तेरी आवाज़!

साहिर लुधियानवी साहब शायरी और हिन्दी फिल्मों के लिए गीत लिखने वाले लोगों में एक जाना माना नाम थे| साहिर साहब एक स्वाभिमानी रचनाकार थे और उन्होंने फिल्म जगत में गीतकारों को उचित सम्मान दिलाने के लिए भी उल्लेखनीय काम किया|

साहिर साहब के फिल्मी गीत तो पहले भी शेयर किए हैं और आगे भी करूंगा, लीजिए आज प्रस्तुत है साहिर लुधियानवी साहब की यह नज़्म –

रात सुनसान थी, बोझल थी फज़ा की साँसें
रूह पे छाये थे बेनाम ग़मों के साए
दिल को ये ज़िद थी कि तू आए तसल्ली देने
मेरी कोशिश थी कि कमबख़्त को नींद आ जाए|

देर तक आंखों में चुभती रही तारों की चमक
देर तक ज़हन सुलगता रहा तन्हाई में
अपने ठुकराए हुए दोस्त की पुरसिश के लिए
तू न आई मगर इस रात की पहनाई में|

यूँ अचानक तेरी आवाज़ कहीं से आई
जैसे परबत का जिगर चीर के झरना फूटे
या ज़मीनों की मुहब्बत में तड़प कर नागाह
आसमानों से कोई शोख़ सितारा टूटे|

शहद सा घुल गया तल्ख़ाबा-ए-तन्हाई में
रंग सा फैल गया दिल के सियहखा़ने में
देर तक यूँ तेरी मस्ताना सदायें गूंजीं
जिस तरह फूल चटखने लगें वीराने में|

तू बहुत दूर किसी अंजुमन-ए-नाज़ में थी
फिर भी महसूस किया मैंने कि तू आई है
और नग़्मों में छुपा कर मेरे खोये हुए ख़्वाब
मेरी रूठी हुई नींदों को मना लाई है|

रात की सतह पे उभरे तेरे चेहरे के नुक़ूश
वही चुपचाप सी आँखें वही सादा सी नज़र
वही ढलका हुआ आँचल वही रफ़्तार का ख़म
वही रह रह के लचकता हुआ नाज़ुक पैकर|

तू मेरे पास न थी फिर भी सहर होने तक
तेरा हर साँस मेरे जिस्म को छू कर गुज़रा
क़तरा क़तरा तेरे दीदार की शबनम टपकी
लम्हा लम्हा तेरी ख़ुशबू से मुअत्तर गुज़रा|

अब यही है तुझे मंज़ूर तो ऐ जान-ए-बहार
मैं तेरी राह न देखूँगा सियाह रातों में
ढूंढ लेंगी मेरी तरसी हुई नज़रें तुझ को
नग़्मा-ओ-शेर की उभरी हुई बरसातों में|

अब तेरा प्यार सताएगा तो मेरी हस्ती
तेरी मस्ती भरी आवाज़ में ढल जायेगी
और ये रूह जो तेरे लिए बेचैन सी है
गीत बन कर तेरे होठों पे मचल जायेगी|

मेरे नग़्मात तेरे हुस्न की ठंडक लेकर
मेरे तपते हुए माहौल में आ जायेंगे
चंद घड़ियों के लिए हो कि हमेशा के लिए
मेरी जागी हुई रातों को सुला जायेंगे|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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तुम न जाने किस जहाँ में खो गये!

गायक सोनू निगम का एक इंटरव्यू सुन रहा था, जिसमें उन्होंने स्वर्गीय लता मंगेशकर जी के एक गीत को मिसाल के रूप में याद किया था| मुझे लगा कि आज इसी गीत को शेयर कर लेना चाहिए| यह गीत है फिल्म- ‘सज़ा’ से जिसे लिखा था – साहिर लुधियानवी जी ने और इसका संगीत तैयार किया था स्वर्गीय सचिन देव बर्मन साहब ने|

लीजिए प्रस्तुत है, फिल्म- सज़ा के लिए साहिर लुधियानवी साहब का लिखा और सचिन देव बर्मन जी के संगीत निर्देशन में लता जी द्वारा लाजवाब अंदाज़ में गाया गया यह भावपूर्ण गीत-



तुम न जाने किस जहाँ में खो गये
हम भरी दुनिया में तनहा हो गये|
तुम न जाने किस जहाँ में …

एक जां और लाख ग़म,
घुट के रह जाये न दम
आओ तुम को देख लें,
डूबती नज़रों से हम
लूट कर मेरा जहाँ
छुप गये हो तुम कहाँ – २
तुम कहाँ, तुम कहाँ, तुम कहाँ
तुम न जाने किस जहाँ में …

मौत भी आती नहीं,
रात भी जाती नहीं
दिल को ये क्या हो गया,
कोई शै भाती नहीं
लूट कर मेरा जहाँ,
छुप गये हो तुम कहाँ – २
तुम कहाँ, तुम कहाँ, तुम कहाँ
तुम न जाने किस जहाँ में …

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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अगर मुझे न मिली तुम!

आज साहिर लुधियानवी साहब का लिखा एक गीत शेयर कर रहा हूँ| यह गीत 1965 में रिलीज़ हुई फिल्म – ‘काजल’ के लिए महेंद्र कपूर जी और आशा भौंसले जी ने गाया था| इसका मधुर संगीत तैयार किया था रवि जी ने|
लीजिए प्रस्तुत है, फिल्म- काजल के लिए साहिर लुधियानवी साहब का लिखा और रवि जी के संगीत निर्देशन में महेंद्र कपूर जी और आशा भौंसले जी का गाया यह भावपूर्ण गीत-

अगर मुझे न मिली तुम तो मैं ये समझूँगा
कि दिल की राह से होकर ख़ुशी नहीं गुज़री

अगर मुझे न मिले तुम तो मैं ये समझूँगी
कि सिर्फ़ उम्र कटी ज़िंदगी नहीं गुज़री

फ़िज़ा में रंग नज़ारों में जान है तुमसे
मेरे लिए ये ज़मीं आसमान है तुमसे
ख़याल-ओ-ख़्वाब की दुनिया जवान है तुमसे,
अगर मुझे न मिले तुम तो मैं ये समझूँगी
कि ख़्वाब ख़्वाब रहे बेकसी नहीं गुज़री
अगर मुझे न मिली तुम तो मैं ये समझूँगा
कि दिल की राह से होकर ख़ुशी नहीं गुज़री

बड़े यक़ीन से मैंने ये हाथ माँगा है
मेरी वफ़ा ने हमेशा का साथ माँगा है
दिलों की प्यास ने आब-ए-हयात माँगा है
दिलों की प्यास ने आब-ए-हयात माँगा है

अगर मुझे न मिले तुम तो मैं ये समझूँगी
कि इंतज़ार की मुद्दत अभी नहीं गुज़री

अगर मुझे न मिले तुम तो मैं ये समझूँगी

कि सिर्फ़ उम्र कटी ज़िंदगी नहीं गुज़री|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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तोरा मन दर्पण कहलाये!

आज स्वर्गीय साहिर लुधियानवी जी का लिखा एक सुंदर गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| फिल्म- ‘काजल’ के लिए इस गीत का संगीत रवि जी ने दिया था और इसको आशा भौंसले जी ने अपनी मधुर वाणी में गाया है जो आज तक हमारे मन में गूँजता है|

लीजिए आज प्रस्तुत हैं इस मधुर गीत के बोल –


प्राणी अपने प्रभु से पूछे किस विधि पाऊँ तोहे,
प्रभु कहे तू मन को पा ले, पा जायेगा मोहे|

तोरा मन दर्पण कहलाये,
भले बुरे सारे कर्मों को, देखे और दिखाये|
तोरा मन दर्पण कहलाये|

मन ही देवता, मन ही ईश्वर, मन से बड़ा न कोय,
मन उजियारा जब जब फैले, जग उजियारा होय,
इस उजले दर्पण पे प्राणी, धूल न जमने पाये|
तोरा मन दर्पण कहलाये

सुख की कलियाँ, दुख के कांटे, मन सबका आधार,
मन से कोई बात छुपे ना, मन के नैन हज़ार,
जग से चाहे भाग लो कोई, मन से भाग न पाये|
तोरा मन दर्पण कहलाये|


तन की दौलत ढलती छाया, मन का धन अनमोल,
तन के कारण मन के धन को मत माटी में रौंद,
मन की क़दर भुलानेवाला वीराँ जनम गवाये|
तोरा मन दर्पण कहलाये|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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तुम यूँ ही ख़फ़ा रहना !

आज मैं फिर से हम सबके प्रिय गायक मुकेश जी का एक बहुत प्यारा सा गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| कल के गीत की तरह, यह गीत भी राज कपूर साहब द्वारा अभिनीत फिल्म- ‘दिल ही तो है’ के लिए साहिर लुधियानवी साहब ने लिखा था और इसका संगीत रोशन साहब ने तैयार किया था|

लीजिए प्रस्तुत हैं, कुछ अलग ही अन्दाज़ वाले इस गीत के नटखट बोल, जो आपने अवश्य सुने होंगे:


ग़ुस्से में जो निखरा है उस हुस्न का क्या कहना,
कुछ देर अभी हम से तुम यूँ ही ख़फ़ा रहना
|

उस हुस्न के शो’ले की तस्वीर बना लें हम,
उन गर्म निगाहों को सीने से लगा लें हम,
पल-भर इसी आलम में ऐ जान-ए-अदा रहना|
कुछ देर अभी हम से तुम यूँ ही ख़फ़ा रहना |


ये दहका हुआ चेहरा ये बिखरी हुई ज़ुल्फ़ें,
ये बढ़ती हुई धड़कन ये चढ़ती हुई साँसें,
सामान-ए-क़ज़ा हो तुम सामान-ए-क़ज़ा रहना|
कुछ देर अभी हम से तुम यूँ ही ख़फ़ा रहना |


पहले भी हसीं थीं तुम लेकिन ये हक़ीक़त है,
वो हुस्न मुसीबत था ये हुस्न क़यामत है,
औरों से तो बढ़ कर हो ख़ुद से भी सिवा रहना|
कुछ देर अभी हम से तुम यूँ ही ख़फ़ा रहना|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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तो मुश्किल होगी!

 एक बार फिर से आज मैं हम सबके प्रिय गायक मुकेश जी का एक बहुत प्यारा सा गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| राज कपूर साहब द्वारा अभिनीत फिल्म- ‘दिल ही तो है’ के लिए यह गीत साहिर लुधियानवी साहब ने लिखा था और इसका संगीत रोशन साहब ने तैयार किया था|  

लीजिए प्रस्तुत हैं इस गीत के बोल, जो आज भी हमारे दिल में गूंजते है:

तुम अगर मुझको न चाहो तो कोई बात नहीं,
तुम किसी और को चाहोगी तो मुश्किल होगी|

अब अगर मेल नहीं है तो जुदाई भी नहीं
बात तोड़ी भी नहीं तुमने बनाई भी नहीं,
ये सहारा भी बहुत है मेरे जीने के लिये
तुम अगर मेरी नहीं हो तो पराई भी नहीं,
मेरे दिल को न सराहो तो कोई बात नहीं
गैर के दिल को सराहोगी, तो मुश्किल…

तुम हसीं हो, तुम्हें सब प्यार भी करते होंगे
मैं जो मरता हूँ तो क्या और भी मरते होंगे,
सब की आँखों में इसी शौक़ का तूफ़ां होगा
सब के सीने में यही दर्द उभरते होंगे,
मेरे ग़म में न कराहो तो कोई बात नहीं
और के ग़म में कराहोगी तो मुश्किल…


फूल की तरह हँसो, सब की निगाहों में रहो
अपनी मासूम जवानी की पनाहों में रहो,
मुझको वो दिन न दिखाना तुम्हें अपनी ही क़सम
मैं तरसता रहूँ तुम गैर की बाहों में रहो,
तुम जो मुझसे न निभाओ तो कोई बात नहीं
किसी दुश्मन से निभाओगी तो मुश्किल…

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार

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ये मुरादों की हसीं रात!

आज साहिर लुधियानवी जी का लिखा एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जो 1964 में रिलीज हुई फिल्म- ग़ज़ल से है, जिसके नायक सुनील दत्त जी थे| हम जानते हैं कि विवाह के अवसर पर सेहरा गाया जाता है, खुशी का मौका होने के कारण और भी बहुत से गीत गाए जाते हैं, लेकिन हमारी फिल्मों में एक बात और होती है, जब नायक की शादी नायिका से नहीं हो पाती, तब वह भी इस अवसर पर अपना दुखड़ा गाता है| मैंने ऐसा कभी नायिका को करते नहीं देखा है|

खैर आज प्रस्तुत है मदन मोहन जी के संगीत निर्देशन में मोहम्मद रफ़ी साहब के मधुर स्वर में, सुनील दत्त जी पर फिल्माया गया, साहिर लुधियानवी जी का लिखा यह गीत, –

रंग और नूर की बारात किसे पेश करूँ,
ये मुरादों की हंसीं रात किसे पेश करूँ, किसे पेश करूँ|


मैने जज़बात निभाए हैं उसूलों की जगह,
अपने अरमान पिरो लाया हूँ फूलों की जगह,
तेरे सेहरे की ये सौगात किसे पेश करूँ,
ये मुरादों की हसीं रात किसे पेश करूँ, किसे पेश करूँ|


ये मेरे शेर मेरे आखिरी नज़राने हैं,
मैं उन अपनों मैं हूँ जो आज से बेगाने हैं,
बेत-आ-लुख़ सी मुलाकात किसे पेश करूँ,
ये मुरादों की हंसीं रात किसे पेश करूँ, किसे पेश करूँ|


सुर्ख जोड़े की तबोताब मुबारक हो तुझे,
तेरी आँखों का नया ख़्वाब मुबारक हो तुझे,
ये मेरी ख़्वाहिश ये ख़यालात किसे पेश करूँ,
ये मुरादों की हंसीं रात किसे पेश करूँ, किसे पेश करूँ|


कौन कहता है चाहत पे सभी का हक़ है,
तू जिसे चाहे तेरा प्यार उसी का हक़ है,
मुझसे कह दे मैं तेरा हाथ किसे पेश करूँ,
ये मुरादों की हंसीं रात किसे पेश करूँ, किसे पेश करूँ|

रंग और नूर की…

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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मैं पल दो पल का शायर हूँ!

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मुझसे पहले कितने शायर, आए और आकर चले गए,
कुछ आहें भरकर लौट गए, कुछ नग़मे गाकर चले गए,
क्यों कोई मुझको याद करे, क्यों कोई मुझको याद करे,
मसरूफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यों वक़्त अपना बर्बाद करे|

मैं पल दो पल का शायर हूँ, पल दो पल मेरी कहानी है|
पल दो पल मेरी हस्ती है, पल दो पल मेरी जवानी है|

साहिर लुधियानवी

नग़मों की खिलाती कलियां चुनने वाले!

कल और आएंगे नग़मों की खिलाती कलियां चुनने वाले,
मुझसे बहते कहने वाले, तुमसे बेहतर सुनने वाले|

साहिर लुधियानवी

तुम्हारी मस्त नज़र!

आज मैं पुरानी फिल्म- ‘दिल ही तो है’ का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| इस फिल्म के नायक राज कपूर थे और उनकी नायिका नूतन थीं| इस फिल्म के लिए मुकेश जी ने ये प्यारा सा गीत गाया था|

आज का यह गीत साहिर लुधियानवी जी का लिखा हुआ है और इसे रोशन जी के संगीत निर्देशन में मुकेश जी ने बड़े मस्ती भरे अन्दाज़ में गाया था|

लीजिए प्रस्तुत हैं इस गीत के बोल –


तुम्हारी मस्त नज़र, गर इधर नहीं होती,
नशे में चूर फ़िज़ा इस क़दर नहीं होती|

तुम्हीं को देखने की दिल में आरज़ूएं हैं,
तुम्हारे आगे ही और ऊँची नज़र नहीं होती|

ख़फ़ा न होना अगर बढ़ के थाम लूँ दामन,
ये दिल फ़रेब ख़ता जान कर नहीं होती|

तुम्हारे आने तलक हम को होश रहता है,
फिर उसके बाद हमें कुछ खबर नहीं होती|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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