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मैं तेरी ही रुबाई हूँ!

आज ही समाचार मिला कि कवि सम्मेलनों को अपनी सृजनशील और सुरीली प्रस्तुतियों से गरिमा प्रदान करने वाले डॉक्टर कुँवर बेचैन नहीं रहे| मैं उनको श्रद्धांजलि स्वरूप, अपनी पुरानी ब्लॉग पोस्ट्स से उनकी दो रचनाएँ पुनः प्रस्तुत कर रहा हूँ|

डॉ कुँवर बेचैन जी मेरे अग्रजों में रहे हैं, उनके दो गीत आज शेयर कर रहा हूँ| बेचैन जी उस महानन्द मिशन कॉलेज, गाजियाबाद में प्रोफेसर रहे हैं जहां मैंने कुछ समय अध्ययन किया, यद्यपि मेरे विषय अलग थे|
दिल्ली में रहते हुए गोष्ठियों आदि में उनको सुनने का अवसर मिल जाता था, बाद में जब मैं अपनी नियोजक संस्था के लिए आयोजन करता तब उनको वहाँ आमंत्रित करने का अवसर भी मिला|


बेचैन जी कविता के लिए समर्पित व्यक्ति थे और एक से एक मधुर और प्रभावशाली गीत उन्होंने लिखे हैं| यह रचनाएँ भी अपने आप में अलग तरह की हैं|

लीजिए प्रस्तुत है बेचैन जी की यह रचना –

प्यासे होंठों से जब कोई झील न बोली बाबू जी,
हमने अपने ही आँसू से आँख भिगो ली बाबू जी|


भोर नहीं काला सपना था पलकों के दरवाज़े पर,
हमने यों ही डर के मारे आँख न खोली बाबू जी|


दिल के अंदर ज़ख्म बहुत हैं इनका भी उपचार करो,
जिसने हम पर तीर चलाए मारो गोली बाबू जी|


हम पर कोई वार न करना हैं कहार हम शब्द नहीं,
अपने ही कंधों पर है कविता की डोली बाबू जी|


यह मत पूछो हमको क्या-क्या दुनिया ने त्यौहार दिए,
मिली हमें अंधी दीवाली, गूँगी होली बाबू जी|


सुबह सवेरे जिन हाथों को मेहनत के घर भेजा था,
वही शाम को लेकर लौटे खाली झोली बाबू जी|


एक और गीत, जो बिलकुल अलग तरह का है-


नदी बोली समन्दर से, मैं तेरे पास आई हूँ।
मुझे भी गा मेरे शायर, मैं तेरी ही रुबाई हूँ।।


मुझे ऊँचाइयों का वो अकेलापन नहीं भाया;
लहर होते हुए भी तो मेरा मन न लहराया;
मुझे बाँधे रही ठंडे बरफ की रेशमी काया।
बड़ी मुश्किल से बन निर्झर, उतर पाई मैं धरती पर;
छुपा कर रख मुझे सागर, पसीने की कमाई हूँ।।


मुझे पत्थर कभी घाटियों के प्यार ने रोका;
कभी कलियों कभी फूलों भरे त्यौहार ने रोका;
मुझे कर्तव्य से ज़्यादा किसी अधिकार ने रोका।
मगर मैं रुक नहीं पाई, मैं तेरे घर चली आई;
मैं धड़कन हूँ मैं अँगड़ाई, तेरे दिल में समाई हूँ।।


पहन कर चाँद की नथनी, सितारों से भरा आँचल;
नये जल की नई बूँदें, नये घुँघरू नई पायल;
नया झूमर नई टिकुली, नई बिंदिया नया काजल।
पहन आई मैं हर गहना, कि तेरे साथ ही रहना;
लहर की चूड़ियाँ पहना, मैं पानी की कलाई हूँ।|


एक बार फिर से मैं इस सुरीले कवि और महान इंसान को अपनी भाव-भीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ| ईश्वर उनको अपने चरणों में स्थान दें|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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गीत ऋषि- देवेंद्र शर्मा ‘इंद्र’

आज के समय में काव्य-लेखन को साधना का नाम देने का कोई औचित्य दिखाई नहीं देता| आज अधिकांश लोग लिखना शुरू करते हैं तो उनके सामने एक लक्ष्य होता है, वह मंच हो या किसी अन्य प्रकार से प्रकाशन-प्रसारण आदि के माध्यम से कमाई और ख्याति अर्जित करना|

इन परिस्थितियों में स्वर्गीय देवेंद्र शर्मा ‘इंद्र’ जी जैसे लोग आज की दुनिया में लगभग नहीं के बराबर हैं| मेरे साहित्यिक मित्र श्री योगेंद्र दत्त शर्मा के, फेसबुक में लिखे गए आलेख के माध्यम से ज्ञात हुआ कि श्री देवेंद्र शर्मा ‘इंद्र’ जी नहीं रहे, जीवन है तो मृत्यु भी इससे जुड़ी एक सच्चाई है, परंतु यह समाचार सुनकर कुछ पुरानी यादें उमड़ आईं, इस बहाने से आज मैं कविता और विशेष रूप से नवगीत को समर्पित इस महान व्यक्तित्व का स्मरण करना चाहूँगा, जिन्होंने आज भी काव्य-लेखन को एक साधना का रूप दिया हुआ था|

एक बात और बताना चाहूँगा, मेरा विवाह भी इंद्र जी ने अपनी रिश्तेदारी में करा दिया था और इस प्रकार हम रिश्तेदार भी थे, परंतु इंद्र जी का रिश्तों की औपचारिकता में बिल्कुल विश्वास नहीं था, वे बोलते थे- ‘रिश्ता तोड़कर रिश्ता जोड़िए’|

मैं यहाँ संदर्भ के लिए बताना चाहूँगा कि मेरे बचपन से लेकर कुछ प्रारंभिक नौकरियां करने तक का समय, दिल्ली-शाहदरा में बीता जहां ‘इंद्र’ जी श्याम लाल कालेज में पढ़ाते थे| वहीं कवि गोष्ठियों में उनसे मिलने का सिलसिला प्रारंभ हुआ, मेरे वरिष्ठ कवि मित्र- श्री धनंजय सिंह के माध्यम से ही मेरा अधिकांश कवियों से मिलना हुआ और इंद्र जी से मुलाक़ात भी उनके माध्यम से ही हुई|


एकांत साधना क्या होती है, इसका उदाहरण मुझे इंद्र जी के जीवन में ही देखने को मिला| मैं भी उस समय थोड़ा बहुत गीत आदि लिख लेता था, और उसके लिए मुझे इंद्र जी जैसे अत्यंत वरिष्ठ कवि से जो प्रशंसा मिलती थी, उसको सुनकर मैं वास्तव में शर्मिंदा महसूस करता था| मैं काफी कम बोलता हूँ, इस पर इंद्र जी कहते थे ‘क्या तुमने कसम खाई है कि, जब बोलोगे गीत ही बोलोगे’!


खैर दिल्ली मैंने बहुत पहले 1980 में छोड़ दी थी, अतः लंबे समय से मैं इंद्र जी से संपर्क में नहीं था| इतना अवश्य कहना चाहता हूँ कि इंद्र जी की धर्मपत्नी का बहुत पहले स्वर्गवास हो चुका था और उनके बेटे भी उनके पास नहीं रहते थे, एक पुत्री थी जो उस समय जवान होने को थी लेकिन मानसिक रूप से अविकसित थी, बच्चों जैसी हरकतें करती थी, बाद में क्या स्थिति हुई पता नहीं, उस बच्ची के कारण वे कहीं जा भी नहीं पाते थे, ऐसे में वह क्या लगन थी जो उनसे निरंतर गीत लिखवाती जाती थी!


दिल्ली छोड़ने के बाद की एक घटना का उल्लेख करना चाहूँगा, मैं उस समय हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की खेतड़ी इकाई में काम करता था| मैंने चाहा कि इंद्र जी जैसे श्रेष्ठ रचनाकारों को भी कविता के मंच पर आना चाहिए| मैंने उनसे निवेदन किया तो उनकी शर्त वही थी, जिसे मैं जानता था, उन्होंने कहा कि मैं कोई मानदेय नहीं लूँगा| वे मानते थे कि कविता तो उनकी मानस-पुत्री है और बेटी की कमाई नहीं खानी चाहिए| खैर वे आयोजन में आए और हमने उनका सम्मान करने का सौभाग्य प्राप्त किया| यह संभवतः 1987 की बात है|


इंद्र जी के अनेक काव्य संकलन प्रकाशित हुए हैं, जिनके माध्यम से उन्होंने नवगीत, ग़ज़ल और दोहे- सभी क्षेत्रों में अपना उत्कृष्ट योगदान किया है|


बातें तो बहुत सारी हो सकती हैं, उस एकांत साधना करने वाले नवगीत विधा के शिखर पुरुष के संबंध में, परंतु मैं यहाँ उनका एक गीत शेयर करके उनको अपनी विनम्र श्रद्धांजलि देना चाहूँगा-


फूलों के बिस्तर पर
नींद क्यों नहीं आती,
चलो, कहीं सूली पर, सेज हम बिछाएँ ।

दूर-दूर तक कोई
नदी नहीं दिखती है ।
हिरणों की आँखों में
रेत प्यास लिखती है ।
घाटी में हँसते हैं,
बुत ही बुत पत्थर के,
चलो, कहीं सूने में, ख़ुद से बतियाएँ ।


आग हुई धुआँ-धुआँ
अँधियारा गहराया ।
पेड़ों पर पसर गया
गाढ़ा काला साया ।
आगे है मोड़ों पर
बियाबान सन्नाटा
चलो, कहीं पिछली पगडण्डी गुहराएँ ।


तुम से जो मुमकिन था
अभिनय वह ख़ूब किया ।
वह देखो सूर्यध्वज
जुगनू ने थाम लिया ।
मंच पर उभरने को
एक भीड़ आतुर है,
चलो, कहीं पर्दे के पीछे छिप जाएँ ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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फिर सुशांत की बात!

आज एक बार फिर से सुशांत सिंह राजपूत के बारे में बात करने का मन हो रहा है| सुशांत की मौत को दो महीने से ज्यादा समय बीत चुका है और समय बीतने के साथ यह तो स्पष्ट होता जा रहा है कि सुशांत जी ने आत्महत्या तो नहीं ही की है| कौन लोग थे इस हत्या के पीछे, उसके लिए तो सीबीआई इस मामले को देखेगी, क्योंकि मुंबई पुलिस के रुख से ऐसा बिलकुल नहीं लगता कि वे सच्चाई का पता लगाना चाहते हैं| अब ऐसा क्यों है, यह तो सही जांच होने पर ही पता चल पाएगा|


कौन इस घटना के दोषी हैं, इस बारे में तो मेरे पास कहने को कुछ नहीं है, क्योंकि मेरी ऐसी खोजी प्रवृत्ति नहीं है| मैं तो सुशांत सिंह राजपूत के बारे में ही कुछ बात करना चाहता हूँ| मुंबई फिल्म नगरी की दुनिया ही ग्लैमर की दुनिया है| बहुत समय से यहाँ बाहर वालों का प्रवेश काफी कठिन होता गया है| फिर जो लोग प्रवेश कर पाते हैं और हीरो बनने जैसी स्थिति में भी पहुँच पाते हैं, उनको यहाँ पहले से जमे हुए लोगों, उनके शक्तिशाली समूह से बनाकर रखनी पड़ती है, उनकी हाँ में हाँ मिलानी पड़ती है और ऐसा भी कहा जाता है कि वहाँ माफिया की शरण में रहना पड़ता है|


हम, फिल्मी कलाकारों के जीवन काल में उनके ग्लैमर, उनकी सफल भूमिकाओं और वे अपने साक्षात्कारों आदि में जो कुछ अपने बारे में बताते हैं, वही जानते हैं| सुशांत सिंह राजपूत की दुर्भाग्यपूर्ण मृत्यु के बाद उनके बारे में अनेक बातें मालूम हुईं, जो उनकी फिल्मी भूमिकाओं से अलग हैं|


यह तो हम जानते हैं कि फिल्मी दुनिया में लोग पढ़ाई में कमाल करने वाले बहुत कम होते हैं| किसी जमाने में बलराज साहनी जैसे कुछ पढे-लिखे लोग थे| आज के समय में जो कुछ पढे-लिखे लोग फिल्मों में रहे हैं उनमें सुशांत सिंह राजपूत एक हैं, इतना ही नहीं वे टॉपर भी रहे, उन्होंने एक विशेष दूरबीन भी ली हुई थी, जिससे वे नक्षत्रों को देखते थे| बाकायदा योजना बनाकर वे निरंतर आगे बढ़ रहे थे| वे बहुत उदार और आस्थावान भी थे, बहुत से लोगों की उन्होंने ऐसी मदद की जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती| उनकी लिव-इन पार्टनर ने भी उनका भरपूर फायदा उठाया और उनके पैसे से बनी कंपनी में अपने परिवार को सारे अधिकार सौंप दिए और उनके खर्च पर पर दुनिया घूम ली|


ऐसी अनेक बातें सुशांत जी की मृत्यु के बाद पता चल रही हैं कि वे कितने उदार, खुशदिल और आस्थावान मनुष्य थे| यह सब जानने के बाद हर किसी की यह और भी इच्छा है कि इस मामले के दोषियों को कड़ी सज़ा दी जाए और यदि वहाँ कोई दुष्ट माफिया काम कर रहा है, जो प्रतिभाशाली लोगों के विरुद्ध काम करता है तो उसको जड़ से उखाड़ फेंका जाए|


आज एक बार फिर उस प्रतिभाशाली कलाकार और एक उम्दा इंसान का आदरपूर्वक स्मरण करने का मन हो रहा है, काश ऐसी प्रतिभा के अंत के पीछे जो लोग हैं उन्हें ऐसा दंड मिले कि वे फिर से किसी प्रतिभा का गला नहीं घोट पाएँ|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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