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आग पानी में लगाते हुए हालात की रात!

पुराने फिल्मी गीतों को सुनकर यही खयाल आता है कि कितनी मेहनत करते थे गीतकार, संगीतकार और गायक भी उन गीतों की अदायगी में जैसे अपनी आत्मा को उंडेल देते थे|


लीजिए आज प्रस्तुत है, 1960 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘बरसात की रात’ के लिए रफ़ी साहब का गाया यह गीत, जिसे लिखा था साहिर लुधियानवी जी ने और इसका संगीत दिया था रोशन जी ने-

ज़िन्दगी भर नहीं भूलेगी वो बरसात की रात,
एक अंजान हसीना से मुलाक़ात की रात|

हाय वो रेशमी जुल्फ़ों से बरसता पानी,
फूल से गालों पे रुकने को तरसता पानी|
दिल में तूफ़ान उठाते हुए जज़्बात की रात|
ज़िन्दगी भर…

डर के बिजली से अचानक वो लिपटना उसका,
और फिर शर्म से बलखा के सिमटना उसका,
कभी देखी न सुनी ऐसी तिलिस्मात की रात|
ज़िन्दगी भर…

सुर्ख आँचल को दबाकर जो निचोड़ा उसने,
दिल पर जलता हुआ एक तीर सा छोड़ा उसने,
आग पानी में लगाते हुए हालात की रात|
ज़िन्दगी भर…


मेरे नगमों में जो बसती है वो तस्वीर थी वो,
नौजवानी के हसीं ख्वाब की ताबीर थी वो,
आसमानों से उतर आई थी जो रात की रात|
ज़िन्दगी भर…


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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प्यार से भीगा प्रकृति का गात साथी!

स्वर्गीय भारत भूषण जी मेरे परम प्रिय कवि रहे हैं, कवि सम्मेलनों में उनका कविता पाठ सुनना, वास्तव में वहाँ जाने की क्रिया को सार्थक कर देता था| बहुत भाव-विभोर होकर वे सस्वर काव्य-पाठ करते थे|



आज का भारत भूषण जी का यह गीत दर्शाता है कि किस प्रकार पूरे संयम और मर्यादा के साथ, सार्थक प्रणय गीत लिखा जा सकता है-

आज पहली बात पहली रात साथी|

चाँदनी ओढ़े धरा सोई हुई है,
श्याम अलकों में किरण खोई हुई है|
प्यार से भीगा प्रकृति का गात साथी,
आज पहली बात पहली रात साथी|

मौन सर में कंज की आँखें मुंदी हैं,
गोद में प्रिय भृंग हैं बाहें बँधी हैं,
दूर है सूरज, सुदूर प्रभात साथी,
आज पहली बात पहली रात साथी|

आज तुम भी लाज के बंधन मिटाओ,
खुद किसी के हो चलो अपना बनाओ,
है यही जीवन, नहीं अपघात साथी|
आज पहली बात पहली रात साथी|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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ये आप हैं तो आप पे क़ुर्बान जाइये!

कविता- शायरी, गीत-ग़ज़ल आदि अभिव्यक्ति के नायाब नमूने होते हैं| वैसे तो हमारे नेता लोग जो भाषण में माहिर होते हैं, वे भाषा के अच्छे उदाहरण प्रस्तुत करते हैं| उपन्यास-कहानी आदि में भी हम बहुत सुंदर अभिव्यक्तियाँ पाते हैं| परंतु कविता-गीत-ग़ज़ल आदि में विशेष बात होती है| यहाँ बहुत ज्यादा शब्द नहीं होते| यहाँ कम शब्दों में ‘दिव्य अर्थ प्रतिपादन’ की शर्त होती है| ज़रूरी नहीं कि कविता-ग़ज़ल आदि बड़ी हो, थोड़े शब्दों में ही ये ज्यादा बड़ी अभिव्यक्ति करते हैं|


आज प्रस्तुत है क़तील शिफ़ाई जी की एक खूबसूरत ग़ज़ल, जिसमें कम शब्दों में ही बहुत सुंदर बात की गई है-


पहले तो अपने दिल की रज़ा जान जाइये,
फिर जो निगाह-ए-यार कहे मान जाइये|

पहले मिज़ाज-ए-राहगुज़र जान जाइये,
फिर गर्द-ए-राह जो भी कहे मान जाइये|

कुछ कह रही हैं आपके सीने की धड़कनें,
मेरी सुनें तो दिल का कहा मान जाइये|

इक धूप सी जमी है निगाहों के आस पास,
ये आप हैं तो आप पे क़ुर्बान जाइये|

शायद हुज़ूर से कोई निस्बत हमें भी हो,
आँखों में झाँक कर हमें पहचान जाइये|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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मकान ख़ाली हुआ है, तो कोई आएगा!

आज उर्दू शायरी में अपनी अलग पहचान बनाने वाले, डॉक्टर बशीर बद्र जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| बशीर बद्र जी शायरी में प्रयोग करने के लिए विख्यात हैं|


आज मैं उनकी जो ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ, वह एक रूमानी ग़ज़ल है| हमेशा सीरियस बातें तो ठीक नहीं हैं, इसलिए आज इस रूमानी ग़ज़ल का आनंद लीजिए-



अगर तलाश करूँ कोई मिल ही जाएगा,
मगर तुम्हारी तरह कौन मुझ को चाहेगा|

तुम्हें ज़रूर कोई चाहतों से देखेगा,
मगर वो आँखें हमारी कहाँ से लाएगा|

न जाने कब तेरे दिल पर नई सी दस्तक हो,
मकान ख़ाली हुआ है तो कोई आएगा |

मैं अपनी राह में दीवार बन के बैठा हूँ ,
अगर वो आया तो किस रास्ते से आएगा |

तुम्हारे साथ ये मौसम फ़रिश्तों जैसा है,
तुम्हारे बाद ये मौसम बहुत सताएगा |

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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क्षण भर को क्यों प्यार किया था?

आज मैं स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ, आज की पीढ़ी उनको अमिताभ बच्चन के पिता के रूप में अधिक जानती है, परंतु किसी ज़माने वे हिन्दी कवि सम्मेलनों के अत्यंत लोकप्रिय कवि हुआ करते थे| उनकी ‘मधुशाला’ ने तो लोकप्रियता के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे, लोग इसको सुनकर झूम उठते थे| उन्होंने प्रेम के, विरह के और विद्रोह के भी गीत लिखे हैं, उनकी एक कविता तो फिल्म- अग्निपथ में काफी गूंजी थी| अनेक लोकगीत शैली के गीत भी उन्होंने लिखे थे- जैसे ‘ए री महुआ के नीचे मोती झरें’|


मुझे याद है आकाशवाणी में उनके एक साक्षात्कार में किसी ने उनसे पूछ लिया था कि क्या उनकी ‘कविताओं की लोकप्रियता का कारण यह है कि उनकी भाषा बहुत सरल है’, इस पर वो बोले थे कि ‘भाषा सरल होना इतना आसान नहीं है, यदि आपका मन निर्मल नहीं होगा, तो आपकी भाषा सरल हो ही नहीं पाएगी’|


आज का उनका यह गीत, एक रूमानी गीत है, आइए इसका आनंद लेते हैं-



क्षण भर को क्यों प्यार किया था?

अर्द्ध रात्रि में सहसा उठकर,
पलक संपुटों में मदिरा भर
तुमने क्यों मेरे चरणों में अपना तन-मन वार दिया था?
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?


यह अधिकार कहाँ से लाया?’
और न कुछ मैं कहने पाया –
मेरे अधरों पर निज अधरों का तुमने रख भार दिया था!
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?

वह क्षण अमर हुआ जीवन में,
आज राग जो उठता मन में –
यह प्रतिध्वनि उसकी जो उर में तुमने भर उद्गार दिया था!
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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हमको दिवाना तुमको, काली घटा कहेंगे!

हमारी फिल्में हों अथवा कहानी हो, उपन्यास हो, इन सबमें जीवन को ही तो चित्रित किया जाता है| और जीवन में अच्छे-बुरे सभी तरह के अनुभव होते हैं| जैसे दर्द भरे नगमे भी हमारी फिल्मों में बहुत सारे हैं, देशभक्ति के भी हैं, किसी भी भाव के लिए, जो हमारे मन में आ सकता है, उससे जुड़े हुए गीत हमारी फिल्मों में मिल जाएंगे|


आज रोमांस और मस्ती से जुड़ा एक युगल गीत यहाँ शेयर कर रहा हूँ| यह गीत मजरूह सुल्तानपुरी जी ने लिखा है और ‘गंगा की लहरें’ फिल्म के लिए किशोर कुमार जी और लता मंगेशकर जी ने बड़े मस्ती भरे अंदाज़ में गाया है|


लीजिए प्रस्तुत है यह गीत-



-छेड़ो न मेरी जुल्फें,
सब लोग क्या कहेंगे|

-हमको दिवाना तुमको
काली घटा कहेंगे|

छेड़ो न मेरी जुल्फें||

-आती है शर्म हमको
रोको ये प्यारी बातें|

-जो तुम को जानते हैं,
वो जानते है तुम्हारी बातें|

तुम कह लो शर्म इसको
हम तो अदा कहेंगे|

छेड़ो न मेरी जुल्फें||


-मैं प्यार हूँ तुम्हारा
मेरा सलाम ले लो|


-तुम इस को प्यार समझो
तुम इसको
चाहत का नाम दे लो,
लेकिन ज़माने वाले
इस को खता कहेंगे|

-हम को दिवाना तुमको
काली घटा कहेंगे|

छेड़ो न मेरी जुल्फें||

-तौबा तेरी नज़र के
मस्ती भरे इशारे|


-देखेंगे हमको तुमको
जो मुस्करा के सारे,
उल्फत में दो दिलों को
बहका हुआ कहेंगे|

छेड़ो न मेरी जुल्फें||



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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संगीत की देवी स्वर-सजनी!

आज फिर से पुराने ब्लॉग का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है ये पुरानी ब्लॉग पोस्ट-

 

 

ज़िंदगी सिर्फ मोहब्बत नहीं कुछ और भी है,
ज़ुल्फ-ओ-रुखसार की जन्नत नहीं कुछ और भी है,
भूख और प्यास की मारी हुई इस दुनिया में
इश्क़ ही एक हक़ीकत नहीं, कुछ और भी है।

 

तुम अगर नाज़ उठाओ तो, ये हक़ है तुमको
मैंने तुमसे ही नहीं, सबसे मोहब्बत की है।

 

आज हक़ीकत और कल्पना पर आधारित कुछ फिल्मी गीतों के बारे में बात करते हैं। ऊपर जिस गीत के बोल लिखे गए हैं, वह हक़ीकत के बोझ से दबे, ज़िम्मेदार शायर के बोल हैं, जो देखता है कि दुनिया में इतने दुख हैं, ऐसे में कैसे किसी एक के प्यार में पागल हुआ जाए।

अब कल्पना की धुर उड़ान के बारे में बात कर ली जाए, जहाँ प्रेमी अपने तसव्वुर में इतना पागल है कि सामने जो हक़ीकत है उसको स्वीकार नहीं कर पाता और देखें उसकी कल्पना की उड़ान कितनी दूर तक जाती है-

चंचल, शीतल, निर्मल, कोमल, संगीत की देवी स्वर-सजनी,
सुंदरता की हर मूरत से, बढ़कर के है तू सुंदर सजनी।

 

दीवानगी का एक और आलम ये भी है-

 

ये तो कहो कौन हो तुम, कौन हो तुम,
हमसे पूछे बिना दिल में आने लगे,
नीची नज़रों से बिजली गिराने लगे।

 

एक और मिसाल-

मेहताब तेरा चेहरा, एक ख्वाब में देखा था,
ऐ जान-ए-जहाँ बतला,
बतला कि तू कौन है।

 

और जवाब-

ख्वाबों में मिले अक्सर,
एक राह चले मिलकर,
फिर भी है यही बेहतर-
मत पूछ मैं कौन हूँ।

 

और इसके बाद फिर हक़ीकत की पथरीली ज़मीन पर आते हैं-

देख उनको जो यहाँ सोते हैं फुटपाथों पर,
लाश भी जिनकी कफन तक न यहाँ पाती है,
पहले उन सबके लिए, एक इमारत गढ़ लूं,
फिर तेरी मांग सितारों से भरी जाएगी।

 

आज के लिए इतना ही!
नमस्कार।

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