उठाई नदामत कहाँ कहाँ!

दुनिया से ऐ दिल इतनी तबीअ’त भरी न थी,
तेरे लिए उठाई नदामत कहाँ कहाँ|

फ़िराक़ गोरखपुरी

मेरी ही तरह शहर में तन्हा होगा!

उसके दुश्मन हैं बहुत आदमी अच्छा होगा,
वो भी मेरी ही तरह शहर में तन्हा होगा|

निदा फ़ाज़ली

इसे हर दिन फ़साने चाहिएँ!

तुम हक़ीक़त को लिए बैठे हो तो बैठे रहो,
ये ज़माना है इसे हर दिन फ़साने चाहिएँ|


राजेश रेड्डी

हँसने को ज़माना है !

हम इश्क़ के मारों का इतना ही फ़साना है,
रोने को नहीं कोई हँसने को ज़माना है |

जिगर मुरादाबादी

हमेशा की तरह!

एक बार फिर से मैं आज श्रेष्ठ गीत कवि और बहुत अच्छे इंसान, मेरे लिए बड़े भाई की तरह रहे स्वर्गीय किशन सरोज जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| किशन सरोज जी के कुछ गीत तो ऐसे हैं कि उनको सुनकर आँखों में आँसू आ जाते हैं और हम बहुत कुछ सोचने को मजबूर हो जाते हैं|
लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय किशन सरोज जी की यह ग़ज़ल जो सामाजिक सरोकार से जुड़ी है –

गालियाँ, गोलियाँ सब ओर हमेशा की तरह,
और चुपचाप हैं कमज़ोर हमेशा की तरह ।

काली मारूति में उठा ले गए फिर एक लड़की,
झुग्गियों में, लो मचा शोर हमेशा की तरह ।

गांव जा पाऊँ तो पूछूँ कि छत्तों पर अब भी,
नाचने आते हैं क्या मोर हमेशा की तरह ।

बेटियों से भी हमें आँख मिलाने की न ताब,
दिल में बैठा है कोई चोर हमेशा की तरह ।

कैसी घड़ियों में लड़ी प्रीति तुम्हारी ऐ किशन !
आज तक गीले हैं दृग-कोर हमेशा की तरह ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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वो वक़्त हमको ज़माने, नहीं दिया!

कुछ और वक़्त चाहते थे कि सोचें तेरे लिये,
तूने वो वक़्त हमको ज़माने, नहीं दिया|

मुनीर नियाज़ी

यही जन्नत निशाँ मेरा!

कहीं बारूद फूलों में, कहीं शोले शिगूफ़ों में,
ख़ुदा महफ़ूज़ रक्खे, है यही जन्नत निशाँ मेरा|

बेकल उत्साही

रिश्तेदारों का है मौला खैर!

इस दुनिया में तेरे बाद मेरे सर पर,
साया रिश्तेदारों का है मौला खैर|

राहत इन्दौरी

ये दुनिया सौ रंग दिखाती है!

हर रंग में ये दुनिया सौ रंग दिखाती है,
रोकर कभी हंसती है हंसकर कभी गाती है,
ये प्यार की बाहें हैं या मौत की अंगडाई|

अली सरदार जाफ़री

प्यार की बोली बोले कौन!

लोग अपनों के खूँ में नहाकर, गीता और कुरान पढ़ें,
प्यार की बोली याद है किसको, प्यार की बोली बोले कौन।

राही मासूम रज़ा