निभाते हुए मर जाते हैं!

हम हैं सूखे हुए तालाब पे बैठे हुए हंस,
जो तअ’ल्लुक़ को निभाते हुए मर जाते हैं|

अब्बास ताबिश

अपना बना के देख लिया!

वो मिरे हो के भी मिरे न हुए,
उनको अपना बना के देख लिया|

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

बहुत दिन किसी के साथ!

दुनिया को बेवफ़ाई का इल्ज़ाम कौन दे,
अपनी ही निभ सकी न बहुत दिन किसी के साथ|

वसीम बरेलवी

जान के दुश्मन तुझे अल्लाह रक्खे!

उम्र भर कौन निभाता है तअल्लुक़ इतना,
ऐ मिरी जान के दुश्मन तुझे अल्लाह रक्खे|

अहमद फ़राज़

शर्माना ज़रूरी है!

बहुत बेबाक आंखों में तअ’ल्लुक़ टिक नहीं पाता,
मोहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है|

वसीम बरेलवी

मगर इतना तो बता!

मैं तेरा कुछ भी नहीं हूँ मगर इतना तो बता,
देखकर मुझको तेरे ज़ेहन में आता क्या है|