सैंकड़ों आज़ार से लग जाते हैं!

इश्क़ आग़ाज़ में हल्की सी ख़लिश रखता है,
बाद में सैंकड़ों आज़ार से लग जाते हैं|

अहमद फ़राज़

क्या ख़ता दरगुज़र नहीं होती!

दोस्तो इश्क़ है ख़ता लेकिन,
क्या ख़ता दरगुज़र नहीं होती|

इब्न ए इंशा

ये आरिज़ा अच्छा नहीं होता!

अल्लाह बचाए मरज़-ए-इश्क़ से दिल को,
सुनते हैं कि ये आरिज़ा अच्छा नहीं होता|

अकबर इलाहाबादी

तेरे हिज्र में तन्हा समझ बैठे थे हम!

रफ़्ता रफ़्ता इश्क़ मानूस-ए-जहाँ होता चला,
ख़ुद को तेरे हिज्र में तन्हा समझ बैठे थे हम|

फ़िराक़ गोरखपुरी

अपने को दीवाना समझ बैठे थे हम!

होश की तौफ़ीक़ भी कब अहल-ए-दिल को हो सकी,
इश्क़ में अपने को दीवाना समझ बैठे थे हम|

फ़िराक़ गोरखपुरी

प्रेयसी!

आज हिन्दी कविता के शिखर पुरुष स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी की प्रेम से, सौन्दर्य से जुड़ी एक लंबी कविता का कुछ अंश मैं प्रस्तुत कर रहा हूँ| महाप्राण निराला जी की अन्य कविताओं की तरह यह कविता भी लाज़वाब है|
लीजिए, आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी की यह कविता –

घेर अंग-अंग को
लहरी तरंग वह प्रथम तारुण्य की,
ज्योतिर्मयि-लता-सी हुई मैं तत्काल
घेर निज तरु-तन।

खिले नव पुष्प जग प्रथम सुगन्ध के,
प्रथम वसन्त में गुच्छ-गुच्छ।
दृगों को रँग गयी प्रथम प्रणय-रश्मि-
चूर्ण हो विच्छुरित
विश्व-ऐश्वर्य को स्फुरित करती रही
बहु रंग-भाव भर
शिशिर ज्यों पत्र पर कनक-प्रभात के,
किरण-सम्पात से।

दर्शन-समुत्सुक युवाकुल पतंग ज्यों
विचरते मञ्जु-मुख
गुञ्ज-मृदु अलि-पुञ्ज
मुखर उर मौन वा स्तुति-गीत में हरे।
प्रस्रवण झरते आनन्द के चतुर्दिक-
भरते अन्तर पुलकराशि से बार-बार
चक्राकार कलरव-तरंगों के मध्य में
उठी हुई उर्वशी-सी,
कम्पित प्रतनु-भार,
विस्तृत दिगन्त के पार प्रिय बद्ध-दृष्टि
निश्चल अरूप में।

हुआ रूप-दर्शन
जब कृतविद्य तुम मिले
विद्या को दृगों से,
मिला लावण्य ज्यों मूर्ति को मोहकर,-
शेफालिका को शुभ हीरक-सुमन-हार,-
श्रृंगार
शुचिदृष्टि मूक रस-सृष्टि को।

याद है, उषःकाल,-
प्रथम-किरण-कम्प प्राची के दृगों में,
प्रथम पुलक फुल्ल चुम्बित वसन्त की
मञ्जरित लता पर,
प्रथम विहग-बालिकाओं का मुखर स्वर
प्रणय-मिलन-गान,
प्रथम विकच कलि वृन्त पर नग्न-तनु
प्राथमिक पवन के स्पर्श से काँपती;

करती विहार
उपवन में मैं, छिन्न-हार
मुक्ता-सी निःसंग,
बहु रूप-रंग वे देखती, सोचती;
मिले तुम एकाएक;
देख मैं रुक गयी:-
चल पद हुए अचल,
आप ही अपल दृष्टि,
फैला समाष्टि में खिंच स्तब्ध मन हुआ।

दिये नहीं प्राण जो इच्छा से दूसरे को,
इच्छा से प्राण वे दूसरे के हो गये !
दूर थी,
खिंचकर समीप ज्यों मैं हुई।
अपनी ही दृष्टि में;
जो था समीप विश्व,
दूर दूरतर दिखा।

मिली ज्योति छबि से तुम्हारी
ज्योति-छबि मेरी,
नीलिमा ज्यों शून्य से;
बँधकर मैं रह गयी;
डूब गये प्राणों में
पल्लव-लता-भार
वन-पुष्प-तरु-हार
कूजन-मधुर चल विश्व के दृश्य सब,-
सुन्दर गगन के भी रूप दर्शन सकल-
सूर्य-हीरकधरा प्रकृति नीलाम्बरा,
सन्देशवाहक बलाहक विदेश के।
प्रणय के प्रलय में सीमा सब खो गयी !

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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एक ही से प्यार हो ऐसा नहीं होता!

जो हो इक बार वो हर बार हो ऐसा नहीं होता,
हमेशा एक ही से प्यार हो ऐसा नहीं होता|

निदा फ़ाज़ली

गो कहानी बहुत पुरानी है!

आज भी सुन रहे हैं क़िस्सा-ए-इश्क़,
गो कहानी बहुत पुरानी है|

फ़िराक़ गोरखपुरी

रब्त बढ़ाना बहुत हुआ!

अब हम हैं और सारे ज़माने की दुश्मनी,
उससे ज़रा सा रब्त बढ़ाना बहुत हुआ|

अहमद फ़राज़

धोका है सब मगर फिर भी!

किसी का यूँ तो हुआ कौन उम्र भर फिर भी,
ये हुस्न ओ इश्क़ तो धोका है सब मगर फिर भी|

फ़िराक़ गोरखपुरी