हम-सुख़न तेरी ख़ामुशी है अभी!

तू शरीक-ए-सुख़न नहीं है तो क्या,
हम-सुख़न तेरी ख़ामुशी है अभी|

नासिर काज़मी

कितनी लम्बी ख़ामोशी से गुज़रा हूँ!

कितनी लम्बी ख़ामोशी से गुज़रा हूँ,
उनसे कितना कुछ कहने की कोशिश की|

गुलज़ार

ख़मोशी ग़ज़ल गुनगुनाने लगी!

ख़यालों के तारीक खंडरात में,
ख़मोशी ग़ज़ल गुनगुनाने लगी|

आदिल मंसूरी

सितारे टूटते हैं रात ही में!

चमकती है अंधेरों में ख़मोशी,
सितारे टूटते हैं रात ही में|

निदा फ़ाज़ली

ख़मोशी ही मेरा कलाम हो गई है!

किसी से गुफ़्तुगू करने को जी नहीं करता,
मिरी ख़मोशी ही मेरा कलाम हो गई है|

राजेश रेड्डी

ख़ामोश तो मंज़र न फ़ना का होता!

ऐसा ख़ामोश तो मंज़र न फ़ना का होता,
मेरी तस्वीर भी गिरती तो छनाका होता|

गुलज़ा

उसने भी पुर्सिश नहीं की!

अहल-ए-महफ़िल पे कब अहवाल खुला है अपना,
मैं भी ख़ामोश रहा उसने भी पुर्सिश* नहीं की|

*पूछताछ

अहमद फ़राज़

ख़त्म हो जाना समझ बैठे थे हम!

कान बजते हैं मोहब्बत के सुकूत-ए-नाज़ को,
दास्ताँ का ख़त्म हो जाना समझ बैठे थे हम|

फ़िराक़ गोरखपु
री

ख़ामुशी जिनकी तर्जुमानी है!

ऐ लब-ए-नाज़ क्या हैं वो असरार,
ख़ामुशी जिनकी तर्जुमानी है|

फ़िराक़ गोरखपुरी

उनसे जो थी गुफ़्तुगू वो ख़त्म हुई!

हमारी उनसे जो थी गुफ़्तुगू वो ख़त्म हुई,
मगर सुकूत सा कुछ दरमियान बाक़ी है|

जावेद अख़्तर