गूँगी ही सही, गाती तो है!

एक खँडहर के हृदय-सी,एक जंगली फूल-सी,
आदमी की पीर गूँगी ही सही, गाती तो है|

दुष्यंत कुमार

मैं गुनगुना रही थी कि!

कल शाम छत पे मीर-तक़ी-‘मीर’ की ग़ज़ल,
मैं गुनगुना रही थी कि तुम याद आ गए|

अंजुम रहबर