चुलबुली किरण!

आज एक बार फिर मैं अपने अत्यंत प्रिय नवगीत कवि स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ, रंजक जी हिन्दी नवगीत साहित्य की ऐसी अदभुद प्रतिभा थे जिन्होंने और भी बहुत से रचनाकारों को नवगीत लिखने के लिए प्रेरित किया|

लीजिए, आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत –

कितनी खुली हुई है सबसे
ये चुलबुली किरन
(भोर की ये चुलबुली किरन)

घर-घर जाकर भीतर-बाहर
खींच रही है सबकी चादर
हर सोए की खाट उठाकर
फिर हो गई हिरन

घूम रही घर-घर में से
सारे घर इसके हों जैसे
खुल कर रही कैसे-कैसे
डर की नहीं शिकन

स्याही कोनों में सरका दी
चौंके की कुण्डी खड़का दी
ये आज़ादी की शहज़ादी
(बाँध रही छत के छिद्रों में)
टूटे हुए रिबन|


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

सतरंगी तितली!

आज एक बार फिर मैं अपने अत्यंत प्रिय नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक सुंदर नवगीत शेयर कर रहा हूँ| जैसा मैंने पहले भी उल्लेख किया है रंजक जी को काव्य-पाठ करते हुए सुनने का अनुभव बहुत सुंदर होता था और मेरा सौभाग्य है कि मुझे यह अवसर अनेक बार मिला है|

मैंने पहले भी स्वर्गीय रमेश रंजक जी के बहुत से नवगीत शेयर किए हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है रंजक जी का यह सुंदर नवगीत–


माणिक अधर, नीलमी आँखें
ये पुखराज बदन
मन घायल कर गई तुम्हारी
हीरकनी चितवन

श्वेत शिला-सी दिपे
मोतिया
अँगिया कसी-कसी
रखनख-मणि, पन्नई
चूनरी
लहरे नागिन-सी
कैसे पाए प्राण जौहरी
ये अनमोल रतन ?

पग पर मूँगा रंग
महावर
शीश कटी मछली
हाथों पर गोमधिया
मेंहदी
सतरंगी तितली
कोमल काया से क्यों बाँधा
इतना पाहनपन ?


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

एक उम्र मुस्कान की!

आज फिर से मैं अपने अत्यंत प्रिय नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक सुंदर गीत शेयर कर रहा हूँ| रंजक जी के बहुत से गीत मैंने पहले भी शेयर किए हैं और उनके बारे में काफी लिखा भी है|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक सुंदर गीत –

इतनी ही थी अवधि हमारी अनबोली पहचान की
जैसे लाज भरे होठों पर एक उमर मुस्कान की

पल भर का परिचय था लेकिन
सुघर घड़ी तस्वीर-सी
टँगी रही प्यासी आँखों में
आकृति एक लकीर-सी

गन्ध झूलती रही शिराओं में अधखिले विहान की
जैसे आँगन में सुधि झूले बिना रुके मेहमान की

सागर के सिरहाने, अम्बर का
सूनापन ओढ़ कर
खड़ी रही अनमनी विदाई
टूटी ख़ुशियाँ जोड़ कर


प्यास देखती रही दूर तक रेखाएँ जलयान की
जैसे पढ़े रोशनी कोई ग़ज़ल किसी दीवान की|


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

जितने-जितने सभ्य!

आज फिर से मैं अपने एक अत्यंत प्रिय और सृजनशील नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर कर रहूँ| कविताओं का शौक पैदा होने के बाद जिन कवियों को मैंने गोष्ठियों में और काव्य मंचों से बड़े चाव से सुना और उनके सानिध्य का मौका भी मिला उनमें स्वर्गीय रमेश रंजक भी शामिल थे| रमेश जी नवगीत के लिए समर्पित दुर्लभ रचनाकार थे, दुर्भाग्य से विधाता उन्हें ज्यादा लंबी उम्र नहीं दी थी और दूरदर्शन के लिए एक कार्यक्रम में कविता पाठ करते हुए ही उनको हार्ट अटैक आया जो उनके प्राण लेकर ही गया|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत –

जितने-जितने सभ्य हुए हैं
सचमुच बहुत असभ्य हुए हैं !

इन्हें-उन्हें दे कर नज़राना
अपना खाना-पीना जाना
सुख-सुविधाओं की किश्तों में
जीना और महीना जाना
मानव होकर मानव के हित
कितनी बार अलभ्य हुए हैं !

सब जाना ज़िन्दगी न जानी
जड़ता में जड़ रही अजानी
पेट परम सुख के चक्कर में
कथा आधुनिक व्यथा पुरानी
जितनी गुण-ग्राहकता छीजी
अवगुण उतने भव्य हुए हैं !


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

दिल्ली की तस्वीर!

स्वर्गीय रमेश रंजक जी मेरे अत्यंत प्रिय नवगीतकार रहे हैं, जब कविता लिखना प्रारंभ किया था तब मैं उनके नवगीत अक्सर गुनगुनाया करता था| रंजक जी के अनेक नवगीत मैंने पहले भी शेयर किए हैं और उनके बारे में बहुत से संस्मरण भी साझा किए हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह गीत, जिसमें देश की राजधानी और प्रमुख महानगरी दिल्ली की एक अलग ही तस्वीर प्रस्तुत की गई है –

मुँह देखा आचरण यहाँ का
बोझिल वातावरण यहाँ का
झूठे हैं अख़बार यहाँ के
अन्धा है जागरण यहाँ का
घने धुँधलके में डूबी हैं सीमाएँ परिवेश की
यह महान नगरी है मेरे देश की

है तो राजनीति की पुस्तक
लेकिन कूटनीति में जड़ है
हर अध्याय लिखा है आधा
आधे में आधी गड़बड़ है
चमकीला आवरण यहाँ का
उल्टा है व्याकरण यहाँ का
शब्द-शब्द से फूट रही है गन्ध विषैले द्वेष की
यह महान नगरी है मेरे देश की

धूप बड़ी बेशरम यहाँ की
चाँदी की प्यासी हैं रातें
जीती है अधमरी रोशनी
सुन-सुन कर अधनंगी बातें
सुबहें हैं चालाक यहाँ की
शामें हैं नापाक यहाँ की
दोपहरी मेज़ों पर फैलाती बातें उपदेश की
यह महान नगरी है मेरे देश की

उजली है पोशाक बदन पर
रोज़ी है साँवली यहाँ की
सत्य अहिंसा के पँखों पर
उड़ती है धाँधली यहाँ की
नागिन-सी चलती ख़ुदगर्ज़ी
चादर एक सैकड़ों दर्ज़ी
बिकती है टोपियाँ हज़ारों अवसरवादी वेश की
यह महान नगरी है मेरे देश की

छू कर चरण भाग्य बनते हैं
प्रतिभा लँगड़ा कर चलती है
हमदर्दी कुर्सी के आगे
मगरमच्छ आँखें मलती है
आदम, आदमख़ोर यहाँ के
रखवाले हैं चोर यहाँ के
जिन्हें सताती है चिन्ता कोठी के श्रीगणेश की
यह महान नगरी है मेरे देश की


जिसने आधी उमर काट दी
इधर-उधर कैंचियाँ चलाते
गोल इमारत की धाई छू
उसके पाप, पुण्य हो जाते
गढ़ते हैं कानून निराले
ये लम्बे नाख़ूनों वाले
देसी होठों से करते हैं बातें सदा विदेश की
यह महान नगरी है मेरे देश की|


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

काट लो रस्ता यही बेहतर!


आज एक बार फिर मैं अपने अत्यंत प्रिय नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूं| रंजक जी की अनेक रचनाएं मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ| मेरा सौभाग्य है कि मुझे उनको साक्षात सुनने के अनेक अवसर मिले, उनसे प्रशंसा भी प्राप्त की और लंबे समय तक उनसे गीत लिखने की प्रेरणा प्राप्त होती रही|

लीजिए प्रस्तुत है श्री रमेश रंजक जी का यह नवगीत –

इधर दो फूल मुँह से मुँह सटाए
बात करते हैं
यहीं से काट लो रस्ता
यही बेहतर

हमें दिन इस तरह के
रास आए नहीं ये दीगर
तसल्ली है कहीं तो
पल रहा है प्यार धरती पर
हरे जल पर पड़े मस्तूल-साए
बात करते हैं

यहीं से काट लो रस्ता
यही बेहतर

खुले में ये खुलापन देखकर
जो चैन पाया है
कई कुर्बानियों का रंग
रेशम में समाया है
उमर की आग का परचम उठाए
बात करते हैं

यहीं से काट लो रस्ता
यही बेहतर।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

तीलियों का पुल !

आज एक बार फिर से मैं अपने अत्यंत प्रिय नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| रंजक के बहुत से गीत मैंने पहले भी शेयर किए हैं और उनके बारे में बहुत से अपने संस्मरण भी लिखे हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत –

मुझे हर तीसरे दिन
तीलियों का पुल बुलाता है
शाम कहती है—कहो क्या बात है ?
एक शीशा टूट जाता है


बिखर जाती हैं सितारों की तरह किरचें
(नंगे) पाँव डरते हैं
और उड़-उड़ कर क़िताबों के नए पन्ने
मना करते हैं
बदन सारा कसमसाता है

धूल से मैली हुई है
पर न मैली हुई जो मन से
झाँकती है जब कभी तस्वीर वह
कभी खिड़की, कभी आँगन से
नींद की दो डोरियों के बँधे पाँवों में
कौन है जो थरथराता है ?
एक शीशा टूट जाता है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

लो करने आ गए जिरह!

आज फिर से मैं अपने अत्यंत प्रिय कवि और नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| बाकी क्षेत्रों की तरह कविता और गीत, नवगीत की दुनिया में भी कुछ सृजनधर्मी रचनाकार होते हैं और बहुत से ऐसे लोग होते हैं जिनके पास रचना-कौशल या प्रतिभा तो नहीं होती परंतु तर्क खूब होते हैं|

लीजिए आज मैं स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक ऐसा ही नवगीत शेयर कर रहा हूँ, जिसमें रचनाधार्मिता के संबंध ऐसी ही जिरह की प्रवृत्ति का जिक्र किया गया है–

कोल्हू के बैल की तरह
घूमते रहे हैं जो एक ही जगह
लो करने आ गए जिरह।

खुर वही पुजे हैं
तोड़ा है जिसने भी
धरती का बाँझपन
और सुम वही हैं
नाप गए बिना नापी
धरती का आयतन

भीतर तक भरे नहीं
ऊपर से हरे नहीं
लालसा ही अर्थ की
जीवन में खरे नहीं

छूते ही रहे सदा ऊपरी सतह
लो करने आ गए जिरह
घूमते रहे हैं जो एक ही जगह
कोल्हू के बैल की तरह ।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

मिट्टी बोलती है!

फिर से एक बार मैं अपने एक अत्यंत प्रिय नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| रंजक जी ने नवगीत के क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान बनाई थी| बहुत से अमर नवगीतों की रचना उन्होंने की है, जिनमें आम आदमी के संघर्ष को वाणी दी गई है|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत, जिसमें ऐसे किसान की त्रासदी का जिक्र किया गया है, जिसका सिंचाई का साधन, उसका रहट, चकबंदी के अंतर्गत बनने वाली सड़क में या जाए, फिर उसको कैसी मुसीबतों का सामना करना पड़ता है| दरअसल जमीन से दूर रहकर जो योजनाएं बनती हैं वे आम आदमी के प्रति उतनी संवेदनशील नहीं होतीं| लीजिए प्रस्तुत है यह नवगीत –

रहट जब चकरोड में आ जाए
और सूखी रोटियाँ खा जाए
मिट्टी बोलती है|

बोलती है छन्द जो सन्दर्भ में अपने
टूट जाते हैं बया के घोंसले-से
झूलते नीले-हरे सपने,

हर पुराने शब्द में
ध्वन्यर्थ गहरा घोलती है
मिट्टी बोलती है|

अर्थ ये इतिहास को
भूगोल से यूँ जोड़ देते हैं
रीति में डूबी हुई
पगडंडियों को मोड़ देते हैं


झुर्रियों के बीच में धँस कर
आदमी में आदमी को तोलती है|
मिट्टी बोलती है|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

ऐसा क्या पाप किया था मैंने!

एक बार फिर से मैं आज अपने अत्यंत प्रिय नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक सुंदर नवगीत शेयर कर रहा हूँ| नवगीत का नया संस्कार रंजक जी के गीतों में बखूबी प्रदर्शित होता है, वे कितनी खूबसूरती से जीवन की विसंगतियों को चित्रित करते हैं, मैंने पहले भी उनके अनेक नवगीत शेयर किए हैं!

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत–



अजगर के पाँव दिए जीवन को
और समय को डैने
ऐसा क्या पाप किया था मैंने ?

लहरों की भीड़ मुझे धकिया कर
जा लगी किनारे
झूलता रहा मेरा तिनकापन
भाग्य के सहारे

कुन्दन विश्वासों ने चुभो दिए
अनगिन नश्तर पैने
ऐसा क्या पाप किया था मैंने ?

शीशे का बाल हो गई टूटन
बिम्ब लड़खड़ाए
रोशनी अँधेरे से कितने दिन
और मार खाए ?

पूछा है झुँझला कर राहों से
पाँवों के बरवै ने
ऐसा क्या पाप किया था मैंने ?


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********