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मोर न होगा, हंस न होगा, उल्लू होंगे!

आज मैं जनकवि नागार्जुन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ, जो उन्होंने आपातकाल के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री और आपातकाल की जननी- श्रीमती इंदिरा गांधी को संबोधित करते हुए लिखी थी| नागार्जुन जी, आपातकाल के दौरान अन्य अनेक कवि, कलाकारों और नेताओं की तरह जेल में भी बंद रहे थे| जैसा कि आप जानते हैं दुष्यंत कुमार जी ने भी अनेक गज़लें आपातकाल के विरुद्ध लिखी थीं| आज मैं नागार्जुन जी की यह कविता शेयर कर रहा हूँ, जो हमें आपातकाल के अंधकारपूर्ण समय की याद दिलाती है|


लीजिए प्रस्तुत है ये कविता-

ख़ूब तनी हो, ख़ूब अड़ी हो, ख़ूब लड़ी हो,
प्रजातंत्र को कौन पूछता, तुम्हीं बड़ी हो|

डर के मारे न्यायपालिका काँप गई है,
वो बेचारी अगली गति-विधि भाँप गई है,
देश बड़ा है, लोकतंत्र है सिक्का खोटा,
तुम्हीं बड़ी हो, संविधान है तुम से छोटा|


तुम से छोटा राष्ट्र हिन्द का, तुम्हीं बड़ी हो,
खूब तनी हो,खूब अड़ी हो,खूब लड़ी हो|

गांधी-नेहरू तुम से दोनों हुए उजागर,
तुम्हें चाहते सारी दुनिया के नटनागर|
रूस तुम्हें ताक़त देगा, अमरीका पैसा,
तुम्हें पता है, किससे सौदा होगा कैसा|


ब्रेझनेव के सिवा तुम्हारा नहीं सहारा,
कौन सहेगा धौंस तुम्हारी, मान तुम्हारा|
हल्दी. धनिया, मिर्च, प्याज सब तो लेती हो,
याद करो औरों को तुम क्या-क्या देती हो|

मौज, मज़ा, तिकड़म, खुदगर्जी, डाह, शरारत,
बेईमानी, दगा, झूठ की चली तिजारत|
मलका हो तुम ठगों-उचक्कों के गिरोह में,
जिद्दी हो, बस, डूबी हो आकण्ठ मोह में|


यह कमज़ोरी ही तुमको अब ले डूबेगी,
आज नहीं तो कल सारी जनता ऊबेगी|
लाभ-लोभ की पुतली हो, छलिया माई हो,
मस्तानों की माँ हो, गुण्डों की धाई हो|

सुदृढ़ प्रशासन का मतलब है प्रबल पिटाई,
सुदृढ़ प्रशासन का मतलब है ‘इन्द्रा’ माई|
बन्दूकें ही हुईं आज माध्यम शासन का,
गोली ही पर्याय बन गई है राशन का|


शिक्षा केन्द्र बनेंगे अब तो फौजी अड्डे,
हुकुम चलाएँगे ताशों के तीन तिगड्डे|
बेगम होगी, इर्द-गिर्द बस गूल्लू होंगे,
मोर न होगा, हंस न होगा, उल्लू होंगे|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए!

आज मैं फिर से एक बार दुष्यंत कुमार जी की एक गज़ल शेयर कर रहा हूँ। जैसा कि मैंने पहले भी लिखा है, दुष्यंत कुमार जी आपात्काल में लिखी गई अपनी गज़लों के कारण बहुत प्रसिद्ध हुए थे। मैंने पहले भी उनकी कुछ गज़लें शेयर की हैं।

आज की इस गज़ल में जन-साधारण का उनके कष्टपूर्ण जीवन की ओर ध्यान दिलाते हुए, यह आवाह्न किया गया है कि अब इन कष्टों का अंत होना चाहिए और इसके लिए प्रत्येक जीर्ण-शीर्ण मनुष्य को विद्रोह की मुद्रा में आगे बढ़ना चाहिए और एक सशक्त जन-आंदोलन प्रारंभ होना चाहिए।

 

 

लीजिए प्रस्तुत है उनकी यह प्रसिद्ध गज़ल-

 

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

 

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।

 

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

 

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

 

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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