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माँ है रेशम के कारख़ाने में!

अली सरदार जाफरी साहब की एक नज़्म आज शेयर कर रहा हूँ| इस रचना में पिछड़े वर्ग के लोगों की ज़िंदगी का ऐसा चित्रण किया गया है, जिनकी हालत पीढ़ी दर पीढ़ी एक जैसी बनी रहती है, कोई सपने नहीं, कोई बदलाव की उम्मीद नहीं है|

जाफरी साहब एक प्रगतिशील शायर थे, मुद्दतों पहले उन्होंने यह रचना लिखी थी, लेकिन आज भी स्थितियाँ वैसी ही है|

लीजिए प्रस्तुत है अली सरदार जाफरी साहब की यह सुंदर रचना-

 

 

माँ है रेशम के कारख़ाने में
बाप मसरूफ़ सूती मिल में है,
कोख से माँ की जब से निकला है
बच्चा खोली के काले दिल में है|

 

जब यहाँ से निकल के जाएगा
कारख़ानों के काम आएगा,
अपने मजबूर पेट की ख़ातिर
भूख सरमाये की बढ़ाएगा|

 

हाथ सोने के फूल उगलेंगे
जिस्म चांदी का धन लुटाएगा,
खिड़कियाँ होंगी बैंक की रौशन
खून इसका दिये जलाएगा|

 

यह जो नन्हा है भोला-भाला है
खूनी सरमाये का निवाला है,
पूछती है ये, इसकी ख़ामोशी
कोई मुझको बचाने वाला है !

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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राहें हैं तमाशाई राही भी तमाशाई!

आज विख्यात भारतीय शायर जनाब अली सरदार जाफरी साहब की एक गजल शेयर कर रहा हूँ| जाफरी साहब ने बहुत नायाब शायरी और गीत हम लोगों को दिए हैं| आपके अनेक गीत हिन्दी फिल्मों में सुपरहिट हुए हैं और इस गजल की तरह बहुत से गीत/गजलों को जगजीत सिंह जी और अन्य गायकों ने गाया है|

 

आज की यह गजल भी जगजीत सिंह साहब ने बड़े मन से गाई है| लीजिए इसका आनंद लीजिए-

 

 

आवारा हैं गलियों में मैं और मेरी तनहाई,
जाएँ तो कहाँ जाएँ ,हर मोड़ पे रुसवाई|

 

ये फूल से चेहरे हैं हँसते हुए गुलदस्ते
कोई भी नहीं अपना बेगाने हैं सब रस्ते,
राहें हैं तमाशाई, राही भी तमाशाई|
मैं और मेरी तन्हाई||

 

अरमान सुलगते हैं सीने में चिता जैसे
कातिल नज़र आती है दुनिया की हवा जैसे,
रोती है मेरे दिल पर बजती हुई शहनाई|
मैं और मेरी तन्हाई||

 

आकाश के माथे पर तारों का चरागाँ है
पहलू में मगर मेरे जख्मों का गुलिस्तां है,
 आंखों से लहू टपका, दामन में बहार आई|
मैं और मेरी तन्हाई||

 

हर रंग में ये दुनिया सौ रंग दिखाती है
रोकर कभी हंसती है, हंस कर कभी गाती है,
ये प्यार की बाहें हैं या मौत की अंगडाई|
मैं और मेरी तन्हाई ||

 

 

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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