मुस्कुराने वाले थे!

भला ग़मों से कहाँ हार जाने वाले थे,
हम आँसुओं की तरह मुस्कुराने वाले थे|

वसीम बरेलवी

वो ख़ंजर लेके आया है!

तबस्सुम उसके होठों पर है उसके हाथ में गुल है,
मगर मालूम है मुझको वो ख़ंजर लेके आया है|

राजेश रेड्डी

गम छुपाने के लिए भी!

हो खुशी भी उनको हासिल ये ज़रूरी तो नहीं,
गम छुपाने के लिए भी मुस्कुरा लेते हैं लोग|

क़तील शिफ़ाई

किस्मत में ईनाम नहीं होता!

हँस- हँस के जवां दिल के, हम क्यों न चुनें टुकडे़,
हर शख्स़ की किस्मत में ईनाम नहीं होता|

मीना कुमारी

बच्चों की कापी में इबारत सी!

हँसी मासूम सी बच्चों की कापी में इबारत सी,
हिरन की पीठ पर बैठे परिन्दे की शरारत सी|

बशीर बद्र

मेरी मुस्कानों के नीचे—

मेरी मुस्कानों के नीचे,
ग़म के खज़ाने गड़े हुए हैं|

राजेश रेड्डी

मगर वो कोई फ़ैसला तो सुना दें!

ज़नाब सुदर्शन फ़ाक़िर साहब एक श्रेष्ठ शायर रहे हैं, उनके बहुत सुंदर गीत, ग़ज़लें आदि विभिन्न गायकों ने गायी हैं| वैसे कवि शायर आदि भी अजीब लोग होते हैं, एक मामूली सी अदा के लिए वे कुछ भी कुर्बान करने को तैयार हो जाते हैं, कम से कम कविता और शायरी में तो ऐसा ही होता है|

आज मैं सुदर्शन फ़ाकिर साहब की जो ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ, वह बहुत सुंदर ग़ज़ल है और इसे स्वर्गीय जगजीत सिंह जी और चित्रा सिंह जी ने भी गाया था| लीजिए प्रस्तुत है ये ग़ज़ल –


अगर हम कहें और वो मुस्कुरा दें
हम उनके लिए ज़िंदगानी लुटा दें

हर एक मोड़ पर हम ग़मों को सज़ा दें
चलो ज़िन्दगी को मोहब्बत बना दें

अगर ख़ुद को भूले तो, कुछ भी न भूले
कि चाहत में उनकी, ख़ुदा को भुला दें

कभी ग़म की आँधी, जिन्हें छू न पाये
वफ़ाओं के हम, वो नशेमन बना दें

क़यामत के दीवाने कहते हैं हमसे
चलो उनके चहरे से पर्दा हटा दें

सज़ा दें, सिला दें, बना दें, मिटा दें
मगर वो कोई फ़ैसला तो सुना दें



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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