नाज़ुक सा फ़साना है!

आँखों में नमी सी है चुप चुप से वो बैठे हैं,
नाज़ुक सी निगाहों में नाज़ुक सा फ़साना है|

जिगर मुरादाबादी

इसमें रूह की आवाज़ भी है!

मेरी ख़ामोशि-ए-दिल पर न जाओ,
कि इसमें रूह की आवाज़ भी है|

अर्श मलसियानी

आवाज़ होती जा रही है!

ख़मोशी साज़ होती जा रही है,
नज़र आवाज़ होती जा रही है|

आनंद नारायण ‘मुल्ला’

वुसअतें, खामोशियाँ, गहराइयाँ!

‘कैफ’ पैदा कर समंदर की तरह,
वुसअतें, खामोशियाँ, गहराइयाँ|

कैफ़ भोपाली

सन्नाटों में बोलनेवाला-

मेरे आंगन में आये या तेरे सर पर चोट लगे,
सन्नाटों में बोलनेवाला पत्थर अच्छा लगता है।

निदा फ़ाज़ली

मेरी आवाज़ वहां तक पहुंचे!

एक इस आस पे अब तक है मेरी बन्द जुबां,
कल को शायद मेरी आवाज़ वहां तक पहुंचे।

गोपालदास “नीरज”

ये ख़ामोशी कहाँ तक पहुंचे!

इतना मालूम है, ख़ामोश है सारी महफ़िल,
पर न मालूम, ये ख़ामोशी कहाँ तक पहुंचे ।

गोपालदास “नीरज”

अपनी बात सुनाई भी!

ख़ामोशी का हासिल भी इक लम्बी सी ख़ामोशी है,
उनकी बात सुनी भी हमने अपनी बात सुनाई भी|

गुलज़ार