लचक जाए तो लगता है कि तुम हो!

जब शाख़ कोई हाथ लगाते ही चमन में,
शरमाए लचक जाए तो लगता है कि तुम हो|

जाँ निसार अख़्तर

कुछ तो शर्माई भी होती है!

चमकती है कोई बिजली तो शम-ए-रहगुज़र बनकर,
निगाह-ए-बरहम इनकी कुछ तो शर्माई भी होती है|

क़तील शिफ़ाई

बदन के ख़ोल में मैं बंद हो गया!

अपने बदन के ख़ोल में मैं बंद हो गया,
मुझको मिली कल एक जो लड़की खुली हुई|

सूर्यभानु गुप्त

हो गयी वो नज़र सयानी भी!

अपनी मासूमियों के पर्दे में
हो गयी वो नज़र सयानी भी।

फ़िराक़ गोरखपुरी

तुम कनक किरन!


आज फिर से मैं छायावाद युग के एक और स्तंभ कवि स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| प्रसाद जी ने जहां कामायनी, आँसू आदि जैसी अमर रचनाएं लिखी हैं, वहीं भारतीय संस्कृति के गौरव की पताका फहराने वाली अनेक कविताएं एवं नाटक भी लिखे थे|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी की यह रूमानी कविता –

तुम कनक किरन के अंतराल में
लुक छिप कर चलते हो क्यों ?

नत मस्तक गर्व वहन करते
यौवन के घन रस कन झरते
हे लाज भरे सौंदर्य बता दो
मोन बने रहते हो क्यो?

अधरों के मधुर कगारों में
कल कल ध्वनि की गुंजारों में
मधु सरिता सी यह हंसी तरल
अपनी पीते रहते हो क्यों?

बेला विभ्रम की बीत चली
रजनीगंधा की कली खिली
अब सांध्य मलय आकुलित दुकूल
कलित हो यों छिपते हो क्यों?


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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शर्माना ज़रूरी है!

बहुत बेबाक आंखों में तअ’ल्लुक़ टिक नहीं पाता,
मोहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है|

वसीम बरेलवी