बड़ी ख़ूबसूरत पढ़ाई हुई!

वो चेहरा किताबी रहा सामने,
बड़ी ख़ूबसूरत पढ़ाई हुई |

बशीर बद्र

उसे चुपके-चुपके पढ़ा करो!

यूँ ही बे-सबब न फिरा करो, कोई शाम घर में भी रहा करो,
वो ग़ज़ल की सच्ची किताब है, उसे चुपके-चुपके पढ़ा करो|

बशीर बद्र

पढ़ते हैं सब ताज़ा ग़ज़ल मेरी!

Opened Book on Tree Root

दम साध के पढ़ते हैं सब ताज़ा ग़ज़ल मेरी,
किस लहजे में अबके मैं क्या बात बरतता हूँ ।

राजेश रेड्डी