झुलस रहे हैं यहाँ छाँव बाँटने वाले!

झुलस रहे हैं यहाँ छाँव बाँटने वाले,
वो धूप है कि शजर इलतिजाएँ करने लगे|

राहत इन्दौरी

मिलावट न करो छाँव में!

ऐ मेरे हम-सफ़रों तुम भी थाके-हारे हो,
धूप की तुम तो मिलावट न करो छाँव में|

क़तील शिफ़ाई

जिसका कोई साया भी नहीं!

प्यास वो दिल की बुझाने कभी आया भी नहीं,
कैसा बादल है जिसका कोई साया भी नहीं|

क़तील शिफ़ाई

अपने ही साये से भी डर जाता हूँ मैं!

सारी दुनिया से अकेले जूझ लेता हूँ कभी,
और कभी अपने ही साये से भी डर जाता हूँ मैं|

राजेश रेड्डी

मैं अपने साये से–

अजीब सानेहा मुझ पर गुज़र गया यारो,
मैं अपने साये से कल रात डर गया यारो|

शहरयार

साये में धूप लगती है

यहाँ दरख्तों के साये में धूप लगती है,
चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए|

दुष्यंत कुमार

साये से डराता क्या है!

उम्र भर अपने गरीबां से उलझने वाले,
तू मुझे मेरे ही साये से डराता क्या है|