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सिर्फ अंगूठे हैं हम लोग!

आज किसी ब्लॉग पोस्ट में ही शेरजंग गर्ग जी का उल्लेख देखा तो सोचा कि उनकी ही रचना आज शेयर की जाए| बहुत पहले जब मैं दिल्ली में रहता था (1980 तक) तब कुछ कवि गोष्ठियों में उनका रचना पाठ सुनने का मौका मिला था, श्रेष्ठ रचनाकार हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री शेरजंग गर्ग जी की लिखी एक ग़ज़ल-

ख़ुद से रूठे हैं हम लोग।
टूटे-फूटे हैं हम लोग॥

सत्य चुराता नज़रें हमसे,
इतने झूठे हैं हम लोग।

इसे साध लें, उसे बांध लें,
सचमुच खूँटे हैं हम लोग।

क्या कर लेंगी वे तलवारें,
जिनकी मूँठें हैं हम लोग।

मय-ख़्वारों की हर महफ़िल में,
खाली घूंटें हैं हम लोग।


हमें अजायबघर में रख दो,
बहुत अनूठे हैं हम लोग।

हस्ताक्षर तो बन न सकेंगे,
सिर्फ़ अँगूठे हैं हम लोग।

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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