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मन का बुझा दीपक नहीं जलता!

ऐसे बहुत से लोग होते हैं जिनको अतीत में रहना बहुत अच्छा लगता है और अक्सर वे वर्तमान का सामना करने से बचने के लिए भी अतीत में डेरा डाल लेते हैं, क्योंकि वहाँ वे अपने आपको ज्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं|

मेरे साथ ऐसा तो नहीं है, परंतु चाहे वह कविता की बात हो या फिल्मों की, मुझे अतीत की कृतियों से जुड़ने में बहुत आसानी लगती है| आज जो सृजन हो रहा है, उसके बारे में भविष्य में लोग बात करेंगे, या शायद आज भी करते होंगे, जैसे साहिर जी ने कहा है- ‘कल और आएंगे, नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले, मुझसे बेहतर कहने वाले, तुमसे बेहतर सुनने वाले!

खैर अब ज्यादा लंबा न खींचते हुए मैं कह सकता हूँ, कि मैं ‘अपने ज़माने के एक कवि’ की कविता शेयर कर रहा हूँ, जो मंचों पर धूम मचाते थे, ये थे स्वर्गीय शिशुपाल सिंह ‘निर्धन’ जी| उनके एक गीत की पंक्तियाँ मुझे अक्सर याद आती हैं- ‘एक पुराने दुख ने पूछा, क्या तुम अभी वहीं रहते हो, उत्तर दिया चले मत आना, मैंने वो घर बदल लिया है’|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शिशुपाल सिंह ‘निर्धन’ जी की यह रचना-

न दे पाओ अगर तुम साथ,मेरी राह मत रोको
बिना श्रम के कभी विश्राम का पौधा नहीं फलता,
यहाँ तुम प्यार की बातें न छेड़ो,मन बहकता है
न कोई भी सुमन देखो,यहाँ सब दिन महकता है|
यहाँ पर तृप्ति ने कब किस अधर की प्यास चूमी है
उमर लेकर मुझे अब तक हजारों घाट घूमी है|
भले ही साथ मत रहना,थकन की बात मत कहना
न दो वरदान चलने का,गलत संकेत मत देना,
कभी पतझार के मारे कुसुम खिल भी निकलते हैं
मगर संकेत के मारे पथिक को घर नहीं मिलता|
बिना श्रम के कभी विश्राम का पौधा नहीं फलता
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न दे पाओ अगर तुम साथ...

मुझे है चाव चलने का डगर फिर मात क्या देगी
गगन के बादलों की छाँव मेरा साथ क्या देगी,
अधिक ठहरो जहां,स्वागत वहां सच्चा नहीं होता
बहुत रुकना पराये गाँव मे अच्छा नहीं होता|
भले गति-दान मत देना,नई हर ठान मत देना
जो मन छोटा करे मेरा,मुझे वो गान मत देना|
बुझे दीपक समय पर फिर कभी जल भी निकलते हैं
मगर मन का बुझा दीपक कभी आगे नहीं जलता|
बिना श्रम के कभी विश्राम का पौधा नहीं फलता|
न दे पाओ अगर तुम साथ…


जनम के वक्ष पर ऐसी लगी कोई चोट गहरी है
लगन की अब सफलता के चरण पर आँख ठहरी है,
यहाँ भटकी हुई हर ज़िन्दगी ही दाब खाती है
क्षमा केवल यहाँ अपराध के सिक्के कमाती है|
चुभन से मेल है मेरा,डगर के शूल मत बीनो
हवन तो खेल है मेरा,हटो विश्वास मत छीनो|
चरण हारे हुए तो फिर कभी चल भी निकलते हैं
मगर हारा हुआ साथी कभी आगे नहीं चलता|
बिना श्रम के कभी विश्राम का पौधा नहीं फलता|
न दे पाओ अगर तुम साथ…

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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कितने दाग लगे चादर में!

एक समय था जब दिल्ली में रहते हुए कवि सम्मेलनों, कवि गोष्ठियों आदि के माध्यम से अनेक श्रेष्ठ कवियों को सुनने का मौका मिलता है| अब वैसा माहौल नहीं रहा, एक तो ‘कोरोना’ ने भी बहुत कुछ बदल दिया है|


हाँ तो पुराने समय के काव्य-मंचों पर उभरने वाले बहुत से कवि, जिनकी कविताएं मैं शेयर करता रहा हूँ, उनमें से जो नाम मुझे आज याद आ रहा है, वे हैं स्वर्गीय शिशुपाल सिंह निर्धन जी, लीजिए आज उनका एक सुंदर गीत शेयर कर रहा हूँ-

अगर चल सको साथ चलो तुम, लेकिन मुझसे यह मत पूछो,
कितने चलकर आए हो तुम, कितनी मंज़िल शेष रह गई?

हम तुम एक डगर के राही
आगे-पीछे का अन्तर है,
धरती की अर्थी पर सबको
मिला कफ़न यह नीलाम्बर है ।
अगर जल सको साथ जलो तुम, लेकिन मुझसे यह मत पूछो,
अभी चिताओं के मेले में कितनी हलचल शेष रह गई ?


मुझे ओस की बूंद समझकर
प्यासी किरन रोज़ आती है,
फूलों की मुस्कान चमन में
फिर भी मुझे रोज़ लाती है ।
तड़प सको तो साथ तड़प लो, लेकिन मुझसे यह मत पूछो,
कितनी धरा भिगोई तुमने कितनी मरुथल शेष रह गई ?

अवनी पर चातक प्यासे हैं
अम्बर में चपला प्यासी है,
किसकी प्यास बुझाए बादल
ये याचक हैं, वह दासी है ।
बनो तृप्ति बन सको अगर तुम, लेकिन मुझसे यह मत पूछो,
कितनी प्यास बुझा लाए हो, कितनी असफल शेष रह गई ?


जीवन एक ग्रंथ है जिसका
सही एक अनुवाद नहीं है,
तुम्हें बताऊँ कैसे साथी
अर्थ मुझे भी याद नहीं है ?
बुझा सको तो साथ बुझाओ, लेकिन मुझसे यह मत पूछो,
मरघट के घट की वह ज्वाला, कितनी चंचल शेष रह गई ?

घाट-घाट पर घूम रहे हैं
भरते अपनी सभी गगरिया,
बदल-बदल कर ओढ़ रहे हैं
अपनी-अपनी सभी चदरिया ।
ओढ़ सको तो साथ ओढ़ लो, लेकिन मुझसे यह मत पूछो,
कितने दाग़ लगे चादर में, कितनी निर्मल शेष रह गई ?


आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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