वो अठखेलियां कहाँ राही!

नजर-नवाज़ वो अठखेलियां कहाँ राही,
चले है बाद-ए-सबा अब तो गुल कतरते हुए।

मिलाप चंद राही

शीर्ष से उतरना!

खुदा करे कि तू बाम-ए-उरूज़ पर जाकर
किसी को देख सके सीढ़ियां उतरते हुए।

मिलाप चंद राही

लरजना ज़ुबां का!

रवां-दवां थी, सियासत में रंग भरते हुए,
लरज़ गई है ज़ुबां, दिल की बात करते हुए।

मिलाप चंद राही

तुम मेरी ग़ज़लें गाओगे!

बेचैनी जब बढ जायेगी और याद किसी की आयेगी,
तुम मेरी ग़ज़लें गाओगे जब इश्क़ तुम्हें हो जायेगा|

सईद राही

तुम भी घर देर से आओगे!

जब सूरज भी खो जायेगा और चाँद कहीं सो जायेगा,
तुम भी घर देर से आओगे जब इश्क़ तुम्हें हो जायेगा|

सईद राही

तावीज़ें भी बँधवाओगे!

हर बात गवारा कर लोगे, मन्नत भी उतारा कर लोगे,
तावीज़ें भी बँधवाओगे जब इश्क़ तुम्हें हो जायेगा|

सईद राही

जब इश्क़ तुम्हें हो जायेगा!

मेरे जैसे बन जाओगे जब इश्क़ तुम्हें हो जायेगा,
दीवारों से टकराओगे जब इश्क़ तुम्हें हो जायेगा|

सईद राही

हम कि रूठी हुई रुत को भी मना लेते थे!

हम कि रूठी हुई रुत को भी मना लेते थे,
हम ने देखा ही न था मौसम-ए-हिज्राँ जाना|

अहमद फ़राज़

हर कोई अपनी ही आवाज़ से काँप उठता है!

हर कोई अपनी ही आवाज़ से काँप उठता है,
हर कोई अपने ही साये से हिरासाँ जाना|

अहमद फ़राज़