तुझको अगर भूल जाएँ हम!

अब और क्या किसी से मरासिम बढ़ाएँ हम,
ये भी बहुत है तुझको अगर भूल जाएँ हम|

अहमद फ़राज़

मेरी तरह तुझको भी तन्हा रक्खे!

हँस न इतना भी फ़क़ीरों के अकेले-पन पर,
जा ख़ुदा मेरी तरह तुझको भी तन्हा रक्खे|

अहमद फ़राज़

और का होने दे न अपना रक्खे!

दिल भी पागल है कि उस शख़्स से वाबस्ता है,
जो किसी और का होने दे न अपना रक्खे|

अहमद फ़राज़

तो फिर नाम भी तुझ सा रक्खे!

हमको अच्छा नहीं लगता कोई हमनाम तिरा,
कोई तुझ सा हो तो फिर नाम भी तुझ सा रक्खे|

अहमद फ़राज़

जान के दुश्मन तुझे अल्लाह रक्खे!

उम्र भर कौन निभाता है तअल्लुक़ इतना,
ऐ मिरी जान के दुश्मन तुझे अल्लाह रक्खे|

अहमद फ़राज़

वो किसे प्यासा रक्खे!

हर कोई दिल की हथेली पे है सहरा रक्खे,
किसको सैराब करे वो किसे प्यासा रक्खे|

अहमद फ़राज़

मैं कहाँ दफ़्न हूँ कुछ पता तो चले!

बेलचे लाओ खोलो ज़मीं की तहें,
मैं कहाँ दफ़्न हूँ कुछ पता तो चले|

कैफ़ी आज़मी

हुनर तुम सिखा तो चले!

उसको मज़हब कहो या सियासत कहो,
ख़ुदकुशी का हुनर तुम सिखा तो चले|

कैफ़ी आज़मी