कहीं उल्फ़त में जुदा होते हैं!

यूँ तो आपस में बिगड़ते हैं ख़फ़ा होते हैं,
मिलने वाले कहीं उल्फ़त में जुदा होते हैं|

मजरूह सुल्तानपुरी

मगर बात है रुस्वाई की!

कैसे कह दूँ कि मुझे छोड़ दिया है उसने,
बात तो सच है मगर बात है रुस्वाई की|

परवीन शाकिर

क़ैद में हूँ रिहा नहीं करता!

आइना अब जुदा नहीं करता,
क़ैद में हूँ रिहा नहीं करता|

मुनीर नियाज़ी

नहीं मरता कोई जुदाई में!

ये ठीक है नहीं मरता कोई जुदाई में,
ख़ुदा किसी को किसी से मगर जुदा न करे|

क़तील शिफ़ाई

अपने आप पे कितना ग़ुरूर था!

शाम-ए-फ़िराक़ आई तो दिल डूबने लगा,
हमको भी अपने आप पे कितना ग़ुरूर था|

मुनीर नियाज़ी

जिसे दरिया किनारे छोड़ देता है!

बिछड़ के तुझसे कुछ जाना अगर तो इस क़दर जाना,
वो मिट्टी हूँ जिसे दरिया किनारे छोड़ देता है|

वसीम बरेलवी

ग़म जुदाई में यूँ किया न करो!

इतने ख़ामोश भी रहा न करो,
ग़म जुदाई में यूँ किया न करो|

मुनीर नियाज़ी

याद में रोया करेंगे हम!

मिलकर जुदा हुए तो न सोया करेंगे हम,
इक दूसरे की याद में रोया करेंगे हम|

क़तील शिफ़ाई

गिनती में रह नहीं सकता!

लगा के देख ले जो भी हिसाब आता हो,
मुझे घटा के वो गिनती में रह नहीं सकता|

वसीम बरेलवी

ज़रा साथ चल के देखते हैं!

जुदाइयाँ तो मुक़द्दर हैं फिर भी जान-ए-सफ़र,
कुछ और दूर ज़रा साथ चल के देखते हैं|

अहमद फ़राज़