पहली सी नहीं, कुछ कम है!

आज भी है तेरी दूरी ही उदासी का सबब,
यह अलग बात कि पहली सी नहीं, कुछ कम है|

शहरयार

ज़्यादा है, कहीं कुछ कम है!

अब जिधर देखिए लगता है कि इस दुनिया में,
कहीं कुछ ज़्यादा है, कहीं कुछ कम है|

शहरयार

यकीं कुछ कम है!

बिछड़े लोगों से मुलाक़ात कभी फिर होगी,
दिल में उम्मीद तो काफी है, यकीं कुछ कम है|

शहरयार

ये ज़मीं कुछ कम है!

घर की तामीर तसव्वुर ही में हो सकती है,
अपने नक्शे के मुताबिक़ ये ज़मीं कुछ कम है|

शहरयार

अहसास कहीं कुछ कम है!

ज़िंदगी जैसी तवक्को थी नहीं, कुछ कम है,
हर घड़ी होता है अहसास कहीं कुछ कम है|

शहरयार

कुछ दूर माहताब के साथ!

ज़मीन तेरी कशिश खींचती रही हमको,
गए ज़रूर थे कुछ दूर माहताब के साथ|

शहरयार

दूर तलक मरहबा के नारे हैं!

फ़िज़ा में दूर तलक मरहबा के नारे हैं,
गुज़रने वाले हैं कुछ लोग याँ से ख़्वाब के साथ|

शहरयार

अजीब महक साथ ले के आई है!

बड़ी अजीब महक साथ ले के आई है,
नसीम, रात बसर की किसी गुलाब के साथ|

शहरयार

रिश्ता था जब सराब के साथ!

तो फिर बताओ समंदर सदा को क्यूँ सुनते,
हमारी प्यास का रिश्ता था जब सराब के साथ|

शहरयार

धूप नहीं निकली आफ़ताब के साथ!

कटेगा देखिए दिन जाने किस अज़ाब* के साथ,
कि आज धूप नहीं निकली आफ़ताब के साथ|
*कष्ट, उत्पीड़न
शहरयार