काट लो रस्ता यही बेहतर!


आज एक बार फिर मैं अपने अत्यंत प्रिय नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूं| रंजक जी की अनेक रचनाएं मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ| मेरा सौभाग्य है कि मुझे उनको साक्षात सुनने के अनेक अवसर मिले, उनसे प्रशंसा भी प्राप्त की और लंबे समय तक उनसे गीत लिखने की प्रेरणा प्राप्त होती रही|

लीजिए प्रस्तुत है श्री रमेश रंजक जी का यह नवगीत –

इधर दो फूल मुँह से मुँह सटाए
बात करते हैं
यहीं से काट लो रस्ता
यही बेहतर

हमें दिन इस तरह के
रास आए नहीं ये दीगर
तसल्ली है कहीं तो
पल रहा है प्यार धरती पर
हरे जल पर पड़े मस्तूल-साए
बात करते हैं

यहीं से काट लो रस्ता
यही बेहतर

खुले में ये खुलापन देखकर
जो चैन पाया है
कई कुर्बानियों का रंग
रेशम में समाया है
उमर की आग का परचम उठाए
बात करते हैं

यहीं से काट लो रस्ता
यही बेहतर।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

तीलियों का पुल !

आज एक बार फिर से मैं अपने अत्यंत प्रिय नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| रंजक के बहुत से गीत मैंने पहले भी शेयर किए हैं और उनके बारे में बहुत से अपने संस्मरण भी लिखे हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत –

मुझे हर तीसरे दिन
तीलियों का पुल बुलाता है
शाम कहती है—कहो क्या बात है ?
एक शीशा टूट जाता है


बिखर जाती हैं सितारों की तरह किरचें
(नंगे) पाँव डरते हैं
और उड़-उड़ कर क़िताबों के नए पन्ने
मना करते हैं
बदन सारा कसमसाता है

धूल से मैली हुई है
पर न मैली हुई जो मन से
झाँकती है जब कभी तस्वीर वह
कभी खिड़की, कभी आँगन से
नींद की दो डोरियों के बँधे पाँवों में
कौन है जो थरथराता है ?
एक शीशा टूट जाता है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

लो करने आ गए जिरह!

आज फिर से मैं अपने अत्यंत प्रिय कवि और नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| बाकी क्षेत्रों की तरह कविता और गीत, नवगीत की दुनिया में भी कुछ सृजनधर्मी रचनाकार होते हैं और बहुत से ऐसे लोग होते हैं जिनके पास रचना-कौशल या प्रतिभा तो नहीं होती परंतु तर्क खूब होते हैं|

लीजिए आज मैं स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक ऐसा ही नवगीत शेयर कर रहा हूँ, जिसमें रचनाधार्मिता के संबंध ऐसी ही जिरह की प्रवृत्ति का जिक्र किया गया है–

कोल्हू के बैल की तरह
घूमते रहे हैं जो एक ही जगह
लो करने आ गए जिरह।

खुर वही पुजे हैं
तोड़ा है जिसने भी
धरती का बाँझपन
और सुम वही हैं
नाप गए बिना नापी
धरती का आयतन

भीतर तक भरे नहीं
ऊपर से हरे नहीं
लालसा ही अर्थ की
जीवन में खरे नहीं

छूते ही रहे सदा ऊपरी सतह
लो करने आ गए जिरह
घूमते रहे हैं जो एक ही जगह
कोल्हू के बैल की तरह ।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

मिट्टी बोलती है!

फिर से एक बार मैं अपने एक अत्यंत प्रिय नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| रंजक जी ने नवगीत के क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान बनाई थी| बहुत से अमर नवगीतों की रचना उन्होंने की है, जिनमें आम आदमी के संघर्ष को वाणी दी गई है|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत, जिसमें ऐसे किसान की त्रासदी का जिक्र किया गया है, जिसका सिंचाई का साधन, उसका रहट, चकबंदी के अंतर्गत बनने वाली सड़क में या जाए, फिर उसको कैसी मुसीबतों का सामना करना पड़ता है| दरअसल जमीन से दूर रहकर जो योजनाएं बनती हैं वे आम आदमी के प्रति उतनी संवेदनशील नहीं होतीं| लीजिए प्रस्तुत है यह नवगीत –

रहट जब चकरोड में आ जाए
और सूखी रोटियाँ खा जाए
मिट्टी बोलती है|

बोलती है छन्द जो सन्दर्भ में अपने
टूट जाते हैं बया के घोंसले-से
झूलते नीले-हरे सपने,

हर पुराने शब्द में
ध्वन्यर्थ गहरा घोलती है
मिट्टी बोलती है|

अर्थ ये इतिहास को
भूगोल से यूँ जोड़ देते हैं
रीति में डूबी हुई
पगडंडियों को मोड़ देते हैं


झुर्रियों के बीच में धँस कर
आदमी में आदमी को तोलती है|
मिट्टी बोलती है|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

ऐसा क्या पाप किया था मैंने!

एक बार फिर से मैं आज अपने अत्यंत प्रिय नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक सुंदर नवगीत शेयर कर रहा हूँ| नवगीत का नया संस्कार रंजक जी के गीतों में बखूबी प्रदर्शित होता है, वे कितनी खूबसूरती से जीवन की विसंगतियों को चित्रित करते हैं, मैंने पहले भी उनके अनेक नवगीत शेयर किए हैं!

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत–



अजगर के पाँव दिए जीवन को
और समय को डैने
ऐसा क्या पाप किया था मैंने ?

लहरों की भीड़ मुझे धकिया कर
जा लगी किनारे
झूलता रहा मेरा तिनकापन
भाग्य के सहारे

कुन्दन विश्वासों ने चुभो दिए
अनगिन नश्तर पैने
ऐसा क्या पाप किया था मैंने ?

शीशे का बाल हो गई टूटन
बिम्ब लड़खड़ाए
रोशनी अँधेरे से कितने दिन
और मार खाए ?

पूछा है झुँझला कर राहों से
पाँवों के बरवै ने
ऐसा क्या पाप किया था मैंने ?


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

गीत फूल-फूले!

स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक नवगीत आज प्रस्तुत कर रहा हूँ| रंजक जी ने नवगीत के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई थी और कुछ अद्भुद नवगीत उन्होंने हमें दिए हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत, जो गीतों की मोहकता और प्रभाव विस्तार को लेकर ही है –

सुधियों की अरगनी बाँध कर सम्बोधन झूले
सहन भर गीत फूल-फूले|

सर्वनाम आकर सिरहाने
माथा दबा गया
अनबुहरा घर लगा दीखने
फिर से नया-नया
तन-मन हल्का हुआ, अश्रु का भारीपन भूले|


मिली, खिली रोशनी, अँधेरा
पीछे छूट गया,
ऐसा लगा कि दीवाली का
दर्पण टूट गया,
लगे दीखने तारे जैसे हों लँगड़े-लूले|

हवा किसी रसवन्ती ऋतु की
साँकल खोल गई,
होठों की पँखुरी न खोली
फिर भी बोल गई,
सम्भव है यह गन्ध तुम्हारे आँचल को छू ले|


दमक उठे दालान, देहरी
महकी क्यारी-सी,
लगी चहकने अनबोली
बाखर फुलवारी-सी,
झूम उठे सारे वातायन भीनी ख़ुशबू ले|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

क़लम बेदाग है तो ज़िन्दगी है !

मेरे अत्यंत प्रिय रहे सृजनधर्मी नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक और गीत आज शेयर कर रहा हूँ| रमेश रंजक जी ने वास्तव में नवगीत विधा में नई ऊँचाइयाँ हासिल की थीं और उनसे हमेशा चमत्कारिक अभिव्यक्ति की उम्मीद बनी रहती थी| काव्यधर्म का वे हमेशा कड़ाई से पालन करते थे और उन्होंने अनेक कालजयी गीत हमें दिए हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत जो कवि की खुद्दारी और ईमानदारी को अभिव्यक्ति देता है –

क़लम में आग है तो ज़िन्दगी है ।
क़लम बेदाग है तो ज़िन्दगी है ।।

कहाँ हैं शब्द के अंगार उनमें
क़लम जिनकी ख़रीदी जा चुकी है
लिखेंगे क्या ? गुनाहों की कहानी
जिन्हें मोटी रक़म हथिया चुकी है|

तपस्या त्याग है तो ज़िन्दगी है ।
क़लम बेदाग है तो ज़िन्दगी है ।।

क़लम बिकती नहीं है सिर्फ़ उसकी
जुड़ा है जो ज़मीं से, आदमी से
उसी ने चेतना को नोक दी है
दुखी है जो समय की त्रासदी से|

रगों में राग है तो ज़िन्दगी है ।
क़लम बेदाग है तो ज़िन्दगी है ।।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

तुमसे नाराज़ तो नहीं हूँ मैं!

आज मैं फिर से अपने अत्यंत प्रिय कवि एवं नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जो मुझे अत्यंत प्रिय रहा है| शायद इस गीत का कुछ भाग मैंने पहले भी शेयर किया हो| यह गीत व्यक्ति के आशावाद और जीवट शक्ति को प्रबल अभिव्यक्ति देता है| परेशानियों से हार न मानने और संघर्ष करते जाने की ऊर्जा और उत्साह का गीत|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत-

फैली है दूर तक परेशानी
तिनके-सा तिरता हूँ, तो क्या है ?
तुमसे नाराज़ तो नहीं हूँ मैं|

आँसू का शिलालेख है जीवन
बिना पढ़ा, बिना छुआ
अन्धी बरसात बद्‍दुआओं की
नफ़रत का घना धुँआ,

मकड़ी के जाले-सी पेशानी
साथ लिए फिरता हूँ, तो क्या है ?
टूटी आवाज़ तो नहीं हूँ मैं|

मैं दूँगा भाग्य की लकीरों को
रोशनी सवेरे की
देखूँगा कितने दिन चलती है
दुश्मनी अँधेरे की,

जीऊँ क्यों माँग कर मेहरबानी
संकट में घिरता हूँ, तो क्या है ?
कोई सरताज तो नहीं हूँ मैं|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

गीत-विहग उतरा!

आज एक बार फिर से मैं स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| यह गीत रंजक जी की प्रारंभिक प्रसिद्ध रचनाओं में से एक है और यह उनके एक नवगीत संकलन का शीर्षक गीत था| प्रकृति के कुछ सुंदर चित्र इस गीत में उकेरे गए हैं||

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत –

हल्दी चढ़ी पहाड़ी देखी
मेंहदी रची धरा
अंधियारे के साथ पाहुना
गीत-विहग उतरा ।

गांव फूल-से गूंथ दिए
सर्पिल पगडंडी ने,
छोर फैलते गए
मसहरी के झीने-झीने,
दिन, जैसे बांसुरी बजाता
बनजारा गुज़रा।

पोंछ पसीना ली अंगड़ाई
थकी क्रियाओं ने,
सौंप दिये मीठे सम्बोधन
खुली भुजाओं ने
जोड़ गया संदर्भ मनचला
मौसम हरा-भरा।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

छोटे-छोटे पाँव!

एक तो लंबा सफर दूसरे ये कठिनाई है,
छोटे-छोटे पाँव ज़िंदगी लेकर आई है|

रमेश रंजक