इस क़दर हमने सुकूँ पाया न था!

उफ़ ये सन्नाटा कि आहट तक न हो जिसमें मुख़िल,
ज़िंदगी में इस क़दर हमने सुकूँ पाया न था|

क़तील शिफ़ाई

ये ख़ामोशी क्या चीज़ है!

हम लबों से कह न पाए उन से हाल-ए-दिल कभी,
और वो समझे नहीं ये ख़ामोशी क्या चीज़ है|

निदा फ़ाज़ली

नाज़ुक सा फ़साना है!

आँखों में नमी सी है चुप चुप से वो बैठे हैं,
नाज़ुक सी निगाहों में नाज़ुक सा फ़साना है|

जिगर मुरादाबादी

इसमें रूह की आवाज़ भी है!

मेरी ख़ामोशि-ए-दिल पर न जाओ,
कि इसमें रूह की आवाज़ भी है|

अर्श मलसियानी

आवाज़ होती जा रही है!

ख़मोशी साज़ होती जा रही है,
नज़र आवाज़ होती जा रही है|

आनंद नारायण ‘मुल्ला’

वुसअतें, खामोशियाँ, गहराइयाँ!

‘कैफ’ पैदा कर समंदर की तरह,
वुसअतें, खामोशियाँ, गहराइयाँ|

कैफ़ भोपाली