जा तुझको भी नींद न आए!

आज एक बार फिर से मैं हिन्दी के एक महान गीतकार स्वर्गीय भारत भूषण जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| भारत भूषण जी के गीत पढ़ना और उससे भी अधिक जो सौभाग्य मुझे अनेक बार मिला, उनको गीत पाठ करते हुए सुनना एक दिव्य अनुभव होता था| उनके बहुत से गीत अमर हैं, जैसे- ‘चक्की पर गेंहू लिए खड़ा’, ‘आधी उमर करके धुआँ ये तो कहो किसके हुए’, ‘ मैं बनफूल भला मेरा कैसा खिलना, क्या मुरझाना’ आदि|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भारत भूषण जी का यह गीत, जिसमें उन्होंने प्रेम में एक अलग ही अंदाज़ में उलाहना दिया है –

मेरी नींद चुराने वाले, जा तुझको भी नींद न आए,
पूनम वाला चांद तुझे भी सारी-सारी रात जगाए|

तुझे अकेले तन से अपने, बड़ी लगे अपनी ही शैय्या
चित्र रचे वह जिसमें, चीरहरण करता हो कृष्ण-कन्हैया,
बार-बार आँचल सम्भालते, तू रह-रह मन में झुंझलाए
कभी घटा-सी घिरे नयन में, कभी-कभी फागुन बौराए|
मेरी नींद चुराने वाले, जा तुझको भी नींद न आए|

बरबस तेरी दृष्टि चुरा लें, कंगनी से कपोत के जोड़े
पहले तो तोड़े गुलाब तू, फिर उसकी पंखुडियाँ तोड़े,
होठ थकें ‘हाँ’ कहने में भी, जब कोई आवाज़ लगाए
चुभ-चुभ जाए सुई हाथ में, धागा उलझ-उलझ रह जाए|
मेरी नींद चुराने वाले, जा तुझको भी नींद न आए|


बेसुध बैठ कहीं धरती पर, तू हस्ताक्षर करे किसी के
नए-नए संबोधन सोचे, डरी-डरी पहली पाती के,
जिय बिनु देह नदी बिनु वारी, तेरा रोम-रोम दुहराए
ईश्वर करे हृदय में तेरे, कभी कोई सपना अँकुराए|
मेरी नींद चुराने वाले, जा तुझको भी नींद न आए|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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