कितने भूले हुए ज़ख़्मों का पता याद आया!

आज मैं साहिर लुधियानवी साहब का लिखा एक गीत शेयर कर रहा हूँ| साहिर साहब का यह गीत फिल्म-‘गुमराह’ के लिए महेंद्र कपूर जी ने गाया था और इसका संगीत तैयार किया था रवि जी ने|

लीजिए आज प्रस्तुत है, साहिर लुधियानवी साहब का यह गीत –


आप आए तो ख़याल-ए-दिल-ए नाशाद आया
कितने भूले हुए ज़ख़्मों का पता याद आया

आप के लब पे कभी अपना भी नाम आया था
शोख नज़रों से मुहब्बत का सलाम आया था
उम्र भर साथ निभाने का पयाम आया था
आपको देख के वह अहद-ए-वफ़ा याद आया

रुह में जल उठे बजती हुई यादों के दिए
कैसे दीवाने थे हम आपको पाने के लिए
यूँ तो कुछ कम नहीं जो आपने एहसान किए
पर जो माँगे से न पाया वो सिला याद आया

आज वह बात नहीं फिर भी कोई बात तो है
मेरे हिस्से में यह हल्की-सी मुलाक़ात तो है
ग़ैर का हो के भी यह हुस्न मेरे साथ तो है
हाय ! किस वक़्त मुझे कब का गिला याद आया



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
******

सारा जहां हमारा 6

पतला है हाल-ए-अपना, लेकिन लहू है गाढ़ा
फौलाद से बना है, हर नौजवाँ हमारा|


मिल-जुलके इस वतन को, ऐसा सजायेंगे हम
हैरत से मुँह तकेगा सारा जहाँ हमारा|


चीन-ओ-अरब हमारा …


वो सुबह कभी तो आएगी

सारा जहां हमारा 5

तालीम है अधूरी, मिलती नही मजूरी
मालूम क्या किसीको, दर्द-ए-निहाँ हमारा
चीन-ओ-अरब हमारा …

फिर सुबह होगी

सारा जहां हमारा 4

होने को हम कलन्दर, आते हैं बोरी बन्दर
हर एक कुली यहाँ का है राज़दाँ हमारा
चीन-ओ-अरब हमारा …

सारा जहां हमारा 3

जितनी भी बिल्डिंगें थीं, सेठों ने बाँट ली हैं
फ़ुटपाथ बम्बई के हैं आशियाँ हमारा|
चीन-ओ-अरब हमारा …

फिर सुबह होगी

ऐ शरीफ़ इंसानों!

हिंदुस्तान के एक नामवर शायर, जिनका भारतीय फिल्मों के गीत-ग़ज़ल लेखन में भी बहुत बड़ा योगदान है और जो कवि-लेखकों के स्वाभिमान की रक्षा के लिए सदा संघर्ष करते रहे, ऐसे महान शायर और गीतकार स्वर्गीय साहिर लुधियानवी जी की एक नज़्म आज शेयर कर रहा हूँ|

इस रचना में साहिर साहब ने युद्ध की विभीषिका से परिचित कराया है और बताया है कि अगर दुनिया में जंग न हो और पूरी मानव-जाति शांति से रहे तो उससे बेहतर कुछ नहीं है क्योंकि युद्ध से किसी का भला नहीं होता| लीजिए प्रस्तुत है साहिर जी की यह नज़्म-


खून अपना हो या पराया हो
नस्ल-ऐ-आदम का खून है आख़िर,
जंग मशरिक में हो या मगरिब में ,
अमन-ऐ-आलम का खून है आख़िर !

बम घरों पर गिरे कि सरहद पर ,
रूह-ऐ-तामीर जख्म खाती है !
खेत अपने जले कि औरों के ,
जीस्त फ़ाकों से तिलमिलाती है !

टैंक आगे बढे कि पीछे हटें,
कोख धरती की बांझ होती है !
फतह का जश्न हो कि हार का सोग,
जिंदगी मय्यतों पे रोती है !


जंग तो खुद ही एक मसअला है
जंग क्या मसअलों का हल देगी ?
आग और खून आज बख्शेगी
भूख और एहतयाज कल देगी !

इसलिए ऐ शरीफ इंसानों ,
जंग टलती है तो बेहतर है !
आप और हम सभी के आंगन में ,
शमा जलती रहे तो बेहतर है !


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
******

जो अपने खून को पानी बना नहीं सकते!

आज साहिर लुधियानवी साहब की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| साहिर जी फिल्मी दुनिया के एक ऐसे गीतकार थे जिनका नाम अदब की दुनिया में भी बड़ी इज्जत के साथ लिया जाता था| वे मुशायरों की शान हुआ कराते थे और बड़े स्वाभिमानी भी थे, उन्होंने ही फिल्म और संगीत वालों के सामने यह शर्त रखी थी कि जिस तरह संगीतकार का नाम लिखा जाता है, उसी तरह गीतकार का भी नाम लिखा जाए, नहीं तो मैं गीत नहीं लिखूंगा|


हम आज भी साहिर जी की अनेक फिल्मी और गैर-फिल्मी रचनाओं को गुनगुनाते थे| जहां ताजमहल को लेकर अनेक मुहब्बत के गीत लिखे गए हैं और कवि-शायरों ने उसे मुहब्बत की निशानी बताया है, वहीं साहिर साहब ने लिखा है-‘एक शहंशाह ने बनवा के हंसी ताजमहल, हम गरीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाक|

आज की यह रचना भी हमें हिम्मत न हारने और हौसला बनाए रखने की प्रेरणा देती है-



मेरे नदीम मेरे हमसफ़र उदास न हो,
कठिन सही तेरी मंजिल मगर उदास न हो|

कदम कदम पे चट्टानें खडी़ रहें लेकिन,
जो चल निकले हैं दरिया तो फिर नहीं रुकते|
हवाएँ कितना भी टकराएँ आँधियाँ बनकर
मगर घटाओं के परचम कभी नहीं झुकते|
मेरे नदीम मेरे हमसफ़र…


हर एक तलाश के रास्ते में मुश्किलें हैं मगर,
हर एक तलाश मुरादों के रंग लाती है|
हजारों चाँद सितारों का खून होता है,
तब एक सुबह फ़िजाओं पे मुस्कुराती है|
मेरे नदीम मेरे हमसफ़र…

जो अपने खून को पानी बना नहीं सकते,
वो जिंदगी में नया रंग ला नहीं सकते|
जो रास्ते के अँधेरों से हार जाते हैं,
वो मंजिलों के उजाले को पा नहीं सकते|

मेरे नदीम मेरे हमसफ़र…


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


*********

अंधेरी रात के दिल में दिये जला के जियो!

आज महेंद्र कपूर जी का गाया एक गीत शेयर करूंगा और इस बहाने से भी अपने प्रिय गायक मुकेश जी की तारीफ करूंगा।

हाँ तो यह गीत 1967 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘हमराज़’ का है, गीत लिखा है साहिर लुधियानवी जी ने, जो ज़िंदगी में मुसीबतों का सामना हिम्मत के साथ करने का संदेश देता है। इसका संगीत- रवि जी ने दिया था और महेंद्र कपूर जी को शायद पहली बार इस फिल्म में ही गीत गाने का मौका मिला था और उनके गाये इस फिल्म के सभी गीत बहुत लोकप्रिय हुए थे।

 

मेरा इस फिल्म का एक विशेष प्रकार का संबंध बना था। जी हाँ, इस बात का ज़िक्र मैंने पहले भी अपनी ब्लॉग पोस्ट में किया है।  मैं उस समय बेरोज़गार था, मेरी उम्र तब 17 वर्ष की रही होगी और मैंने एक सप्ताह तक इस फिल्म के सभी ‘शो’ देखे थे!

मैं उस समय शाहदरा-दिल्ली में रहता था और गांधी नगर के एक सिनेमा हॉल में जहाँ यह फिल्म चल रही थी, वहाँ डिस्ट्रीब्यूटर की तरफ से मेरी ड्यूटी लगी थी, प्रत्येक शो शुरू होने पर मैं यह देखता था कि प्रत्येक श्रेणी में कितनी सीटें खाली हैं। अब उसके बाद वे लोग इस जानकारी का जो भी इस्तेमाल करते हों। अक्सर लोग गाना शुरू होने पर हॉल से बाहर चले जाते हैं, मैं गाना शुरू होने पर अंदर जाता था।

हाँ तो महेंद्र कपूर जी ने इस फिल्म के गीतों को बहुत सुंदर तरीके से गाया था और इसके लिए उनको फिल्मफेयर एवार्ड भी मिला था। विशेष बात यह थी कि उस समय के किसी स्थापित गायक ने महेंद्र कपूर को यह अवार्ड मिलने पर बधाई नहीं दी।

मुकेश जी जो उस समारोह में उपस्थित नहीं थे, वे अगले दिन बधाई देने के लिए महेंद्र कपूर जी के घर चले गए। महेंद्र कपूर उनको देखकर चकित रह गए और बोले ‘भापे जी आप क्यों आए, मुझे बुला लिया होता!’  ऐसे थे हमारे प्यारे मुकेश जी।

खैर आज के लिए महेंद्र कपूर जी का गाया यह प्यारा सा गीत प्रस्तुत है-

 

न मुँह छुपा के जियो और न सर झुका के जियो
ग़मों का दौर भी आये तो मुस्कुरा के जियो
न मुँह छुपा के जियो, और न सर झुका के जियो।

 

घटा में छुपके सितारे फ़ना नहीं होते,
अँधेरी रात में दिये जला के जियो।
न मुँह छुपा के जियो और न सर झुका के जियो।

 

ये ज़िंदगी किसी मंज़िल पे रुक नहीं सकती,
हर इक मक़ाम से आगे क़दम बढ़ा के जियो,
न मुँह छुपा के जियो और न सर झुका के जियो।

 

न जाने कौन सा पल मौत की अमानत हो,
हर एक पल की खुशी को गले लगा के जियो।
न मुँह छुपा के जियो और न सर झुका के जियो।

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

************