तितली को गिरा कर देखो!

गुल से लिपटी हुई तितली को गिरा कर देखो,
आँधियो तुम ने दरख़्तों को गिराया होगा|

कैफ़ भोपाली

लिक्खा था अंधेरा शायद!

दिल की क़िस्मत ही में लिक्खा था अंधेरा शायद,
वर्ना मस्जिद का दिया किस ने बुझाया होगा|

कैफ़ भोपाली

यही रीत है ऐ शाख़-ए-गुल!

इस गुलिस्ताँ की यही रीत है ऐ शाख़-ए-गुल,
तूने जिस फूल को पाला वो पराया होगा|

कैफ़ भोपाली

पड़ोसी के घर आया होगा!

दिल-ए-नादाँ न धड़क ऐ दिल-ए-नादाँ न धड़क,
कोई ख़त ले के पड़ोसी के घर आया होगा|

कैफ़ भोपाली

दरवाज़ा हवाओं ने हिलाया होगा!

कौन आएगा यहाँ कोई न आया होगा,
मेरा दरवाज़ा हवाओं ने हिलाया होगा|

कैफ़ भोपाली

लोग कुछ डूबते नजर आए!

जब भी आंखों में अश्क भर आए लोग कुछ डूबते नजर आए
चांद जितने भी गुम हुए शब के सब के इल्ज़ाम मेरे सर आए|

गुलज़ार

जैसे हम को पुकारता है कोई!

देर से गूँजते हैं सन्नाटे
जैसे हम को पुकारता है कोई ।

गुलज़ार

आ के फूँक दो उड़ता नहीं धुआँ!

चिंगारी इक अटक सी गई मेरे सीने में,
थोड़ा सा आ के फूँक दो उड़ता नहीं धुआँ|

गुलज़ार

चेहरा फेर लेने से छुपता नहीं धुआँ!

आँखों के पोछने से लगा आग का पता,
यूँ चेहरा फेर लेने से छुपता नहीं धुआँ|

गुलज़ार

लकीरें खींच रहा है फ़ज़ाओं में!

काली लकीरें खींच रहा है फ़ज़ाओं में,
बौरा गया है मुँह से क्यूँ खुलता नहीं धुआँ|

गुलज़ा