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Poetry

जाने कौन आस-पास होता है!

गुलज़ार साहब अपनी शायरी में और फिल्मी गीतों में भी एक्सपेरीमेंट करने के लिए जाने जाते हैं| एक अलग तरह का चमत्कार अक्सर उनकी शायरी और गीतों में देखा जाता है|

लीजिए आज प्रस्तुत है गुलज़ार साहब का यह गीत –

जब भी यह दिल उदास होता है,
जाने कौन आस-पास होता है|

होंठ चुपचाप बोलते हों जब,
सांस कुछ तेज़-तेज़ चलती हो|
आंखें जब दे रही हों आवाज़ें,
ठंडी आहों में सांस जलती हो|

आँख में तैरती हैं तसवीरें,
तेरा चेहरा तेरा ख़याल लिए|
आईना देखता है जब मुझको
एक मासूम सा सवाल लिए|


कोई वादा नहीं किया लेकिन,
क्यों तेरा इंतजार रहता है|
बेवजह जब क़रार मिल जाए,
दिल बड़ा बेकरार रहता है|

जब भी यह दिल उदास होता है,
जाने कौन आस-पास होता है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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Film Song

रहम जब अपने पे आता है तो हंस लेता हूँ!

आज पुरानी फिल्म- किनारे-किनारे के लिए मुकेश जी का गाया एक गीत शेयर कर रहा हूँ| यह गीत लिखा है न्याय शर्मा जी ने और इसका संगीत दिया है जयदेव जी ने|

यह जीवन बहुत जटिल है| कभी-कभी ऐसी स्थितियाँ बन जाती हैं कि किस बात पर हंसा जाए और किस बात पर रोया जाए पता ही नहीं चलता| कुछ ऐसी ही स्थिति का गीत है ये|

लीजिए आज प्रस्तुत है, मुकेश जी का गाया यह अमर गीत –

जब ग़म ए इश्क़ सताता है
तो हँस लेता हूँ,
हादसा याद जब आता है
तो हँस लेता हूँ|

मेरी उजड़ी हुई दुनिया में
तमन्ना का चिराग़,
जब कोई आ के जलाता है
है तो हँस लेता हूँ|

जब ग़म ए इश्क़ सताता है
तो हँस लेता हूँ|


कोई दावा नहीं फ़रियाद नहीं
तंज़ नहीं,
रहम जब अपने पे आता है
तो हँस लेता हूँ|

जब ग़म ए इश्क़ सताता
है तो हँस लेता हूँ.


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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शाम आई-याद आई!

लीजिए आज फिर से प्रस्तुत है, एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट-



कविताओं और फिल्मी गीतों में शाम को अक्सर यादों से जोड़ा जाता है। यह खयाल आता है कि ऐसा क्या है, जिसके कारण शाम यादों से जुड़ जाती है! यहाँ दो गीत याद आते हैं जो शाम और यादों का संबंध दर्शाते हैं। एक गीत रफी साहब का गाया हुआ, जिसकी पंक्तियां हैं-

हुई शाम उनका खयाल आ गया,
वही ज़िंदगी का सवाल आ गया।


अभी तक तो होंठों पे था, तबस्सुम का इक सिलसिला,
बहुत शादमां थे हम उनको भुलाकर, अचानक ये क्या हो गया,
कि चेहरे पे रंज़-ओ-मलाल आ गया।
हुई शाम उनका खयाल आ गया॥


हमें तो यही था गुरूर, गम-ए-यार है हमसे दूर,
वही गम जिसे हमने किस-किस जतन से, निकाला था इस दिल से दूर,
वो चलकर क़यामत की चाल आ गया।
हुई शाम उनका खयाल आ गया॥


लगता यही है कि दिन होता है गतिविधियों के लिए, जिनमें व्यक्ति व्यस्त रहता है, शाम होती है तो इंसान क्या पशु-पक्षी भी अपने बसेरों की ओर लौटते हैं। यह समय काम का नहीं सोचने का, चिंता का होता है। एक कविता की पंक्तियां याद आ रही हैं-

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है,
बच्चे प्रत्याशा में होंगे, नीड़ों से झांक रहे होंगे,
यह ध्यान परों में पंछी के, भरता कितनी चंचलता है।
हो जाए न पथ में रात कहीं, मंज़िल भी तो है दूर नहीं,
यह सोच थका दिन का पंथी, भी जल्दी-जल्दी चलता है।


खैर मैं बात कुछ और कर रहा था, ये पंक्तियां अचानक याद आ गईं, क्योंकि ये भी शाम और चिंता का संबंध जोड़ती हैं। हाँलाकि इसमें याद उन लोगों की आ रही है, जो अभी भी साथ हैं, शायद घर पर इंतज़ार कर रहे हैं।

शाम और याद के संबंध में दूसरा गीत जो याद आ रहा है, वो मुकेश जी का गाया हुआ फिल्म ‘आनंद’ का गीत है-

कहीं दूर जब दिन ढल जाए,
शाम की दुल्हन बदन चुराए, चुपके से आए,
मेरे खयालों के आंगन में, कोई सपनों के दीप जलाए।


कभी यूं ही, जब हुईं बोझल सांसें, भर आईं बैठे-बैठे जब यूं ही आंखें।
तभी मचल के, प्यार से चलके, छुए कोई मुझे पर नज़र न आए।
कहीं दूर जब दिन ढल जाए।।


कहीं तो ये दिल कभी मिल नहीं पाते, कहीं पे निकल आए जन्मों के नाते,
घनी ये उलझन, बैरी अपना मन, अपना ही होके सहे दर्द पराये।
कहीं दूर जब दिन ढल जाए।।


दिल जाने मेरे सारे भेद ये गहरे, हो गए कैसे मेरे सपने सुनहरे,
ये मेरे सपने, यही तो हैं अपने, मुझसे जुदा न होंगे, इनके ये साये।
कहीं दूर जब दिन ढल जाए॥


वैसे देखें तो शाम का और यादों का संबंध जोड़ने वाले बहुत सारे गीत मिल जाएंगे, और जब ये मर्ज़ बढ़ता है, तब तो पूरी रात भी जागकर गुज़रने लगता है, और इंसान तारों की चिंता करके उनसे कहने लगता कि यार तुम तो सो जाओ!

आज की शाम के लिए इतनी चिंता ही काफी है!
नमस्कार
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मोहब्बत रास्ता ही रास्ता है!

आज मैं प्रसिद्ध उर्दू शायर जनाब असद भोपाली जी की एक खूबसूरत सी ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| इस छोटी सी ग़ज़ल में कुछ असरदार शेरों के माध्यम से शायर ने मुहब्बत के जज़्बे और हौसले को अभिव्यक्त किया है|

लीजिए प्रस्तुत है ये खूबसूरत ग़ज़ल-

न साथी है न मंज़िल का पता है,
मोहब्बत रास्ता ही रास्ता है|

वफ़ा के नाम पर बर्बाद होकर,
वफ़ा के नाम से दिल काँपता है|

मैं अब तेरे सिवा किसको पुकारूँ,
मुक़द्दर सो गया ग़म जागता है|

वो सब कुछ जानकर अनजान क्यूँ हैं,
सुना है दिल को दिल पहचानता है|


ये आँसू ढूँढता है तेरा दामन,
मुसाफ़िर अपनी मंज़िल जानता है|


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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क्या दीप जलाएं हम, तक़दीर ही काली है!

दीपावली के अवसर पर, एक बार फिर से मुझे अपने प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक गीत याद आ रहा है।

दीपावली भी हमारी खुशियों को जाहिर करने का एक अवसर है, हम जितने अधिक खुश होंगे, उतने ही अधिक उत्साह के साथ हम इन त्यौहारों के अवसर पर उल्लास के साथ भाग लेंगे।

यह गीत फिल्म नज़राना में दो बार आया है, एक बार खुशी के मूड में और एक बार उदासी के मूड में, राजिंदर कृष्ण जी ने गीत को लिखा है और संगीत दिया है- रवि जी ने।

खुशी के मूड वाला गीत, जिसे लता जी ने गाया है उसका मुखड़ा इस प्रकार है-

 

मेले हैं चरागों के, रंगीन दिवाली है,
खिलता हुआ गुलशन है, हंसता हुआ माली है।

 

और इसके बाद मैं उदासी के महौल में मुकेश जी द्वारा गाये गए इस गीत को यहाँ शेयर कर रहा हूँ-

 

एक वो भी दिवाली थी, एक ये भी दिवाली है
उजड़ा हुआ गुलशन है, रोता हुआ माली है|

 

बाहर तो उजाला है मगर दिल में अँधेरा,
समझो ना इसे रात, ये है ग़म का सवेरा|
क्या दीप जलायें हम, तक़दीर ही काली है,
उजड़ा हुआ गुलशन है, रोता हुआ माली है।

 

ऐसे न कभी दीप किसी दिल का बुझा हो,
मैं तो वो मुसाफ़िर हूँ जो रस्ते में लुटा हो।
ऐ मौत तू ही आ जा, दिल तेरा सवाली है
उजड़ा हुआ गुलशन है, रोता हुआ माली है।

 

एक वो भी दिवाली थी, एक ये भी दिवाली है,
उजड़ा हुआ गुलशन है, रोता हुआ माली है।

 

यह तो गीत की बात थी, जीवन में दुख-सुख तो लगे ही रहते हैं।

आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं।

नमस्कार।

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