकट आ जाओ सुनो न दूर से
जो संबंध स्वयंवर का सिन्दूर से,
मेरा और तुम्हारा वो संबंध है|

 

मैं रंगीन उमंगों का समुदाय हूँ
सतरंगी गीतों का एक निकाय हूँ,
और कहूँ क्या तुम हो रहे उदास से
जो संबंध समर्पण का विश्वास से,
मेरा और तुम्हारा वो संबंध है|

 

प्रश्न किया मेरे मन के मीत ने
मेरा और तुम्हारा क्या संबंध है|

 

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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