तुम न जाने किस जहाँ में खो गये!

गायक सोनू निगम का एक इंटरव्यू सुन रहा था, जिसमें उन्होंने स्वर्गीय लता मंगेशकर जी के एक गीत को मिसाल के रूप में याद किया था| मुझे लगा कि आज इसी गीत को शेयर कर लेना चाहिए| यह गीत है फिल्म- ‘सज़ा’ से जिसे लिखा था – साहिर लुधियानवी जी ने और इसका संगीत तैयार किया था स्वर्गीय सचिन देव बर्मन साहब ने|

लीजिए प्रस्तुत है, फिल्म- सज़ा के लिए साहिर लुधियानवी साहब का लिखा और सचिन देव बर्मन जी के संगीत निर्देशन में लता जी द्वारा लाजवाब अंदाज़ में गाया गया यह भावपूर्ण गीत-



तुम न जाने किस जहाँ में खो गये
हम भरी दुनिया में तनहा हो गये|
तुम न जाने किस जहाँ में …

एक जां और लाख ग़म,
घुट के रह जाये न दम
आओ तुम को देख लें,
डूबती नज़रों से हम
लूट कर मेरा जहाँ
छुप गये हो तुम कहाँ – २
तुम कहाँ, तुम कहाँ, तुम कहाँ
तुम न जाने किस जहाँ में …

मौत भी आती नहीं,
रात भी जाती नहीं
दिल को ये क्या हो गया,
कोई शै भाती नहीं
लूट कर मेरा जहाँ,
छुप गये हो तुम कहाँ – २
तुम कहाँ, तुम कहाँ, तुम कहाँ
तुम न जाने किस जहाँ में …

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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हमने अपना सब कुछ खोया!

आज फिल्म- ‘सरस्वतीचन्द्र’ के लिए इंदीवर जी का लिखा एक प्रसिद्ध गीत शेयर कर रहा हूँ जिसे मुकेश जी ने अपने अनूठे अंदाज़ में गाया था| फिल्म- सरस्वतीचन्द्र के लिए कल्याणजी आनंदजी द्वारा संगीतबद्ध किए गए कई गीत काफी प्रसिद्ध हुए थे, जिनमें – ‘फूल तुम्हें भेजा है खत में’, ‘मैं तो भूल चली बाबुल का देश‘ भी शामिल हैं|

मुकेश जी को विशेष रूप से ऐसे दर्द भरे गीतों के लिए जाना जाता है , यद्यपि उन्होंने मस्ती भरे गीत भी बहुत गाये हैं, लेकिन उनकी पहचान दर्द भरे गीतों से ज्यादा बनी है|

लीजिए आज प्रस्तुत हैं इस मुकेश जी के द्वारा गाये गए इस मधुर गीत के बोल:

हमने अपना सब कुछ खोया
प्यार तेरा पाने को,
छोड़ दिया क्यों प्यार ने तेरे
दर-दर भटकाने को|
प्यार तेरा पाने को|
हम ने अपना …

वो आँसू जो बह नहीं पाए,
वो बातें जो कह नहीं पाए,
दिल में छुपाए फ़िरते हैं अब,
घुटकर मर जाने को|
प्यार तेरा पाने को|
हम ने अपना …

उसकी रहे तू जिसकी हो ली,
तुझको मुबारक़ प्यार की डोली,
बैठ गए हम ग़म की चिता पर,
ज़िन्दा जल जाने को|
प्यार तेरा पाने को
हम ने अपना …

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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ऐ मेरे दिल-ए-नादान

आज मैं स्वर सम्राज्ञी, कोकिल कंठी- सुश्री लता मंगेशकर जी का गाया एक अमर गीत आपको, उसके लिखित स्वरूप के माध्यम से याद दिला रहा हूँ, आपको इस दर्द भरे गीत का स्मरण अवश्य होगा, जिसे असद भोपाली जी ने लिखा था और रवि जी के संगीत निर्देशन में लता जी द्वारा बहुत पहले गाये गए इस गीत की स्वर लहरी आज भी हमारे मानस में गूँजती है|

लीजिए प्रस्तुत हैं लता मंगेशकर जी द्वारा फिल्म- ‘टावर हाउस’ के लिए गाये गए इस गीत के बोल –

ऐ मेरे दिल-ए-नादान
तू ग़म से न घबराना,
एक दिन तो समझ लेगी
दुनिया तेरा अफ़साना|
ऐ मेरे दिल-ए-नादान …

अरमान भरे दिल में
ज़ख्मों को जगह दे दे
भड़के हुए शोलों को
कुछ और हवा दे दे,
बनती है तो बन जाए
ये ज़िन्दगी अफ़साना|
ऐ मेरे दिल-ए-नादान …


फ़रियाद से क्या हासिल
रोने से नतीजा क्या,
बेकार हैं ये बातें
इन बातों से होगा क्या,
अपना भी घडी भर में
बन जाता है बेगाना
ऐ मेरे दिल-ए-नादान …


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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ये मुरादों की हसीं रात!

आज साहिर लुधियानवी जी का लिखा एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जो 1964 में रिलीज हुई फिल्म- ग़ज़ल से है, जिसके नायक सुनील दत्त जी थे| हम जानते हैं कि विवाह के अवसर पर सेहरा गाया जाता है, खुशी का मौका होने के कारण और भी बहुत से गीत गाए जाते हैं, लेकिन हमारी फिल्मों में एक बात और होती है, जब नायक की शादी नायिका से नहीं हो पाती, तब वह भी इस अवसर पर अपना दुखड़ा गाता है| मैंने ऐसा कभी नायिका को करते नहीं देखा है|

खैर आज प्रस्तुत है मदन मोहन जी के संगीत निर्देशन में मोहम्मद रफ़ी साहब के मधुर स्वर में, सुनील दत्त जी पर फिल्माया गया, साहिर लुधियानवी जी का लिखा यह गीत, –

रंग और नूर की बारात किसे पेश करूँ,
ये मुरादों की हंसीं रात किसे पेश करूँ, किसे पेश करूँ|


मैने जज़बात निभाए हैं उसूलों की जगह,
अपने अरमान पिरो लाया हूँ फूलों की जगह,
तेरे सेहरे की ये सौगात किसे पेश करूँ,
ये मुरादों की हसीं रात किसे पेश करूँ, किसे पेश करूँ|


ये मेरे शेर मेरे आखिरी नज़राने हैं,
मैं उन अपनों मैं हूँ जो आज से बेगाने हैं,
बेत-आ-लुख़ सी मुलाकात किसे पेश करूँ,
ये मुरादों की हंसीं रात किसे पेश करूँ, किसे पेश करूँ|


सुर्ख जोड़े की तबोताब मुबारक हो तुझे,
तेरी आँखों का नया ख़्वाब मुबारक हो तुझे,
ये मेरी ख़्वाहिश ये ख़यालात किसे पेश करूँ,
ये मुरादों की हंसीं रात किसे पेश करूँ, किसे पेश करूँ|


कौन कहता है चाहत पे सभी का हक़ है,
तू जिसे चाहे तेरा प्यार उसी का हक़ है,
मुझसे कह दे मैं तेरा हाथ किसे पेश करूँ,
ये मुरादों की हंसीं रात किसे पेश करूँ, किसे पेश करूँ|

रंग और नूर की…

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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मुद्दतें हो गईं मुस्कुराए!

आज एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ ज़नाब कैफी आज़मी साहब की लिखी हुई, कैफी आज़मी साहब हमारे देश के जाने माने और मशहूर शायर रहे हैं और उनकी बहुत सी रचनाओं का फिल्मों में भी सदुपयोग किया गया है|


कैफी आज़मी साहब की इस ग़ज़ल को फिल्म ‘हँसते जख्म’ के लिए मदन मोहन जी के संगीत निर्देशन में लता मंगेशकर जी ने बड़े प्रभावी ढंग से गाया था|

लीजिए प्रस्तुत है कैफी आज़मी साहब की यह ग़ज़ल –

आज सोचा तो आँसू भर आए,
मुद्दतें हो गईं मुस्कुराए|

हर कदम पर उधर मुड़ के देखा,
उनकी महफ़िल से हम उठ तो आए|

दिल की नाज़ुक रगें टूटती हैं,
याद इतना भी कोई न आए|

रह गई ज़िंदगी दर्द बनके,
दर्द दिल में छुपाए छुपाए|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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ज़ुबां पे दर्द भरी दास्तां चली आई!

आज फिर से मैं हम सबके प्यारे मुकेश जी का एक और बहुत प्यारा गीत शेयर कर रहा हूँ, यह गीत है पुरानी फिल्म मर्यादा से है, जिसे आनंद बक्षी जी ने लिखा था और कल्याणजी आनंद जी के संगीत निर्देशन में मुकेश जी ने इसे अनोखे अंदाज में गाया है |

ज़िंदगी में ऐसा भी होता है और अक्सर होता है कि हम खुशियों की आशा करते हैं और हमारे पाले ग़म ही पड़ते हैं, बस ऐसे ही कुछ भाव हैं इस गीत में|

लीजिए प्रस्तुत है मुकेश जी का यह दर्द भरा गीत:

ज़ुबां पे दर्द भरी दास्तां चली आई,
बहार आने से पहले खिजां चली आई|

खुशी की चाह में मैंने उठाये रंज बड़े
मेरा नसीब कि मेरे क़दम जहाँ भी पड़े,
ये बदनसीबी मेरी भी वहाँ चली आई|
ज़ुबां पे दर्द भरी दास्तां चली आई |

उदास रात है वीरान दिल की महफ़िल है,
न हमसफ़र है कोई और न कोई मंज़िल है
ये ज़िंदगी मुझे लेकर कहाँ चली आई|

ज़ुबां पे दर्द भरी दास्तां चली आई
बहार आने से पहले खिजां चली आई|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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मैं दिया हूँ ऐसा जहान में!

आज मैं हम सबके प्यारे मुकेश जी का गाया एक और बहुत प्यारा सा गीत शेयर कर रहा हूँ|
आज का यह गीत फिल्म ‘उम्र क़ैद’ से है, इसका संगीत तैयार किया था इकबाल कुरैशी जी ने और इस गीत को लिखा था हसरत जयपुरी जी ने|

कभी कभी हमें यह बहुत महत्वपूर्ण लगता है कि किसी व्यक्ति विशेष के मन में कहीं हमारी छवि खराब न हो जाए| ऐसा लगता है कि यदि उस व्यक्ति ने हमें अपनी निगाहों से गिरा दिया तो हमारी सभी उपलब्धियां बेकार हैं| लीजिए प्रस्तुत है मुकेश जी का यह दर्द भरा गीत:


मुझे रात दिन ये ख्याल है
वो नज़र से मुझको गिरा न दे,
मेरी ज़िन्दगी का दिया कहीं
ये गमों की आंधी बुझा न दे|
मुझे रात दिन ये ख्याल है|

मेरे दिल के दाग़ न जल उठें
मेरे दिल के दाग़
मेरे दिल के दाग़ न जल उठें
कहीं मेरे सीने की आग से
कहीं मेरे सीने की आग से,
ये घुटी घुटी मेरी आह भी
कहीं होश मेरे उड़ा न दे,
मुझे रात दिन ये ख्याल है|


किसे अपना हाल सुनाऊं मैं
किसे अपना हाल,
किसे अपना हाल सुनाऊं मैं
मेरा दिल भी गैर का हो चुका
मेरा दिल भी गैर का हो चुका
बड़ी उलझनों में घिरा हूँ मैं
के फ़साना कोई बना न दे,
मुझे रात दिन ये ख्याल है|

मैं दिया हूँ ऐसा जहान में
मैं दिया हूँ ऐसा,
मैं दिया हूँ ऐसा जहान में
के जला तो हूँ नहीं रोशनी
के जला तो हूँ नहीं रोशनी
जो जिगर में है वो खलिश कहीं
मेरी हसरतों को मिटा न दे|
मुझे रात दिन ये ख्याल है
वो नज़र से मुझको गिरा न दे,

मुझे रात दिन ये ख्याल है|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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बहुत जी लिए हम तेरा नाम लेकर!

कल मैंने अपने प्रिय गायक मुकेश जी का एक गीत शेयर किया था, तो आज भी मन हो रहा है| वैसे मुकेश जी के गीत ही ऐसे हैं कि यादों में लिपटे रहते हैं| आज का ये गीत है 1965 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘पूर्णिमा’ का, गीत लिखा है- गुलज़ार जी ने और इसका संगीत दिया है- कल्याणजी आनंद जी ने| इस फिल्म के नायक थे सदाबहार अभिनेता धर्मेन्द्र जी|


मुकेश जी ऐसे महान गायक थे कि उनके लिए नौशाद जी कहते थे- ‘तुम गा दो, मेरा गीत अमर हो जाए’| मुकेश जी ने रफी साहब, किशोर कुमार जी और लता जी से कम गीत गाए हैं, लेकिन लोकप्रियता के मामले में वे किसी से कम नहीं हैं| अपने जीवित रहते उन्हें किसी भी पुरूष गायक से अधिक फिल्मफेयर पुरस्कार मिले थे और आज भी लोगों को उनके गीत याद आते हैं|

यह भी बात है कि लाजवाब गीत-संगीत का जो समय पहले था, वो तो अब आना संभव ही नहीं है, किसी को इतनी फुर्सत नहीं है कि वह गीत-संगीत पर इतनी मेहनत करे|


लीजिए प्रस्तुत है यह अमर गीत-

तुम्हें ज़िन्दगी के उजाले मुबारक,
अँधेरे हमें आज रास आ गए हैं|
तुम्हें पा के हम खुद से दूर हो गए थे,
तुम्हें छोड़कर अपने पास आ गए हैं|



तुम्हारी वफ़ा से शिकायत नहीं है,
निभाना तो कोई रवायत नहीं है|
जहाँ तक कदम आ सके आ गए हैं,
अँधेरे हमें आज रास आ गए हैं|


चमन से चले हैं ये इल्ज़ाम लेकर,
बहुत जी लिए हम तेरा नाम लेकर|
मुरादों की मंज़िल से दूर आ गए थे,
अँधेरे हमें आज रास आ गए हैं|


तुम्हें ज़िन्दगी के उजाले मुबारक,
अँधेरे हमें आज रास आ गए हैं|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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