पर्दा है पर्दा!

हिजाब को लेकर एक नया मुद्दा मिला है आन्दोलनजीवी, जो जब से मोदी सरकार आई है, असंतोष पैदा करने का लिए मुद्दे ढूंढते ही रहते हैं|


मैं एक बार फिर से कह दूँ कि यद्यपि प्रधानमंत्री जी ने देश की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए तीनों कृषि कानून वापस ले लिए हैं, क्योंकि किसान आंदोलन की आड़ में खलिस्तानी और अन्य भारत विरोधी ताक़तें कोई बड़ा खेल खेलना चाहती थीं| सारा पैसा कनाडा आदि से आता था और वहाँ के नेता भी वास्तव में यहाँ आए थे| आज कनाडा इसी प्रकार के आंदोलन का सामना कर रहा है और वहाँ की सरकार ने कड़ी चेतावनी दे दी है कि अर्थव्यवस्था को किसी प्रकार का नुकसान पहुंचाना बर्दाश्त नहीं किया जाएगा| जबकि यहाँ चले आंदोलन का वहाँ के प्रधानमंत्री ने खुद खालिस्तानियों के दवाब में समर्थन किया था, जबकि दूसरे देश के ऐसे आंतरिक मामलों में उनका टिप्पणी करना उचित नहीं था|

मुझे लगता है कि अब यहाँ के आन्दोलनजीवियों को कनाडा जाकर वहाँ की सरकार द्वारा मिलने वाली आवभगत का आनंद लेना चाहिए|

अब हिजाब की बात| दुनिया भर में, मुस्लिम राष्ट्रों में भी, जबकि महिलाएं आगे बढ़ रही हैं, पर्दा, हिजाब आदि का विरोध कर रही हैं, यहाँ कर्नाटक में छात्राओं में नई सोच पैदा हुई है कि वे हिजाब में ही स्कूल। कालेज जाएंगी| ये तालिबानी सोच वास्तव में उन छात्राओं की नहीं है, अपितु उन घुटे हुए नेताओं/ मुल्लाओं की है जो किसी न किसी बहाने से असंतोष फैलाना चाहते हैं| कभी वे सीएए के बहाने वृद्ध महिलाओं को आगे कर देते हैं, कभी किसानों को मोहरा बनाते हैं और अब भोली- भाली छात्राओं के पीछे छुपकर अपने घटिया खेल को खेल रहे हैं|

ऐसा नहीं है कि इन छात्राओं ने अभी स्कूल/कालेज जाना शुरू किया है, लेकिन यह दकियानूसी सोच उनके माध्यम से अभी फैलाई जा रही है|

मैं समझता हूँ कि जावेद अख्तर, शबाना आज़मी आदि जैसे लोग जो अपने आपको प्रगतिशील मानते हैं उनको इस आंदोलन का विरोध करना चाहिए| मेरे विचार में न्यायपालिका द्वारा भी इस संबंध में सख्त दिशानिर्देश जारी किए जाने चाहिएं और सरकार द्वारा ऐसे विभाजनकारी प्रयासों से कड़ाई के साथ निपटा जाना चाहिए|


******

बतावत आपनो नाम सुदामा!

नरोत्तम दास जी द्वारा लिखित ‘सुदामा चरित’ का प्रसंग आज याद आ रहा है| बचपन में अपनी पाठ्य पुस्तकों में हम यह प्रसंग पढ़ चुके हैं| शायद यह भी सही है कि उस समय हमारा मन इतना पवित्र होता है कि इस तरह के प्रसंग हमारे कोमल मन में गहरा स्थान बना लेते हैं|


ऐसे ही मन में खयाल आता है कि आज जो राजकीय भवन हैं, बड़े-बड़े शासकीय कार्यालय हैं, गरीब आदमी उनके सामने से गुजरते हुए भी डरता है जबकि किसी घोटालेबाज, स्मगलर आदि के लिए शायद उस भवन में रहने वाला उच्च अधिकारी अथवा नेता स्वयं उसे रिसीव करने के लिए द्वार पर आ जाता है|

खैर आज का प्रसंग है द्वारिकाधीश श्रीकृष्ण के बचपन के सखा सुदामा का, जो अपनी पत्नी द्वारा बार-बार यह कहे जाने पर कि आपके मित्र श्रीकृष्ण द्वारिकाधीश हो गए हैं, इतने संपन्न हैं और हम लोग इतनी दरिद्रता का जीवन बिता रहे हैं, आप उनके पास जाओ और अपने लिए कुछ सहायता मांग लो, वो अवश्य सहायता करेंगे|

अब आज की इस कविता का प्रसंग, सुदामा श्रीकृष्ण जी के महल पहुंचते हैं, वहाँ द्वारपाल उनको देखता है, एक कृषकाय मनुष्य, जिसके शरीर पर ढंग के कपड़े नहीं हैं, नंगे पैर है वह महल के द्वार पर आता है और कहता है कि उसको द्वारिकाधीश श्रीकृष्ण से मिलना|

आश्चर्य चकित वह द्वारपाल जाकर श्रीकृष्ण जी को यह समाचार देता है और बालसखा सुदामा का नाम सुनते ही श्रीकृष्ण नंगे पांव उसका स्वागत करने पहुँच जाते हैं| उसका खूब आदर सत्कार करते हैं, हर तरह की सुविधाओं का उसको उपभोग कराते हैं| गरीब सुदामा संकोच के कारण यह भी नहीं कह पाता कि वह क्या मांगने के लिए आया था और जब लौटने का समय आता है, तब भी वह सोचता रहता है कि उसकी गरीब पत्नी कैसे कष्ट भोग रही होगी और वह उसकी इच्छा के अनुसार श्रीकृष्ण से कुछ नहीं मांग पाया, वापस जाकर वह क्या जवाब देगा|

पछताता हुआ वह अपने गाँव पहुंचता है और अपनी कुटिया को वहाँ नहीं देखकर अचंभित हो रहा होता है, तभी वहाँ बने भव्य भवन में से उसकी पत्नी उसको इशारा करके बुलाती है| कृपासिन्धु श्रीकृष्ण सुदामा के कहे बिना ही उसे वे सभी सुविधाएं उपलब्ध करा देते हैं, जिनकी वह कल्पना भी नहीं कर सकता था|

यह प्रसंग ऐसा है कि इसको याद करके ही आँखों में आँसू आ जाते हैं, लीजिए यह प्रसंग थोड़ा सा कविता के रूप में पढ़ लेते हैं-


शीश पगा न झगा तन में प्रभु
जाने को आहि बसे केहि ग्रामा ।
धोती फटी -सी लटी दुपटी,
अरु पाय उपानह को नहीं सामा ॥
द्वार खड़ा द्विज दुर्बल एक,
रह्यो चकिसों वसुधा अभिरामा ।
पूछत दीनदयाल को धाम,
बतावत आपनो नाम सुदामा ॥

ऐसे बेहाल बिवाइन सों,
पग कंटक जाल लगे पुनि जोए।
हाय! महादुख पायो सखा,
तुम आए इतै न कितै दिन खोए॥
देखि सुदामा की दीन दसा,
करुना करिकै करुनानिधि रोए।
पानी परात को हाथ छुयो नहिं,
नैनन के जल सों पग धोए॥



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
******

भारतीय दर्शन और हिन्दू धर्म

बहुत पहले कहीं पढ़ा था कि विभिन्न धर्मों का अध्ययन कर रहे एक विदेशी विद्वान से जब पूछा गया कि विभिन्न धर्मों के अपने अध्ययन के आधार पर वे क्या कहना चाहेंगे! इस पर उसने कहा था कि आम आदमी के लिए सबसे आसान है मुस्लिम धर्म- पाँच टाइम नमाज पढ़ो और कोई गलती हुई हो तो उसके लिए अल्लाह से माफी मांग लो| इसके बाद उसने कहा कि सबसे से अधिक व्यापक है हिन्दू दर्शन, इसे अंग्रेजी के ‘रिलीजन’ के दायरे में बांधना संभव नहीं है| ये जीवन दर्शन है| कोई हिन्दू धर्म का अध्ययन संपूर्णता से करना चाहता है तो उसके लिए एक जन्म पर्याप्त नहीं है|

 

 

चिंतन की उदारता के मामले में हिन्दू संस्कृति का कोई मुक़ाबला नहीं है| भारतीय दर्शन के संबंध में विश्व धर्म संसद में गए विवेकानंद जी का उदाहरण हमें गर्वित करता है| अब उनका ज़िक्र आया है तो उनके जीवन से जुड़ा एक प्रसंग याद आ रहा है| विदेश जाने के लिए राजस्थान में खेतड़ी के महाराज ने विवेकानंद जी की सहायता की थी| उसी समय की बात है, विवेकानंद जी राजा के महल में गए, तो मालूम हुआ कि वहाँ एक गणिका नृत्य कर रही थी| उसके गीत की ध्वनि सुनकर विवेकानंद जी द्वार पर ही ठिठक गए| उनका संकोच समझकर गणिका ने अपना गीत बदलकर यह भजन गाया-

प्रभुजी मेरे अवगुण चित न धरो,
एक लोहा पूजा में राखत, एक घर वधिक परो,
यह दुविधा पारस नहीं मानत, कंचन करत खरौ|

यह सुनकर विवेकानन्द जी को अपनी भूल का एहसास हुआ, वे भीतर गए और उस गणिका के चरणों में गिरकर बोले- ‘माँ मुझे क्षमा कर दो, मुझे यह भेद नहीं करना चाहिए था’| यह प्रसंग खेतड़ी के राजा के महल में लिखा हुआ है| हाँ जी,यह है भारतीय संस्कृति और हिन्दू धर्म की विशेषता| यहाँ मन की पवित्रता सबसे बड़ी आवश्यकता है और कोई भी किसी से भी सीख ले सकता है|

मुझे बहुत पहले की एक घटना याद आ रही है, दिल्ली में किसी प्रकाशक ने एक पाठ्य पुस्तक में पैगंबर मुहम्मद साहब की तस्वीर छाप दी थी, तब उसकी प्रेस पर हमला हुआ था, आग लगा दी गई थी| उन लोगों का कहना था कि इंसानी हाथों से पैगंबर की तस्वीर कैसे बनाई जा सकती है! हिन्दू धर्म में कलाकार अपनी कल्पना और प्रतिभा द्वारा जो सुंदर से सुंदर चित्र अथवा मूर्ति बना देता है, उसे लोग ईश्वर का चित्र अथवा मूर्ति मान लेते हैं|

हिन्दू धर्म जिसे कहते हैं, वह कोई उपासना पद्यति मात्र नहीं है जिसका प्रचार किया जाए, लोगों को इसमें आने के लिए प्रेरित या मजबूर किया जाए| देश में बहुत जगहों पर तो गरीबों, आदिवासियों को अनाज आदि देकर कहा जाता है कि देखो तुम्हारा भगवान तुम्हें खाना नहीं देता, हमारा ईश्वर देता है, इसलिए हमारे धर्म में शामिल हो जाओ| इसलिए ज़्यादातर इसमें आस्था और लालच का अंतर है|

बहुत से ऐसे साधु और प्रवचन करने वाले हैं, जो अगर गलत आचरण करते पाए गए हैं तो उनको जेल जाना पड़ा है, भले उनके कितने भी शिष्य बने हों| जबकि अन्य धर्मों के मामले में ‘नन’ आदि पर अन्याय होने पर, उनकी ही ज़ुबान बंद कर दी जाती है|
हिन्दू धर्म में, प्रारंभ से ही चर्चा और शास्त्रार्थ को बढ़ावा दिया जाता रहा है| यहाँ लोग आँख मूंदकर किसी के पीछे नहीं जाते, अगर ऐसा हुआ और बाद में मालूम हुआ कि यह गलत मार्ग है तो लोग उसको छोड़ देते हैं|

हमारी पौराणिक कथाओं में ऐसे अनेक प्रसंग मिलते हैं कि त्रिदेव से आशीर्वाद पाकर आसुरी प्रवृत्ति के लोग अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करते हैं| ऐसे में हमारे त्रिदेव जो आवश्यक होता है वह कदम उठाते हैं| यह स्पष्ट है कि जो गलत आचरण कर रहा है, जो धर्म विरुद्ध है, उसको हराने के लिए जो भी आवश्यक हो किया जा सकता है|

एक उदाहरण याद आ रहा है| असुर राज जलंधर, जो शिवांश था, वह अपनी आसुरी शक्ति से त्रिलोक विजयी हो जाता है, उसकी पतिव्रता पत्नी – वृंदा पूजा करती है, जिसमें उसके शामिल हो जाने के बाद उसका अंत संभव नहीं होता, ऐसे में उसकी पूजा को असफल करना मानवता की रक्षा के लिए आवश्यक था| भगवान नारायण (विष्णु) ऐसे में जलंधर का रूप धरकर इस पूजा को असफल कराते हैं, इसके लिए उनको वृंदा का श्राप भी झेलना पड़ता है| लेकिन मानवता की रक्षा के लिए वे यह काम करते हैं| वृंदा को आज भी हरि मंदिर में ‘तुलसी’ के रूप में पूजा जाता है|

इसी प्रकार मानवता की रक्षा के लिए विषपान करने वाले महादेव का उदाहरण और कहाँ मिलेगा|

बस इतना ही कहना चाहूँगा कि हिन्दू धर्म की व्यापकता किनारे पर बैठकर नहीं समझी जा सकती, हाँ कुछ सतही बुद्धिजीवी जैसे आतंकवादियों के मानवाधिकारों की वकालत करते हैं, वैसे ही धर्म विरुद्ध आचरण करने वालों के पक्ष में दलील देते रहते हैं| यह स्पष्ट है कि दशानन रावण की विद्वत्ता अथवा किसी का वृहद ज्ञान उस समय किसी काम का नहीं रहता, जब उसका आचरण धर्म विरुद्ध होता है|

बातें बहुत सारी हैं, एक और प्रसंग याद आ रहा है, अपने भाई सुग्रीव को अनेक प्रकार से सताने वाले बाली को राम मारते हैं, तब वह पूछता है कि ऐसा क्या है कि मैं आपका वैरी हो गया और सुग्रीव आपका मित्र है| इस पर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम कहते हैं-

अनुज वधु भगिनी सुत नारी। सुनु सठ कन्या सम ए चारी।
इन्हहिं कुदृष्टि बिलोकइ जोई। ताहि बधें कछु पाप न होई।।

बातें बहुत हैं कहने के लिए, हिन्दू धर्म के बारे में लोग अक्सर बिना ज्ञान के टिप्पणी करना अपना धर्म समझते हैं, बल्कि शायद ऐसा करना ही सैक्युलर होने की पहचान माना जाता है| इसलिए मन हुआ कि कुछ बात इस विषय में कर ली जाए|

एक दो बातें और याद आ रही हैं, वो भी कह दूँ, पता नहीं फिर कब ऐसे विषय पर बात करने का मन होगा| हिन्दू धर्म के साथ रचनात्मकता भी कैसी दिव्य जुड़ी है| मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ की तुलसीदास और सूरदास जी जैसा प्रतिभाशाली कवि, पूरी दुनिया में नहीं हुआ है| खास तौर से धार्मिक आख्यान पर आधारित महाकाव्य रचने के लिए, जो रचनाएँ श्रद्धालु पाठकों के लिए अमृत के समान हैं| विशेष रूप से मेरे जैसे लोगों के लिए, जिनके लिए वेद-पुराण आदि का अध्ययन करना संभव नहीं है| आपको गाँव-देहात में ऐसे अनपढ़ लोग मिल जाएंगे जिनको तुलसीदास जी के रामचरितमानस की चौपाइयाँ कंठस्थ हैं| मुझे मालूम है कि कई धर्मों के प्रचार के लिए लोगों को अत्यधिक आकर्षक राशियों का प्रस्ताव किया गया कि वे ‘मानस’ जैसा ग्रंथ लिख दें, परंतु ऐसी रचना केवल गहन आस्था और अटूट श्रद्धा द्वारा ही संभव है|

जहां मानस के प्रसंग, जनसाधारण को सामान्य भाषा में हमारे ग्रन्थों के सार से परिचित कराते हैं, हनुमान चालीसा भी लोगों को कंठस्थ है, जो प्रभु के अनन्य भक्त हनुमान जी का गुणगान करती है, वहीं श्रीकृष्ण जी द्वारा अर्जुन के माध्यम से दुनिया को दिया गया गीता का संदेश ऐसा है जिसके एक-एक श्लोक पर विद्वान लोग, कई दिन तक व्याख्यान देते हैं, अनेक प्रसिद्ध विद्वानों ने इनकी व्याख्याएँ लिखी हैं| पूरी दुनिया आज गीता, रामायण के संदेश से लाभान्वित हो रही है|

लेकिन अपने देश में तो यही है कि जो हिन्दू धर्म की बुराई करे वह सेक्युलर और जो आतंकवादियों के मानवाधिकारों की वकालत करे, वही प्रगतिशील|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

******

तुलसी सो सुत होय!

मुंबई और हैदराबाद होते हुए बंगलौर आ गया हूँ, बेटे के घर पर, यहाँ कुछ देखने का मौका मिलेगा तो उसके बारे में लिखूंगा, फिलहाल आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ-

 

 

आज की बात शुरू करते समय मुझे चुनाव के समय का एक प्रसंग याद आ रहा है। अटल बिहारी वाजपेयी जी के विरुद्ध डॉ. कर्ण सिंह चुनाव लड़ रहे थे। दोनों श्रेष्ठ नेता हैं और एक दूसरे का आदर भी करते हैं। एक चुनावी सभा में डॉ. कर्ण सिंह ने कहा कि वाजपेयी जी इस राजनीति के चक्कर में क्यों पड़े हैं, वे मेरे महल में रहें और वहाँ रहकर कविताएं लिखें। इस पर वाजपेयी ने चुनावी जवाब देते हुए कहा था कि अच्छी कविता महलों में रहकर नहीं लिखी जाती, वह तो कुटिया में लिखी जाती है।

असल में जो प्रसंग मुझे याद आ रहा है, बहुत से पुराने प्रसंग ऐसे होते हैं कि उनकी सत्यता प्रमाणित करना तो संभव नहीं होता लेकिन उनसे प्रेरणा अवश्य ली जा सकती है।

कहा जाता है कि एक गरीब ब्राह्मण तुलसीदास जी के पास आया, वैसे यह भी अजीब बात है कि गरीब और ब्राह्मण, एक-दूसरे के पर्याय जैसे बन गए हैं। चलिए मैं इस तरह कहूंगा कि एक गरीब व्यक्ति तुलसीदास जी के पास आया। उसकी बेटी की शादी होनी थी और उसको इस विवाह के आयोजन के लिए आर्थिक सहायता की आवश्यकता थी। उसने तुलसीदास जी से इस संबंध में प्रार्थना की। अब तुलसीदास जी तो खुद धन-संपत्ति से बहुत दूर थे, वे क्या सहायता करते! लेकिन उनके समकालीन और अच्छे मित्र रहीम जी (अब्दुर्रहीम खानखाना) महाराज अकबर के दरबार में थे, उनके नवरत्नों में शामिल थे। वे उस व्यक्ति की सहायता कर सकते थे।

तुलसीदास जी ने उस व्यक्ति को एक कागज़ पर एक पंक्ति लिखकर दी और कहा कि यह लेकर आप रहीम जी के पास चले जाओ, वे आपकी सहयता करेंगे। उस कागज़ पर तुलसीदास जी ने लिखा था- ‘सुरतिय, नरतिय, नागतिय- सबके मन अस होय’, जिसका आशय है कि चाहे देवताओं की पत्नियां हों, चाहे महिलाएं हों या नागवंश में भी, नागिन हों- उन सभी को धन-संपत्ति, जेवर, मणि आदि अच्छे लगते हैं, उनकी आवश्यकता होती है।

वह व्यक्ति उस पर्ची को लेकर रहीम जी के पास गया, वे आशय समझ गए और उन्होंने उस व्यक्ति की भरपूर सहायता की, फिर उन्होंने उस व्यक्ति से कहा कि यह पर्ची वापस तुलसीदास जी को दे देना। उन्होंने उस पर्ची पर एक और पंक्ति लिख दी थी और अब दोनों पंक्तियां मिलकर इस प्रकार हो गई थीं-

सुरतिय, नरतिय, नागतिय- सबके मन अस होय
गोद लिए हुलसी फिरै, तुलसी सो सुत होय

यहाँ रहीम जी ने तुलसीदास जी से कहा कि आपने सही नहीं कहा, धन-संपत्ति महिलाओं को प्रिय हो सकती हैं, लेकिन सबसे बड़ी सौभाग्यशाली तो वह मां है, जिसका तुलसीदास जैसा बेटा हो।

अभी जबकि दशहरा  और दीवाली बीते हैैं, मन हुआ कि रामकथा के अमर गायक, तुलसीदास जी से जुड़ा यह प्रसंग साझा करूं।

नमस्कार।

***************