भाषा वंदना

आदरणीय सोम ठाकुर जी का बहुत प्रसिद्ध गीत है जो हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी की वंदना का गीत है| हिन्दी की समृद्ध परंपरा और शक्ति का जो वर्णन इस गीत में बहुत सहज भाव से कर दिया गया है, उसका वर्णन करने में विद्वानों को काफी लंबा विवरण देना पड़ता है|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री सोम ठाकुर जी का यह भाषा वंदना का अमर गीत –

करते है तन मन से वंदन जन -गण -मन की अभिलाषा का
अभिनंदन अपनी संस्कृति का, आराधान अपनी भाषा का

यह अपनी शक्ति – सर्जना के
माथे की है चंदन रोली
माँ के आँचल की छाया में
हमने जो सीखी है बोली

यह अपनी बँधी हुई अंजूरी, यह अपने महके शब्द सुमन
यह पूजन अपनी संस्कृति का, यह अर्चन अपनी भाषा का

अपने रत्नाकर के रहते
किसकी धारा के बीच बहें
हम इतने निर्धन नहीं कि
वाणी से औरों के ऋणी रहें

इसमे प्रतिबिंबित है अतीत, आकर ले रहा वर्तमान
यह दर्शन अपनी संस्कृति का, यह दर्पण अपनी भाषा का

यह उँचाई है तुलसी की
यह सूर – सिंध की गहराई
टंकार चंदबरदाई की
यह विद्यापति की पुरवाई

जयशंकर का जयकार, निराला का यह अपराजय ओज
यह गर्जन अपनी संस्कृति का, यह गुंजन अपनी भाषा का|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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पत्र तुम्हारे नाम


आज एक बार फिर से हिन्दी के प्रतिष्ठित, लोकप्रिय और सुरीले गीतकार श्री सोम ठाकुर जी एक और गीत शेयर कर रहा हूँ| आदरणीय सोम जी ने देश प्रेम, भाषा प्रेम और शुद्ध प्रेम के भी अनूठे गीत लिखे हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है आदरणीय सोम ठाकुर जी का यह प्रेम से परिपूर्ण गीत-

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सुर्ख सुबह
चम्पई दुपहरी
रंग रंग से लिख जाता मन
पत्र तुम्हारे नाम|

बाहों के ख़ालीपन पर यह
बढ़ता हुआ दवाब
चहरे पर थकान के जाले
बुनता हुआ तनाव
बढ़ने लगे देह से लिपटी
यादों के आयाम|

घबराहट भरती चुप्पी ने
नाप लिया है दिन
पत्थर -पत्थर हुए जा रहे
हाथ कटे पलछिन
मिटते नहीं मिटाए अब तो
होंठो लगे विराम|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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अंग-अंग डोल गई रंग भरी बातें!

आज एक बार फिर से मधुर और सृजनशील गीतकार सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| सोम जी ने जहां राष्ट्र और राष्ट्रभाषा को लेकर बहुत प्रेरक गीत लिखे हैं, वहीं उन्होंने बहुत नाजुक मनोभावों और मनः स्थितियों का चित्रण भी अपने गीतों में बड़ी कुशलता से किया है|

लीजिए आज प्रस्तुत है, माननीय सोम ठाकुर जी का यह गीत-



महुए – से महके दिन
मेंहदी – सी रातें
केसर – सी घोल गई
रंग भरी बातें

सुनी जो मिली कहीं खेतों की राहें
सरसों की पगडंडी , आमों कि छाहें
सुने जो मिले कहीं मुड़ते गलियारे
लहरों के चित्र -लिखे रेतिया किनारे
ठहर गया मन , ठहरे पाँव भी अजाने
अंग-अंग डोल गई रंग भरी बातें|

गीत रचे धरती, आकाश गुनगुनाए
पूरब ने गाए, पश्चिम ने दुहराए
शाकुन्तल स्वप्न बहे गीत के बहाने
कानों ने जाने, प्राणों ने पहचाने
वंशी के संग -संग जाने कब -कैसे
कंगन को तोल गई रंग भरी बातें|

उड़ती हैं चाहों की अनगिन कंदीलें

नैनों के हंस, रूप – रंगों की झीलें
हार गये बंद द्वार, गंध पवन जीती
हो गई ये बीती घड़ियाँ अनबीती
मन -मन को बाँध गई लौटती विदायें
गाँठ -गाँठ खोल गई रंग भरी बातें
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आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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समय के विष बुझे नाखून!

सोम ठाकुर जी मेरे प्रिय हिन्दी कवियों में से एक हैं, मेरा सौभाग्य है कि एक श्रोता और एक आयोजक के रूप में भी मुझे उनसे अनेक बार मिलने का अवसर प्राप्त हुआ और मैंने उनके बहुत से गीत पहले भी शेयर किए हैं, राष्ट्र प्रेम, भाषा प्रेम, विशुद्ध प्रेम, कौन सा क्षेत्र है जिसमें सोम जी ने लाज़वाब गीत और ग़ज़लों की सौगात नहीं दी है|

लीजिए आज प्रस्तुत है सोम ठाकुर जी का एक गीत जिसमें आज के जीवन में फैलते वैमनस्य के विष को उजागर किया गया है-


हवाए संदली हैं
हम बचें कैसे?
समय के विष बुझे
नाख़ून बढ़ते हैं

देखती आँखें छलक कर
रक्त का आकाश दहका-सा
महमहाते फागुनो में झूलकर भी
रह गया दिन बिना महका सा
पाँव बच्चों के
मदरसे की सहमती सीढ़ियों पर
बड़े डर के साथ चढ़ते हैं

स्वप्नवंशी चितवनों को दी विदा
स्वागत किया टेढ़ी निगाहों का
सहारा छीन लेते हैं पहरूए खुद
उनींदे गाँव की कमज़ोर बाहों का

ज़रा जाने-
भला ये कौन है जो
आदमी की खाल से
हर साज़ मढ़ते हैं?
समय के विष बुझे नाख़ून
बढ़ते है ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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पर दिलों पर हुक़ूमत हमारी रही!

आज फिर से पुरानी पोस्ट का दिन है, लीजिए मैं अपनी एक पुरानी पोस्ट, फिर से शेयर कर रहा हूँ|

यह उस समय की एक पोस्ट है जब मैं अपने जीवन के विभिन्न पड़ावों, सेवा स्थलों के अनुभवों के बारे में लिख रहा था| ये सभी पुरानी ब्लॉग पोस्ट आप कभी फुर्सत में पढ़ सकते हैं, इनमें श्रेष्ठ कवियों की रचनाएँ भी शामिल हैं|

लगभग ढाई वर्ष के लखनऊ प्रवास और सात वर्ष के ऊंचाहार प्रवास की कुछ छिटपुट घटनाएं याद करने का प्रयास करता हूँ।

एक घटना जो याद आ रही है, वह है लखनऊ के पिकप प्रेक्षागृह में आयोजित कवि सम्मेलन, जिसमें श्री सोम ठाकुर, माणिक वर्मा जी, पं. चंद्रशेखर मिश्र, ओम प्रकाश आदित्य जी आदि के अलावा डॉ. वसीम बरेलवी भी शामिल हुए थे।

इस आयोजन के समय पं. चंद्र शेखर मिश्र जी से काफी विस्तार से बातचीत हुई थी और कुछ समय बाद ही शायद उनका देहांत भी हो गया था। मुझे वाराणसी में अस्सी घाट के निकट उनके आवास पर जाने का भी अवसर मिला था। बहुत श्रेष्ठ रचनाकार थे और विशेष रूप से भोजपुरी साहित्य को उनकी भेंट अतुल्य है। ओम प्रकाश आदित्य जी और माणिक वर्मा जी तो इसके बाद भी हमारे एक-दो आयोजनों में ऊंचाहार आए थे। हास्य-व्यंग्य में जिस गरिमा को उन्होंने बनाए रखा, वह बेमिसाल है। आज वे भी हमारे बीच नहीं हैं, उनको मेरी विनम्र श्रंद्धांजलि।

इस आयोजन की प्रमुख विशेषताओं में डॉ. वसीम बरेलवी की शायरी और श्री सोम ठाकुर जी का काव्य पाठ रहे थे। मुझे आज भी याद है सोम जी ने जब इस आयोजन में अपने गीत ‘ये प्याला प्रेम का प्याला है’ का पाठ किया था तब श्रोता मदमस्त हो गए थे।

मुझे ऊंचाहार के लिए एक आयोजन निश्चित करने का प्रसंग याद आ रहा है। भोजपुरी अभिनेता और गायक (जो अभी राजनेता बन गए हैं) श्री मनोज तिवारी का कार्यक्रम निश्चित करना था। जैसा कि एनटीपीसी में होता है, इसके लिए मानव संसाधन, वित्त और शायद क्रय विभाग के सदस्यों को शामिल करते हुए एक कमेटी बनाई गई। सुल्तानपुर में रामलीला के मंच पर, श्री मनोज तिवारी का कार्यक्रम था, यह निश्चित हुआ कि वहाँ जाकर ही हम उनसे बात करेंगे।

इसमें कोई संदेह नहीं कि श्री मनोज तिवारी बहुत लोकप्रिय जन-गायक रहे हैं। यह निश्चित हुआ कि वे कार्यक्रम के बाद चुपचाप अपनी जीप में एक देहाती टाइप रेस्टोरेंट में आ जाएंगे और हम लोग वहीं उनसे मिलकर बात कर लेंगे। इस प्रकार हम लोग कुछ उसी अंदाज में उस रात मिले, जैसे फिल्मों में गैंग्स्टर मिलते हैं। फर्क इतना है कि हमारे हाथों में बंदूकों की जगह कागज़-कलम थे।
बाद में तिवारी जी ने यह भी बताया कि फिल्मों में जाने से पहले वे भी ओएनजीसी में हिंदी अनुवादक के रूप में कार्य करते थे। खैर यह कार्यक्रम भी अन्य कार्यक्रमों की तरह अत्यंत सफल रहा।

अंत में सोम ठाकुर जी की एक श्रेष्ठ रचना प्रस्तुत है, जिसमें बताया गया है कि अमर तो कवि-कलाकार ही होते हैं, क्योंकि वे हमारे दिलों पर राज करते हैं-

यूं दिये पर हर इक रात भारी रही, रोशनी के लिए जंग जारी रही
हम कि जो रात में भोर बोये रहे, सीप में मोतियों को संजोए रहे।


क्या करें हम समंदर के विस्तार का, जिसके पानी की हर बूंद खारी रही।


वक्त का जो हर इक पल भुनाते रहे, जो सदा जग-सुहाती सुनाते रहे,
वो हैं शामिल ज़हीनों की फेहरिस्त में, सरफिरों में हमारी शुमारी रही।


लोग थे जो ज़माने पे छाए रहे, जिनके घर सत्य भी सिर झुकाए रहे।
उनके पर्चम भले ही किलों पर रहे, पर दिलों पर हुक़ूमत हमारी रही।


वक्त के वो कदम चूमकर क्या करे, राजधानी में वो घूमकर क्या करे।
वो किसी शाह के घर मिलेगा नहीं, सोम की तो फक़ीरों से यारी रही।


फिलहाल इतना ही,
नमस्कार।

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मनवा तो सावन -सावन रहा!

आज फिर से अपने प्रिय कवियों में से एक, माननीय सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| अपने संस्थान में कवि सम्मेलनों के आयोजन के क्रम में आदरणीय सोम जी से अनेक बार भेंट हुई थी|

मुझे एक प्रसंग विशेष याद आ रहा है, जब सोम जी संचालन कर रहे थे, तब कवि सम्मेलन पहले खुले में हो रहा था, बारिश हो जाने के कारण उसको हॉल में शिफ्ट किया गया और यह कवि सम्मेलन सुबह चार बजे राष्ट्र गान के साथ सुबह तक चला| इस आयोजन की एक और विशेषता इसमें स्वर्गीय किशन सरोज जी द्वारा प्रस्तुत गीत भी थे| जैसे- ‘वो देखो कुहरे में, चन्दन वन डूब गया’ और सोम ठाकुर जी का गीत- ‘ये प्याला प्रेम का प्याला है, तू नाच के और नचाकर पी’|

मैंने अनेक बार सोम जी के राष्ट्रभक्ति और भाषा के सम्मान, स्वाभिमान से संबंधी गीत शेयर किए हैं, आज इस रूमानी गीत का आनंद लीजिए-

देह हुई फागुन तो क्या हुआ
रे मितवा
मनवा तो सावन -सावन रहा|

इतना विश्वास किया अपनों पर
चंद्रमा रखा हम ने सपनों पर
हमको जग की चित्तरसारी में
हर चेहरा दर्पण -दर्पण रहा|
रे मितवा
देह हुई फागुन तो क्या हुआ|


बस इतना ही धरम –करम भाया
अपनाया जो, जी भर अपनाया
हमको तो सदा प्रेम -मंदिर का
हर रजकन चंदन -चंदन रहा|
रे मितवा
देह हुई फागुन तो क्या हुआ|

कौन रखे याद इस कहानी को
कहाँ मिले शरण आग पानी को
गुँथी हुई बाँहों में मुक्ति मिली
बाकी सुख बंधन -बंधन रहा|
रे मितवा
देह हुई फागुन तो क्या हुआ|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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मनवा तो सावन -सावन रहा!

आज श्रेष्ठ कवि श्री सोम ठाकुर जी का एक साहित्यिक गीत शेयर कर रहा हूँ| इस गीत में महीनों के माध्यम से मौसम और मौसम के बहाने जीवन के विभिन्न पड़ावों का वर्णन बड़ी खूबसूरती से किया गया है|


लीजिए प्रस्तुत है यह प्यारा सा गीत-

देह हुई फागुन तो क्या हुआ
रे मितवा
मनवा तो सावन -सावन रहा|

इतना विश्वास किया अपनों पर
चंद्रमा रखा हम ने सपनों पर,
हमको जग की चित्तरसारी में
हर चेहरा दर्पण -दर्पण रहा|
रे मितवा
देह हुई फागुन तो क्या हुआ|


बस इतना ही धरम –करम भाया
अपनाया जो जीभर अपनाया,
हमको तो सदा प्रेम -मंदिर का
हर रजकण चंदन -चंदन रहा|

रे मितवा
देह हुई फागुन तो क्या हुआ|


कौन रखे याद इस कहानी को
कहाँ मिले शरण आग पानी को,
गुँथी हुई बाँहों में मुक्ति मिली
बाकी सुख बंधन -बंधन रहा|

रे मितवा
देह हुई फागुन तो क्या हुआ|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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धूप-भरे सूने दालान!

एक सुरीले गीतकार और भारतीय काव्य मंचों की शान श्री सोम ठाकुर जी का एक प्यारा सा गीत आज शेयर कर रहा हूँ| गीत का सौंदर्य और अभिव्यक्ति की दिव्यता स्वयं ही पाठक/श्रोता को सम्मोहित कर लेती है|


लीजिए प्रस्तुत है प्रतीक्षा का यह प्यारा सा गीत–


खिड़की पर आंख लगी,
देहरी पर कान।

धूप-भरे सूने दालान,
हल्दी के रूप भरे सूने दालान।


परदों के साथ-साथ उड़ता है-
चिड़ियों का खण्डित-सा छाया क्रम
झरे हुए पत्तों की खड़-खड़ में
उगता है कोई मनचाहा भ्रम
मंदिर के कलशों पर-
ठहर गई सूरज की कांपती थकान
धूप-भरे सूने दालान।


रोशनी चढ़ी सीढ़ी-सीढ़ी
डूबा मन
जीने के
मोड़ों को
घेरता अकेलापन|

ओ मेरे नंदन!
आंगन तक बढ़ आया
एक बियाबान।
धूप भरे सूने दालान।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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मरघट में पी खामोशी से, पनघट पर शोर मचाकर पी!

आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट की बारी है –

 

 

आस्था के बारे में एक प्रसंग याद आ रहा है, जो कहीं सुना था।

ये माना जाता है कि यदि आप सच्चे मन से किसी बात को मानते हैं, इस प्रसंग में यदि आप ईश्वर को पूरे मन से मानते हैं, तो वह आपको अवश्य मिल जाएंगे।

इस बीच कवि सोम ठाकुर जी के गीत ‘प्रेम का प्याला’ से कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं-

जीते जी तरना चाहे तो, पी ले गंगाजल के बदले,
मीरा ने टेरे श्याम पिया तो अर्थ हलाहल के बदले,
मरघट में पी खामोशी से, पनघट पर शोर मचाकर पी।

 

ये प्याला प्रेम का प्याला है, तू नाचके और नचाकर पी,
खुल खेलके पी, झुक झूमके पी, मत गैर से नज़र बचाकर पी।
ये प्याला प्रेम का प्याला है।

बहुत ही सुंदर गीत है ये, जितना अचानक याद आया, मैंने शेयर कर लिया। असल में यह आस्था और विश्वास का ही मामला है। बच्चे का विश्वास! वो जो मानता है, पूरी तरह मानता है, कोई ढोंग नहीं करता।

तो प्रसंग यह है कि एक पंडित जी रोज सुबह नदी में स्नान करने जाते, वे नदी किनारे अपने वस्त्र आदि रखकर नदी में स्नान करते। अक्सर एक बच्चा, जो गाय चराने आता था, उससे वे अपने सामान का ध्यान रखने को कहते थे और वो ऐसा करता भी था।

वह बच्चा उनको स्नान के दौरान प्रार्थना करते देखता, जिसमें वे अपने कंठ को अपनी उंगलियों के बीच हल्का सा दबा लेते थे। एक बार जब वे इसी प्रकार बच्चे से निगरानी के लिए बोलकर, नदी में जा रहे थे तब बच्चे ने पूछा पहले ये बताओ कि आप ये कंठ को क्यों दबाते हो। पंडित जी ने बोला हम भगवान की प्रार्थना करते हैं, दर्शन देने के लिए कहते हैं।

बच्चे ने पूछा कि क्या आपको भगवान दिखाई देते हैं, पंडित जी ने टालने के लिए बोल दिया कि ‘हां’।
इसके बाद बच्चा एक बार नदी में नहाने के लिए गया और उसने अपना कंठ दबाकर प्रभु से प्रार्थना की कि वे उसको दर्शन दें। कुछ देर तक दर्शन न होने पर वो बोला ‘आप जानते नहीं मैं कितना ज़िद्दी हूँ, मुझे दर्शन दो, नहीं तो मैं कंठ से हाथ नहीं हटाऊंगा!’

प्रभु ने सोचा यह पागल तो मर जाएगा, सो उन्होंने नदी किनारे भगवान श्रीकृष्ण के रूप में, प्रकट होकर कहा अब तो हाथ हटाओ देखो मैं आ गया, बच्चे ने कहा वहीं रुको, फिर पूछा, ‘आप कौन हो’ , उन्होंने कहा मैं वही ईश्वर हूँ, जिसको तुम बुला रहे थे।‘ बच्चा बोला, मैं नहीं मानता, उसने उनको रस्सी से पेड़ के साथ बांधकर कहा- ‘रुको, मैं अभी आता हू‘, वह भागकर पंडित जी को बुलाकर लाया, शुरू में तो पंडित जी को कुछ दिखाई नहीं दिया, लेकिन बाद में बच्चे की ज़िद के कारण, भगवान ने ढोंगी पंडित जी को भी दर्शन दिए, तब जाकर भगवान बंधन मुक्त हो पाए।

बस यही बात है आज की, प्रेम में ढोंग नहीं, पागलपन ज्यादा काम आता है।

नमस्कार।

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प्रेमा नदी – सोम ठाकुर

आज मैं एक बार फिर से अपने प्रिय कवियों में से एक माननीय श्री सोम ठाकुर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| यह एक अलग तरह की कविता है जो अपना संपूर्ण प्रभाव पाठक/श्रोता पर छोड़ती है| लीजिए इस कविता का आनंद लीजिए-

 

 

 

मैं कभी गिरता – संभलता हूँ
उछलता -डूब जाता हूँ,
तुम्हारी मधुबनी यादें लिए
प्रेमा नदी|

 

यह बड़ी जादूभरी, टोने चढ़ी है,
फूटती है सब्ज़ धरती से, मगर
नीले गगन के साथ होती है,
रगो में दौड़ती है सनसनी बोती हुई
मन को भिगोती हुई,
उमड़ती है अंधेरी आँधियो के साथ
उजली प्यास का मरुथल पिए, प्रेमा नदी|

 

भोर को सूर्य घड़ी में
खुशबुओं से मैं पिघलता हूँ,
उबालों को हटाते ग्लेशियर लादे हुए
हर वक़्त बहता हूँ,
रुपहली रात की चंद्रा-भंवर में
घूम जाता हूँ,
बहुत खामोश रहता हूँ
मगर वंशी बनाती है मुझे
अपनी छुअन के साथ,
हर अहसास को गुंजन किए
प्रेमा नदी|

 

यह सदानीरा पसारे हाथ
मेरे मुक्त आदिम निर्झरों को माँग लेती है,
कदंबों तक झुलाती है
निचुड़ती बिजलियाँ देकर
भरे बादल उठाती है,
बिछुड़ते दो किनारे को
हरे एकांत का सागर दिए
प्रेमा नदी|

 

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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