ख़्वाब अगली सदी के देखते हैं!

नींद पिछली सदी की ज़ख़्मी है,
ख़्वाब अगली सदी के देखते हैं|

राहत इन्दौरी

मगर नींद भी न आई हो!

वो तो सोते जागते रहने के मौसमों का फुसूँ,
कि नींद में हों मगर नींद भी न आई हो|

परवीन शाकिर

उनमें नींद पराई है!

यों लगता है सोते जागते औरों का मोहताज हूँ मैं,
आँखें मेरी अपनी हैं पर उनमें नींद पराई है|

क़तील शिफ़ाई

नींद टूटी तो फिर नहीं आई!

नींद टूटी तो फिर नहीं आई,
क्या बताएँ कि ख़्वाब क्या देखा !

नक़्श लायलपुरी

मेरी छत पे टहलते क्यों हैं!

नींद से मेरा त’अल्लुक़ ही नहीं बरसों से,
ख्वाब आ आ के मेरी छत पे टहलते क्यों हैं|

राहत इन्दौरी

जगा दिया तेरी पाज़ेब ने!

सुला चुकी थी ये दुनिया थपक थपक के मुझे,
जगा दिया तेरी पाज़ेब ने खनक के मुझे|

राहत इन्दौरी

नये-पुराने शहरों में!

हमने भी सोकर देखा है नये-पुराने शहरों में,
जैसा भी है अपने घर का बिस्तर अच्छा लगता है ।

निदा फ़ाज़ली

कोई झांकता लगे है मुझे!

मैं सो भी जाऊँ तो मेरी बंद आंखों में,
तमाम रात कोई झांकता लगे है मुझे|

जां निसार अख़्तर

वो आवाज़-ए-पा लगे है मुझे!

जो आंसुओं में कभी रात भीग जाती है,
बहुत क़रीब वो आवाज़-ए-पा लगे है मुझे|

जां निसार अख़्तर