शेष!

श्री गंगा प्रसाद विमल जी की पहचान मुख्यतः कथाकार, उपन्यासकार के रूप में होती है परंतु उनके कविता संकलन भी प्रकाशित हुए हैं और एक कवि की भूमिका में भी वे समान रूप से सक्रिय रहे हैं||
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री गंगा प्रसाद विमल जी की यह लंबी कविता –


शेष
कई बार लगता है
मैं ही रह गया हूँ अबीता पृष्ठ
बाकी पृष्ठों पर
जम गई है धूल।

धूल के बिखरे कणों में
रह गए हैं नाम
कई बार लगता है
एक मैं ही रह गया हूँ
अपरिचित नाम।

इतने परिचय हैं
और इतने सम्बंध
इतनी आंखें हैं
और इतना फैलाव
पर बार-बार लगता है
मैं ही रह गया हूँ
सिकुड़ा हुआ दिन।

बेहिसाब चेहरे हैं
बेहिसाब धंधे
और उतने ही देखने वाले दृष्टि के अंधे
जिन्होंने नहीं देखा है
देखते हुए
उस शेष को
उस एकांत शेष को
जो मुझे पहचानता है
पहचानते हुए छोड देता है
समय के अंतरालों में…


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

एक बात और इस पोस्ट में जिस रेखाचित्र का उपयोग किया गया है, वह मेरी पत्नी श्रीमती मनोरमा शर्मा ने बनाया है|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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