एक क़तरे को समुंदर नज़र आएं कैसे!

वसीम बरेलवी साहब उर्दू शायरी का एक जाना-माना नाम हैं और अनेक खूबसूरत ग़ज़लें, नज़्में उन्होंने हमे दी हैं| वैसे तो दूरदर्शन आदि पर अनेक मुशायरों और कवि सम्मेलनों में उनको सुना है, एक बार मैंने अपने आयोजन में, ऊंचाहार में आयोजित कवि-सम्मेलन में उनको बुलाया था और जी भरकर उनको सुना था|

लीजिए आज प्रस्तुत है वसीम बरेलवी साहब की यह ग़ज़ल –


अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएं कैसे,
तेरी मर्ज़ी के मुताबिक़ नज़र आएं कैसे|

घर सजाने का तसव्वुर तो बहुत बाद का है,
पहले ये तय हो कि इस घर को बचाएं कैसे|

लाख तलवारें बढ़ी आती हों गर्दन की तरफ़,
सर झुकाना नहीं आता तो झुकाएं कैसे|

क़हक़हा आंख का बरताव बदल देता है,
हँसने वाले तुझे आँसू नज़र आएँ कैसे|

फूल से रंग जुदा होना कोई खेल नहीं,
अपनी मिट्टी को कहीं छोड़ के जाएं कैसे|

कोई अपनी ही नज़र से तो हमें देखेगा,
एक क़तरे को समुंदर नज़र आएं कैसे|

जिस ने दानिश्ता किया हो नज़र-अंदाज़ ‘वसीम’,
उस को कुछ याद दिलाएं तो दिलाएं कैसे|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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शायद अपनी शिद्दत-ए-इज़हार थोड़ी कम रही!

आज एक बार फिर से मैं श्रेष्ठ शेयर और ग़ज़ल लेखक राजेश रेड्डी जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| राजेश जी की कुछ ग़ज़लें मैंने पहले भी शेयर की हैं| आज की ग़ज़ल में उन्होंने यह व्यक्त किया है कि वर्तमान समय में लोगों को प्रभावित करने के लिए सच में झूठ की मिलावट बहुत जरूरी है और लोगों को खुद्दारी की काफी बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है|

लीजिए आज प्रस्तुत है राजेश रेड्डी जी की यह ग़ज़ल-


अपने सच में झूठ की मिक्दार थोड़ी कम रही ।
कितनी कोशिश की, मगर, हर बार थोड़ी कम रही ।

कुछ अना भी बिकने को तैयार थोड़ी कम रही,
और कुछ दीनार की झनकार थोड़ी कम रही ।

ज़िन्दगी ! तेरे क़दम भी हर बुलन्दी चूमती,
तू ही झुकने के लिए तैयार थोड़ी कम रही ।

सुनते आए हैं कि पानी से भी कट जाते हैं संग,
शायद अपने आँसुओं की धार थोड़ी कम रही ।

या तो इस दुनिया के मनवाने में कोई बात थी,
या हमारी नीयत-ए-इनकार थोड़ी कम रही ।

रंग और ख़ुशबू का जादू अबके पहले सा न था,
मौसम-ए-गुल में बहार इस बार थोड़ी कम रही ।


आज दिल को अक़्ल ने जल्दी ही राज़ी कर लिया
रोज़ से कुछ आज की तकरार थोड़ी कम रही ।

लोग सुन कर दास्ताँ चुप रह गए, रोए नहीं,
शायद अपनी शिद्दत-ए-इज़हार थोड़ी कम रही ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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धागों बिंधे ग़ुलाब हमारे पास नहीं!

आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ| आज मन है कि अत्यंत सरल हृदय, प्रेम गीतों के बादशाह और स्वाभिमानी कवि स्वर्गीय किशन सरोज जी का स्मरण करूं|

प्रसिद्ध गीत कवि स्व. श्री किशन सरोज जी का स्मरण करते हुए उनका एक गीत आज शेयर कर रहा हूँ, वैसे तो उनका हर गीत बेमिसाल है| किशन सरोज जी प्रेम के और विरह के गीतों के सुकुमार बादशाह थे, अक्सर उन्होंने कवि सम्मेलनों में ईमानदार और सृजनशील कवियों की जो स्थिति होती है, हल्की-फुल्की कविताओं के माहौल में उनको क्या कुछ सहना पड़ता है, इस व्यथा को अभिव्यक्ति दी है, किशन सरोज जी का एक ऐसा ही गीत आज प्रस्तुत है-

नागफनी आँचल में बांध सको तो आना
धागों बिंधे ग़ुलाब हमारे पास नहीं।

हम तो ठहरे निपट अभागे
आधे सोये, आधे जागे,
थोड़े सुख के लिये उम्र भर
गाते फिरे भीड़ के आगे,
कहाँ-कहाँ हम कितनी बार हुए अपमानित,
इसका सही हिसाब, हमारे पास नहीं।


हमने व्यथा अनमनी बेची,
तन की ज्योति कंचनी बेची,
कुछ न मिला तो अंधियारों को,
मिट्टी मोल चांदनी बेची।
गीत रचे जो हमने उन्हें याद रखना तुम
रत्नों मढ़ी किताब, हमारे पास नहीं।


झिलमिल करतीं मधुशालाएँ,
दिन ढलते ही हमें रिझाएँ,
घड़ी-घड़ी हर घूँट-घूँट हम,
जी-जी जाएँ, मर-मर जाएँ,
पीकर जिसको चित्र तुम्हारा धुंधला जाए,
इतनी कड़ी शराब, हमारे पास नहीं।


आखर-आखर दीपक बाले,
खोले हमने मन के ताले,
तुम बिन हमें न भाए पल भर,
अभिनन्दन के शाल-दुशाले,
अबके बिछुड़े कहाँ मिलेंगे, ये मत पूछो,
कोई अभी जवाब, हमारे पास नहीं।

-किशन सरोज

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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