कलम सरकंडे की!

श्री रामदरश मिश्र जी हिन्दी के उन श्रेष्ठ श्रेष्ठ रचनाकारों में से एक हैं, जिन्होंने कविता, कहानी और उपन्यास सभी क्षेत्रों में अपनी रचनाओं के माध्यम से उल्लेखनीय योगदान किया है|

लीजिए आज प्रस्तुत है, श्री रामदरश मिश्र जी की यह कविता जो कविधर्म की ओर बड़े सधे और शालीन ढंग से स्पष्ट संकेत करती है –

हमारे हाथ में सोने की नहीं
सरकंडे की कलम है।

सरकंडे की कलम
खूबसूरत नहीं, सही लिखती है
वह विरोध के मंच लिखती है
प्रशस्ति-पत्र नहीं लिखती है

हम कठघरे में खड़े हैं, खड़े रहेंगे
और कठघरे में खड़े हर उठे हुए हाथ को
अपने हाथ में ले लेंगे

राजा कौरव हों या पांडव—
हम तो सदा वनवास ही झेलेंगे।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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यह कवि का घर है !

डॉ रामदरश मिश्र जी, जिनकी रचना मैं आज शेयर कर रहा हूँ, वे हिन्दी के प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं और कविता, कहानी तथा उपन्यास लेखन, सभी क्षेत्रों में समान रूप से सक्रिय एवं सम्मानित हैं|

आज की उनकी इस रचना में भी उन्होंने कवि की अलग प्रकार की दृष्टि और दर्शन का परिचय दिया है-



गेंदे के बड़े-बड़े जीवंत फूल
बेरहमी से तोड़ लिए गए
और बाज़ार में आकर बिकने लगे|

बाज़ार से ख़रीदे जाकर वे
पत्थर के चरणों पर चढ़ा दिए गए,
फिर फेंक दिए गए कूड़े की तरह|

मैं दर्द से भर आया
और उनकी पंखुड़ियाँ रोप दीं
अपनी आँगन-वाटिका की मिट्टी में,
अब वे लाल-लाल, पीले-पीले, बड़े-बड़े फूल बनकर
दहक रहे हैं|


मैं उनके बीच बैठकर उनसे संवाद करता हूँ,
वे अपनी सुगंध और रंगों की भाषा में
मुझे वसंत का गीत सुनाते हैं|


और मैं उनसे कहता हूँ —
जीओ मित्रो !
पूरा जीवन जीओ उल्लास के साथ,
अब न यहाँ बाज़ार आएगा
और न पत्थर के देवता पर तुम्हें चढ़ाने के लिए धर्म,
यह कवि का घर है !



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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