दरिया की अना का होता!

यूँ भी इक बार तो होता कि समुंदर बहता,
कोई एहसास तो दरिया की अना का होता|

गुलज़ार

मौसम को उस्ताद किया!

दानाओं की बात न मानी काम आई नादानी ही,
सुना हवा को पढ़ा नदी को मौसम को उस्ताद किया|

निदा फ़ाज़ली

समुंदर की तरफ़ जाना भी!

ख़ुद को पहचान के देखे तो ज़रा ये दरिया,
भूल जाएगा समुंदर की तरफ़ जाना भी|

वसीम बरेलवी

पार अकेले उतर गया कब का!

वो जो लाया था हम को दरिया तक,
पार अकेले उतर गया कब का|

जावेद अख़्तर

तो समुंदर तलाश कर!

सूरज के इर्द-गिर्द भटकने से फ़ाएदा,
दरिया हुआ है गुम तो समुंदर तलाश कर|

निदा फ़ाज़ली

जिसे दरिया किनारे छोड़ देता है!

बिछड़ के तुझसे कुछ जाना अगर तो इस क़दर जाना,
वो मिट्टी हूँ जिसे दरिया किनारे छोड़ देता है|

वसीम बरेलवी

तूफ़ान का रुख़ मोड़ देता है!

जहाँ दरिया कहीं अपने किनारे छोड़ देता है,
कोई उठता है और तूफ़ान का रुख़ मोड़ देता है|

वसीम बरेलवी

दरिया है कि तुम हो!

इक दर्द का फैला हुआ सहरा है कि मैं हूँ,
इक मौज में आया हुआ दरिया है कि तुम हो|

अहमद फ़राज़

कभी क़तरा है बहुत!

तिश्नगी के भी मक़ामात हैं क्या क्या यानी,
कभी दरिया नहीं काफ़ी कभी क़तरा है बहुत|

कृष्ण बिहारी ‘नूर’

नद्दी कोई बल खाए तो लगता है!

ओढ़े हुए तारों की चमकती हुई चादर,
नद्दी कोई बल खाए तो लगता है कि तुम हो|

जाँ निसार अख़्तर