दिल की वीरानी मुझे दे दो!

तुम अपना रंज-ओ-ग़म अपनी परेशानी मुझे दे दो,
तुम्हें ग़म की क़सम इस दिल की वीरानी मुझे दे दो|

साहिर लुधियानवी

कभी हालात पे रोना आया!

कभी ख़ुद पे कभी हालात पे रोना आया,
बात निकली तो हर इक बात पे रोना आया|

साहिर लुधियानवी

अपने आप पे कितना ग़ुरूर था!

शाम-ए-फ़िराक़ आई तो दिल डूबने लगा,
हमको भी अपने आप पे कितना ग़ुरूर था|

मुनीर नियाज़ी

न पूछा दिल पे ऐसी ख़राश क्यूँ है!

कोई अगर पूछता ये हमसे बताते हम गर तो क्या बताते,
भला हो सबका कि ये न पूछा कि दिल पे ऐसी ख़राश क्यूँ है|

जावेद अख़्तर

दर अपना ही खटखटा रहा हूँ!

मुमकिन है जवाब दे उदासी,
दर अपना ही खटखटा रहा हूँ|

क़तील शिफ़ाई

ये मसर्रत कहाँ कहाँ!

नैरंग-ए-इश्क़ की है कोई इंतिहा कि ये,
ये ग़म कहाँ कहाँ ये मसर्रत कहाँ कहाँ|

फ़िराक़ गोरखपुरी

और ‘कबीरा’ रोने लगता है!

मोहब्बत चार दिन की और उदासी ज़िंदगी भर की,
यही सब देखता है और ‘कबीरा’ रोने लगता है|

वसीम बरेलवी

बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाए!

अपना गम लेके कहीं और न जाया जाए,
घर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाए|

निदा फ़ाज़ली

अपनी ही किसी बात पे रोना आया!

कौन रोता है किसी और की ख़ातिर ऐ दोस्त,
सबको अपनी ही किसी बात पे रोना आया|

साहिर लुधियानवी

तुझसे मिल कर उदास रहता हूँ!

चंद कलियाँ निशात की चुनकर मुद्दतों महव-ए-यास रहता हूँ,
तेरा मिलना ख़ुशी की बात सही तुझसे मिल कर उदास रहता हूँ|

साहिर लुधियानवी