दिल चुरा कर न हमको !

स्वर्गीय गोपाल सिंह ‘नेपाली’ जी की एक रूमानी कविता आज शेयर कर रहा हूँ| नेपाली जी अपने समय के सुरीले कवियों, गीतकारों में गिने जाते थे और कवि सम्मेलनों में उनका काव्य पाठ सुनने के लिए भी श्रोता लालायित रहते थे|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गोपाल सिंह ‘नेपाली’ जी की यह कविता–

दिल चुरा कर न हमको बुलाया करो,
गुनगुना कर न गम को सुलाया करो|

दो दिलों के मिलन का यहाँ है चलन
खुद न आया करो तो बुलाया करो,
रंग भी गुल शमा के बदलने लगे
तुम हमीं को न कस्में खिलाया करो,

सर झुकाया गगन ने धरा मिल गई
तुम न पलकें सुबह तक झुकाया करो,
सिंधु के पार को चांद जागा करे
तुम न पायल अकेली बजाया करो|

मन्दिरों में तरसते उमर बिक गई
सर झुकाते झुकाते कमर झुक गई,
घूम तारे रहे रात की नाव में
आज है रतजगा प्यार के गाँव में|

दो दिलों का मिलन है यहाँ का चलन
खुद न आया करो तो बुलाया करो,
नाचता प्यार है हुस्न की छाँव में
हाथ देकर न उंगली छुड़ाया करो|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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जाने न नज़र पहचाने जिगर!

एक बार फिर से मैं, हम सबके प्रिय गायक मुकेश जी और लता मंगेशकर जी के गाये एक युगल गीत के बोल प्रस्तुत कर रहा हूँ, यह गीत राज कपूर साहब की फिल्म ‘आह’ के लिए लिखा था हसरत जयपुरी जी ने और इसका मधुर संगीत तैयार किया था शंकर-जयकिशन की प्रसिद्ध जोड़ी ने|

लीजिए प्रस्तुत है मुकेश जी और लता जी के स्वर में, राज कपूर साहब की फिल्म- ‘आह’ का हमारे मन में बसा हुआ यह रोमांटिक गीत:


जाने न नज़र पहचाने जिगर
ये कौन जो दिल पर छाया
मेरा अंग अंग मुस्काया|

आवाज़ ये किसकी आती है
जो छेड़ के दिल को जाती है|
मैं सुन के जिसे शर्मा जाऊँ
है कौन जो दिल में समाया
मेरा अंग अंग मुस्काया|

जाने न नज़र पहचाने जिगर
ये कौन जो दिल पर छाया
मुझे रोज़ रोज़ तड़पाया|

ढूँढेंगे उसे हम तारों में
सावन की ठण्डी बहारों में,
पर हम भी किसी से कम तो नहीं
क्यों रूप को अपने छुपाया
मुझे रोज़ रोज़ तड़पाया|

बिन देखे जिसको प्यार करूँ
गर देखूँ उसको जान भी दूँ|
एक बार कहो ओ जादूगर
ये कौन सा खेल रचाया
मेरा अंग अंग मुस्काया|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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लौटकर नहीं आते!

मुहब्बतों के दिनों की यही ख़राबी है,
ये रूठ जाएँ तो फिर लौटकर नहीं आते|

वसीम बरेलवी

अरमान मेरे दिल का—

आँखें मुझे तल्वों से वो मलने नहीं देते,
अरमान मेरे दिल का निकलने नहीं देते|

अकबर इलाहाबादी

ओ शतरूपा !

एक बार फिर से आज मैं स्वर्गीय कुमार शिव जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| कुमार शिव जी की पंक्तियाँ जो मुझे हमेशा याद रहती हैं, वे हैं- ‘काले कपड़े पहने हुए सुबह देखी, देखी हमने अपनी सालगिरह देखी’ और ‘फ्यूज बल्बों के अद्भुद समारोह में, रोशनी को शहर से निकाला गया’|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कुमार शिव जी का यह सुंदर विरह गीत –



साँझ सकारे
अस्त, सूर्य के साथ हुए हम
बिना तुम्हारे
ओ शतरूपा !

ऐसे बिछुड़े
पुनर्मिलन फिर सम्भव कभी
नहीं हो पाया
यादों के जंगल में
किए रतजगे
कोई भोर न आया

नदी किनारे
लहरें देखीं, नयन हुए नम
बिना तुम्हारे
ओ शतरूपा !


कितने दिन बीते
जब हम पर
हरसिंगार के फूल झरे थे
बारिश में भीगे थे
बाँहों में हमने
कचनार भरे थे

आँसू खारे
ढूँढ़ रहे हैं अपना उदगम
बिना तुम्हारे
ओ शतरूपा !



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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तुम मेरी ग़ज़लें गाओगे!

बेचैनी जब बढ जायेगी और याद किसी की आयेगी,
तुम मेरी ग़ज़लें गाओगे जब इश्क़ तुम्हें हो जायेगा|

सईद राही

आईने से घबराओगे!

तनहाई के झूले झूलोगे, हर बात पुरानी भूलोगे
आईने से घबराओगे जब इश्क़ तुम्हें हो जायेगा

सईद राही

तावीज़ें भी बँधवाओगे!

हर बात गवारा कर लोगे, मन्नत भी उतारा कर लोगे,
तावीज़ें भी बँधवाओगे जब इश्क़ तुम्हें हो जायेगा|

सईद राही

जब इश्क़ तुम्हें हो जायेगा!

मेरे जैसे बन जाओगे जब इश्क़ तुम्हें हो जायेगा,
दीवारों से टकराओगे जब इश्क़ तुम्हें हो जायेगा|

सईद राही