हमसे ख़ुदाई भी खफ़ा हो जाए!

बहुत दिनों से फिल्मों से जुड़ी कोई रचना मैंने शेयर नहीं की है, केवल अन्य साहित्यिक रचनाएं शेयर करता रहा हूँ| आज से सोचता हूँ कि कुछ दिन फिल्मों से जुड़ी कुछ रचनाएं शेयर करूंगा| आज शेयर कर रहा हूँ साहिर लुधियानवी जी के लिखे एक फिल्मी गीत से, जो पुरानी फिल्म- ‘लैला मजनू’ में फिल्माया गया था, और मोहम्मद रफी साहब ने इस गीत को गाया था|

लीजिए आज प्रस्तुत हैं इस गीत के बोल-

अब अगर हमसे ख़ुदाई भी खफ़ा हो जाए
गैर-मुमकिन है कि दिल दिल से जुदा हो जाए
जिस्म मिट जाए कि अब जान फ़ना हो जाए
गैर-मुमकिन है…

जिस घड़ी मुझको पुकारेंगी तुम्हारी बाँहें
रोक पाएँगी न सहरा की सुलगती राहें
चाहे हर साँस झुलसने की सज़ा हो जाए
गैर-मुमकिन है…

लाख ज़ंजीरों में जकड़ें ये ज़माने वाले
तोड़ कर बन्द निकल आएँगे आने वाले
शर्त इतनी है कि तू जलवा-नुमाँ हो जाए
गैर-मुमकिन है…

ज़लज़ले आएँ गरज़दार घटाएँ घेरें
खंदकें राह में हों तेज़ हवाएँ घेरें
चाहे दुनिया में क़यामत ही बपा हो जाए
गैर-मुमकिन है…

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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बहुत दिन जी लिया मैंने!

बस अब तो दामन-ए-दिल छोड़ दो बेकार उम्मीदो,
बहुत दुख सह लिए मैंने बहुत दिन जी लिया मैंने|

साहिर लुधियानवी

ख़्वाबों में खोकर जी लिया मैंने!

उन्हें अपना नहीं सकता मगर इतना भी क्या कम है,
कि कुछ मुद्दत हसीं ख़्वाबों में खोकर जी लिया मैंने|

साहिर लुधियानवी

किस तमन्ना के सहारे जी लिया मैंने!

अभी ज़िंदा हूँ लेकिन सोचता रहता हूँ ख़ल्वत में,
कि अब तक किस तमन्ना के सहारे जी लिया मैंने|

साहिर लुधियानवी

ज़हर ये भी पी लिया मैंने!

मोहब्बत तर्क की मैंने गरेबाँ सी लिया मैंने,
ज़माने अब तो ख़ुश हो ज़हर ये भी पी लिया मैंने|

साहिर लुधियानवी

अपना हाल तिरी बेबसी से हम!

गर ज़िंदगी में मिल गए फिर इत्तिफ़ाक़ से,
पूछेंगे अपना हाल तिरी बेबसी से हम|

साहिर लुधियानवी

गिला न करेंगे किसी से हम!

लो आज हमने तोड़ दिया रिश्ता-ए-उमीद,
लो अब कभी गिला न करेंगे किसी से हम|

साहिर लुधियानवी

कशमकश-ए-ज़िंदगी से हम!

तंग आ चुके हैं कशमकश-ए-ज़िंदगी से हम,
ठुकरा न दें जहाँ को कहीं बे-दिली से हम|

साहिर लुधियानवी

अपनी ही किसी बात पे रोना आया!

कौन रोता है किसी और की ख़ातिर ऐ दोस्त,
सबको अपनी ही किसी बात पे रोना आया|

साहिर लुधियानवी

आज ये किस बात पे रोना आया!

हम तो समझे थे कि हम भूल गए हैं उनको,
क्या हुआ आज ये किस बात पे रोना आया|

साहिर लुधियानवी