तुंद-हवाओं में जलाए हैं चराग़!

हमने उन तुंद-हवाओं में जलाए हैं चराग़,
जिन हवाओं ने उलट दी हैं बिसातें अक्सर|

जाँ निसार अख़्तर

कभी चेहरे भी पढ़े हैं तुमने!

उनसे पूछो कभी चेहरे भी पढ़े हैं तुमने,
जो किताबों की किया करते हैं बातें अक्सर|

जाँ निसार अख़्तर

जान के खा लेते हैं मातें अक्सर!

हमसे इक बार भी जीता है न जीतेगा कोई,
वो तो हम जान के खा लेते हैं मातें अक्सर|

जाँ निसार अख़्तर

लुटती हुई देखी हैं बरातें अक्सर!

इश्क़ रहज़न न सही इश्क़ के हाथों फिर भी,
हमने लुटती हुई देखी हैं बरातें अक्सर|

जाँ निसार अख़्तर

दिल पर तिरी बातें अक्सर!

और तो कौन है जो मुझ को तसल्ली देता,
हाथ रख देती हैं दिल पर तिरी बातें अक्सर|

जाँ निसार अख़्तर

सितारों की बरातें अक्सर!

हमने काटी हैं तिरी याद में रातें अक्सर,
दिल से गुज़री हैं सितारों की बरातें अक्सर|

जाँ निसार अख़्तर

लफ़्ज़ों में कोई आग छुपा दी जाए!

हमसे पूछो कि ग़ज़ल क्या है ग़ज़ल का फ़न क्या,
चंद लफ़्ज़ों में कोई आग छुपा दी जाए|

जाँ निसार अख़्तर

तेरी जवानी भी मिला दी जाए!

कम नहीं नश्शे में जाड़े की गुलाबी रातें,
और अगर तेरी जवानी भी मिला दी जाए|

जाँ निसार अख़्तर

ज़ख़्मों को दुआ दी जाए!

इन्हीं गुल-रंग दरीचों से सहर झाँकेगी,
क्यूँ न खिलते हुए ज़ख़्मों को दुआ दी जाए|

जाँ निसार अख़्तर

लाश चटानों में दबा दी जाए!

दिल का वो हाल हुआ है ग़म-ए-दौराँ के तले,
जैसे इक लाश चटानों में दबा दी जाए|

जाँ निसार अख़्तर