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अलविदा राहत इंदौरी जी!

विख्यात उर्दू शायर और फिल्मी गीतकार राहत इंदौरी जी नहीं रहे| जैसा कि राहत जी ने खुद ही अपने संदेश द्वारा अपने प्रशंसकों को सूचित किया था, वे कोरोना पॉज़िटिव पाए जाने के बाद इंदौर के अरविंदो अस्पताल में भर्ती हुए थे और शायद 24 घंटे से कम अवधि में ही दिल का दौरा पड़ जाने के कारण उनकी मृत्यु हो गई| 1जनवरी 1950 को जन्मे राहत जी 70 वर्ष के थे| कोरोना के साथ ये विशेष खतरा रहता है कि यदि व्यक्ति की उम्र अधिक है अथवा उसको कोई गंभीर रोग है, जैसे – मधुमेह, हृदय रोग आदि तो कोरोना की स्थिति में उसकी आंतरिक सुरक्षा प्रणाली कमजोर हो जाने के कारण मृत्यु का खतरा अधिक हो जाता है|


किसी का अंदाज़-ए-बयां अक्सर उसकी पहचान बनता है और रचनात्मकता के क्षेत्र में तो यही मुख्य बात होती है| किसी ने कहा था कि अगर आप कविता में लिखते हैं कि ‘मैं भूखा हूँ’ तो यह बात तो कोई वास्तव में भूखा व्यक्ति ज्यादा प्रभावी ढंग से कह सकता है| आपकी रचना की खूबसूरती तो इसमें है कि आप ‘भूख’ शब्द का प्रयोग किए बिना उसका एहसास करा दें|


राहत जी का अंदाज़ वास्तव में निराला था, जैसे कविता के बारे में यह भी कहा जाता है ‘दिव्य अर्थ का प्रतिपादन’! राहत जी को मुशायरे लूटने वाला शायर कहा जाता था| उनके मंच पर आते ही श्रोता मानते थे कि अब मज़ा आने वाला है| उनकी याद में आज मैं उनके कुछ छिटपुट शेर प्रस्तुत करते हुए उनको अपनी विनम्र श्रद्धांजलि देना चाहूँगा-


रोज तारों की नुमाइश में खलल पड़ता है,
चाँद पागल है, अंधेरे में निकाल पड़ता है|
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बनके इक हादसा किरदार में आ जाएगा,
जो हुआ ही नहीं अखबार में आ जाएगा|
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ज़रूर वो मेरे बारे में राय दे लेकिन
ये पूछ लेना कभी मुझसे वो मिला भी है|
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दिल का मंदिर बड़ा वीरान नज़र आता है
सोचता हूँ तेरी तस्वीर लगा कर देखूँ|
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मैं देर रात गए जब भी घर पहुँचता हूँ
वो देखती है बहुत छान के, फटक के मुझे|
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मैं बस्ती में आख़िर किस से बात करूँ,
मेरे जैसा कोई पागल भेजो न|
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नींद से मेरा त’अल्लुक़ ही नहीं बरसों से,
ख्वाब आ आ के मेरी छत पे टहलते क्यों हैं|

मैं न जुगनू हूँ, दिया हूँ न कोई तारा हूँ, रोशनी वाले मेरे नाम से जलते क्यों हैं|
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उसकी कत्थई आँखों में हैं जंतर-मंतर सब,
चाक़ू-वाक़ू, छुरियाँ-वुरियाँ, ख़ंजर-वंजर सब|
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दोस्ती जब किसी से की जाये|
दुश्मनों की भी राय ली जाये|


ये कुछ शेर राहत जी के, उनकी याद में शेयर कर रहा हूँ, वैसे तो उनके शेर और गज़लें शामिल करने के लिए बहुत से ग्रंथ भी कम पड़ जाएंगे| इन शब्दों के साथ में इस जनता के लाडले शायर को अपनी श्रद्धांजलि देता हूँ|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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