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हमारी आस्थाओं का गणतंत्र !

एक बार हम फिर से लोकतंत्र और सामाजिक विकास में अपनी दृढ़ आस्थाओं को अभिव्यक्त करने का पर्व, गणतंत्र दिवस मनाने जा रहे हैं| एक बार फिर लोकतंत्र विरोधी ताक़तें राजधानी दिल्ली के आसपास सड़कों को घेरकर बैठी हैं, इस बार उन्होंने किसानों को अपना मोहरा बनाया है| पिछले वर्ष तो कोरोना फैलने के कारण उनको इससे पहले ही आंदोलन खत्म कर देना पड़ा था, इस बार वे अभी तक जमे हैं और अपनी अलग ट्रैक्टर रैली निकाल रहे हैं|

खालिस्तानी संगठन ने उनसे अपील की है कि ट्रैक्टर रैली में राष्ट्रीय तिरंगा लेकर न निकलें| इस पर भी महान लिबरल लोगों को कोई ऐतराज नहीं होगा|


मैं एक मत अपना स्पष्ट रूप से व्यक्त करना चाहता हूँ कि प्रशांत भूषण, योगेन्द्र यादव जैसे लोग ‘पाँच सितारा किस्म के देशद्रोही हैं| ऐसे लोगों को शायद भारत में ही बर्दाश्त किया जा सकता है| यह भारत में ही हो सकता है कि हिन्दू आस्थाओं पर चोट करके लोग हीरो बन सकते हैं|

मुझे याद है जब मैं छोटा था किसी ने पैगंबर मुहम्मद साहब की काल्पनिक तस्वीर पुस्तक में छाप दी थी| लोगों ने उसकी विशाल प्रेस में आग लगा दी थी| यहाँ हिन्दू आस्थाओं पर चोट करना तो एक सेक्युलर क्रिया है, बाकी किसी के बारे में ऐसा कुछ करके देखो!


अमेरिका में नए राष्ट्रपति ने बाइबिल पर हाथ रखकर शपथ ली, क्या किसी लिबरल के मुंह में जमा हुआ दही पिघला! हिंदुस्तान में अगर कोई नेता गीता या रामचरित मानस पर हाथ रखकर शपथ लेगा तो ये ‘लिबरल’ लोग बांस पर चढ़ जाएंगे और कहेंगे कि लोकतंत्र खतरे में आ गया है|


पिछले काफी समय से भारत में ये महान लिबरल लोग ऐसा माहौल बनाने में लगे हैं| इसके लिए वे योजनाबद्ध तरीके से आस्थाओं पर चोट करते हैं| जैसे वे कहेंगे कि ईश्वर कोई नहीं होता! चलिए ईश्वर में बहुत से लोगों का विश्वास नहीं होता, यद्यपि उनका लक्ष्य सिर्फ हिन्दू आस्था पर चोट करना ही होता है| फिर वे कहते हैं देश कुछ नहीं होता, यह केवल भौगोलिक सीमा मात्र है, संस्कृति कुछ नहीं होती, राष्ट्रभक्ति कुछ नहीं होती| यही काम लॉर्ड मैकाले ने अंग्रेजों की शिक्षा पद्यति विकसित करते हुए किया था ताकि लोगों में राष्ट्रप्रेम और राष्ट्र गौरव की भावना न रहे और वे आराम से गुलामी स्वीकार कर लें|


बातें बहुत सी हो सकती हैं, लेकिन ऐसे ही लोकतंत्र के इस महापर्व के अवसर पर, दुराग्रहपूर्ण तरीके से सड़कों को घेरकर बैठे और एक देशप्रेमी पत्रकार के तथाकथित चैट लीक होने पर, पाकिस्तान के साथ मिलकर खुशी मनाने वाले लोगों का ताली पीटना यही बताता है कि हमारी उदारता का फायदा उठाकर यहाँ लोग देशद्रोह की सीमा तक जाने को तैयार हैं| इन लोगों को उन पत्रकारों से कोई दिक्कत नहीं होती जो ज़िंदगी भर सत्ता की दलाली करके सुविधाएं और पुरस्कार प्राप्त करते हैं और फिर मौका आने पर एवार्ड वापसी का नाटक करते हैं| भारतीय लोकतंत्र के हित में होगा कि ऐसे लोगों को उनकी सीमा ठीक से समझाई जाए|


सभी देशभक्तों को गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाई|

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