ओढ़ आए हम!

आज फिर से मैं हिन्दी के श्रेष्ठ गीतकार और श्रेष्ठ मंच संचालक श्री सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| सोम जी ने हिन्दी के अलावा ब्रज भाषा में भी अनेक सुंदर गीत, कवितओं की सौगात हमें दी है| वे प्रेम के कवि तो हैं ही इसके अलावा उन्होंने राष्ट्र प्रेम और राष्ट्रभाषा प्रेम को लेकर भी अनेक रचनाएं लिखी हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री सोम ठाकुर जी का यह सुंदर गीत –

ओढ़ आए हम
चाँद की किरणो – बुने
ठंडे रूपहले शाल

देह श्री कह ले
कि उष्णारागिनी हम
गुनगुनाहट आ गई
दहके गुलाबों तक
चितवनो की सीढ़ियाँ
उतरा चला आया अचानक
गूँजकर रतनार सा आकाश
लज्जा के नकाबों तक

छू गया लो, आँधियों का
वंशधन मन
फिर लपकती
बिजलियों के गाल
ये नये शाकुन्तलों के अंक, बोलो!
कौन — कब , किस मंच पर खेले?
जुड़ सकेंगे किस नदी के तीर पर फिर
कामरूपो के नये मेले?

अब कहाँ, किन
चोरजेबों में रखे हम
गुनाहों -काढ़े हुए रूमाल?
ओढ़ आए हम
चाँद की किरनो –बुने
ठंडे रूपहले शाल|

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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मंगल विलय!

एक बार फिर से आज मैं श्री सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ, सोम ठाकुर जी के बहुत से गीत मैंने पहले भी शेयर किए हैं| मूलतः वे प्रेम के गीतकार हैं और उनके प्रेम का दायरा इतना बड़ा है कि उसमें राष्ट्र प्रेम, भाषा प्रेम सभी शामिल हो जाते हैं और उन्होंने हर क्षेत्र में कुछ अमर गीत दिए हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है सोम ठाकुर जी का यह रूमानी गीत, जिसका निर्वाह सोम जी ने बहुत सुंदर तरीके से किया है-

इस निरभ्रा चाँदनी में
आज फिर गुँथ जाए तेरी छाँह, मेरी छाँह|

नयन – कोरों पर,
लटों के मुक्त छोरों पर
टूटती हैं नीम से छनती किरण
रुक गया हो रूप निर्झर पर, कि जैसे
अमरता का क्षण,
एक तरल उष्णता है —
जो कि राग — रागनाप ठंडे बदनो को खोलती हैं
वारुणी –संज्ञावती हैं,
आत्म –प्लावक मानसर में
आज फिर बुझ जाए तेरा दाह, मेरा दाह ।

जो कछारों में
न बोला नमस्कारों में
अर्थ वह इस प्राण का चंदन,
महकता है, पर नही करता
किसी अभिव्यक्ति का पूजन,
आत्मजा हर लहर मन की
कुछ अनाम ऊर्जामय लय तरंगों में थकूँ मैं,
स्रष्टि को दोहरा सकू मैं,
शब्द गर्वित जो नही वह
आज फिर चुक जाए तेरी चाह में, मेरी चाह ।


दूर के वन में
दिशाओं के समापन में
काँपता है एक सूनापन,
हर प्रहार स्वीकारता जाता
द्रगों में डूबने का प्रन
यह विमुक्ता देह मेरी ,
दो मुझे तुम रूप–क्षण का स्पर्श,
चेतन तक गलूँ मैं
और अनुक्षण जन्म लूँ मैं,

ओ निमग्ने !
एक मंगल–विलय तक मुड़ जाए, तेरी राह, मेरी राह।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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तुम रहे हो द्वीप जैसे!

आज एक बार फिर मैं अपने अत्यंत प्रिय गीतकार श्री सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| मुझे गर्व है कि मैंने अपने कई आयोजनों में सोम जी को आमंत्रित किया था और जी भरकर उनके मधुर गीतों और मंच संचालन का आनंद लिया था|

लीजिए आज प्रस्तुत है आदरणीय सोम ठाकुर जी का यह गीत –

तुम रहे हो द्वीप जैसे, मैं किनारे सा रहा,
पर हमारे बीच में है सिंधु लहराता हुआ|

शीशे काटे शब्द रहते हैं तुम्हारे होंठ पर
लाख चेहरे हैं मगर मेरी अकेली बात के
दिन सुनहले हैं तुम्हारे स्वप्न तक उड़ते हुए
पंख हैं नोंचे हुए मेरी अंधेरी रात के
,
सिर्फ़ मेरी बात में शाकुंतलों की गंध है
तुम रहे खामोश, मैं हर बात दोहराता हुआ
|

छेड़कर एकांत मेरा शक्ल कैसी ले रही है
लाल -पीली सब्ज़ यादों से तराशी कतरनें,
ला रही कैसी घुटन का ज्वर ये पुरवाइयाँ
तेज़ खट्टापन लिए हैं दोपहर की फिसलनें,
भीगता हूँ गर्म तेजाबी लहर में दृष्टि तक
वक्त गलता है तपी बौछार छहराता हुआ|

शोर कैसा है, न जिसको नाम मैं दे पा रहा
है अजब आकाश, ऋतुएं हो गई हैं अनमनी
झनझनाती हैं ज़ेहन मेरा लपकती बिजलियाँ
एक आँचल है मगर, बाँधे हुए संजीवनी
थरथराती भूमि है पाँवों-तले, पर शीश पर
टूटता आकाश है घनघोर घहराता हुआ
|

चाँदनी तुमने सुला दी विस्मरण की गोद में
बात हम कैसे रूपहली यादगारों की करें
एक दहशत खोजती रहती मुझे आठों प्रहर
किस लहकते रंग से गमगीन रांगोली भरे
तुम रहे हर एक सिहरन को विदा करते हुए
मैं दबे तूफान अपने पास ठहराता हुआ|

मैं न पढ़ पाया कभी सायं नियम की संहिता
मैं जिया कमज़ोरियों से आसुओं से, प्यार से
साथ मेरे चल रहा है काल का बहरा बधिक
चीरता है जो मुझे हर क्षण अदेखी धार से
देवता बनकर रहे तुम वेदना से बेख़बर
मैं लिए हूँ घाव पर हर घाव घहराता हुआ
|

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|                             ********

क्या करेंगे हम भजन होकर!

आज फिर से प्रस्तुत है मेरे अत्यंत प्रिय कवि और गीतकार आदरणीय सोम ठाकुर जी का एक गीत| सोम जी ने गीतों में अनेक प्रयोग किए हैं और अनेक प्रेम से सराबोर गीत तो लिखे ही हैं, वहीं राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रभाषा प्रेम के भी कुछ बहुत सुंदर गीत उन्होंने लिखे हैं| उनके अनेक गीत समय-समय पर याद आते रहते हैं|

लीजिए आज आदरणीय सोम ठाकुर जी का यह बहुत प्यारा सा प्रस्तुत है–


दूरियाँ हम से बहुत लिपटी
एक अलबेला नमन होकर
खुशबुओं से हम सदा भटके
दो गुलाबों की छुअन होकर|

एक आँचल हाथ को छूकर
गुम गया इन बंद गलियों में
मंत्र जैसा पढ़ गया कोई
चितवनी गीतांजलियों में
पर्वतों के पाँव उग आए
दीन -दुनिया का चलन होकर|

याद कर लेगा अकेलापन
उम्र से कुछ भूल हो जाना
कसमसाहट की नदी बहना
बिजलियों का फूल हो जाना
रात अगली रात से बोली
सेज की सूनी शिकन होकर
|

रख रही है जो मुझे जिंदा
आप ये कमज़ोरियाँ सहिये
नाम चाहे जो मुझे दे दें
देवता हर बार मत कहिये
गीत है इंसान की पूजा
क्या करेंगे हम भजन होकर|

यह बड़ी नमकीन मिट्टी है
व्यर्थ है मीठी किरण बोना
सीख लेना सोम से अपने
शहर में ही अजनबी होना
वह समय की प्यास तक पहुँचा
बस अमृत का आचमन होकर|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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उजाले की खुशबू

एक बार फिर से मैं कवि सम्मेलनों में अपने गीतों के माध्यम से श्रोताओं के मन में अपनी अमिट छाप बनाने वाले सृजनधर्मी गीतकार श्री सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| सोम जी ने अपने गीतों में अभिव्यक्ति की बहुत मंज़िलें पार की हैं, सरल भाषा में अक्सर बहुत गहरी बात वे अपने गीतों में करते हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री सोम ठाकुर जी का यह श्रेष्ठ गीत जिसमें उन्होंने बहुत सुंदर भावाभिव्यक्ति की है–

झरे हुए वर्षो को
उगने वाले कल को
हमने दी खुले उजाले की खुशबू
हर कोलाहल को|

सुना किए सहमे खामोश प्रहर
गाथाएँ ठोस अंधेरे की
यह कैसी हवा चली! और बढ़ी
सीमाएं खूनी घेरे की
गहराती गई मृत्युगंधा हर झील यहाँ
प्रश्न उठा -कौन सूर्य सोखेगा
ज़हर -घुले जल को?

अंतहीन कड़ुआया बहरापन
भीड़ों को चीरता गया
एक ध्वंस -धर्मा अँधा मौसम
अंकुर के पास आ गया
होंठों पर हरे शब्द रखकर हम
जिया किए केवल भीतर के मरुथल को

पलक उठाते दिन का नया उदय है
तट पर बेहोश हुई शाम यह नहीं
है यह आरंभ नई मंज़िल का
काँपता विराम यह नही
अब स्वयं ग़ुजरकर हम सुलगते वनों से
पार करेंगे पाँवों -लिपटे दलदल को|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

आ गए किस द्वीप में हम!

एक बार फिर से मैं आज माननीय सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| सोम जी ने जहां राष्ट्रप्रेम, राजभाषा प्रेम और रूमानी प्रेम के एक से एक बढ़कर गीत लिखे हैं वहीं मानवीय सरोकारों को भी बड़ी सशक्त अभिव्यक्ति दी है|

लीजिए आज प्रस्तुत है माननीय सोम ठाकुर जी का, आज के समय को अपने अलग अंदाज़ में वर्णित करता यह गीत –

आ गये किस द्वीप में हम
देह पत्थर हो गई
सर्पगंधा एक डाकिन
साथ में फिरने लगी|

नाम लिख आए जहाँ हम
गुनगुनाती खुशबुओं से
ढह गये वे बुर्ज
कुछ टूटे कंगूरे रह गए
बढ़ चले हैं पाँव
पीछे को बुलाती सीढ़ियों पर
हो गये पूरे कथानक
हम अधूरे रह गए
|

प्रश्न-वृक्षों की उठी शाखें हुईं नंगी
कि गुमसूँ पर्वतों पर
बर्फ की ताज़ा रुई गिरने लगी
पड़ गए जल में रवे
लहरें थमी हैं
घूमकर लौटीं नहीं
वे चुंबनो कीली हुई ज़िंदा हवाएँ
शिला खिसका कर मुहाने से
बुलाने लग गई हैं
वक्ष तक जल से भरी
अंधी गुफाएँ
|

जिस सतह पर डूबकर
उछली नही हंसापरी वह
सोनरंगी मरी मछली
काँपकर तिरने लगी|

अब नहीं
वे चुंबको- गुज़री हुई सह यात्राएँ
सूर्य -मंत्रों को मिला
कोलाहलों का साथ
कमल पत्ते पर रखी मणि को
उठाने लग गये हैं
जंगली एहसास के दो हाथ
|

मारती है रक्त के छींटे
लिए टूटे हुए परमाणु – क्रम जो
वह घटा
हेमंत के आकाश में
घिरने लगी
सर्पगंधा एक डाकिन
साथ में फिरने लगी
|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********


मन जाने क्या से क्या हो गया!

एक बार फिर से आज मैं हिन्दी के प्रमुख कवि एवं गीतकार, काव्य मंचों पर अपने मधुर गीतों के माध्यम से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करने वाले आदरणीय सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जो मुझे अत्यंत प्रिय रहा है| शायद इस गीत का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| सोम जी ने राष्ट्र प्रेम, भाषा प्रेम के गीत भी लिखे हैं और प्रेम के कवि तो वे हैं ही| आज मैं उनका एक श्रेष्ठ रूमानी गीत शेयर कर रहा हूँ|

लीजिए आज प्रस्तुत है आदरणीय सोम ठाकुर जी का यह गीत-

रूप तुम्हारा मन में कस्तूरी बो गया,
मन जाने क्या से क्या हो गया !

लोहे से गुथी हुई जंग लगी साँसों में
फिर आदिम जंगल उग आये,
माथे से टकराकर उछली यह चाँदनी
धमनियों – शिराओं में डूबे – उतराए,
गाँठ -पुरे जालों से
उड़कर फिर मनपांखी
पहला तिनका
नंगी शांख पर संजो गया .
मन जाने क्या से क्या हो गया|

एक पर्त झन्नाहट की फैली
अंग अंग चिपक गयी नज़रें ,
एक पोर भर चेहरा छूकर यह तर्जनी
ले आई आदमकद खबरें ,
तकिये पर टांक कर गुलाबों के संस्मरण
चाँदनी – बिंधा बादल
कंधे पर सो गया .
मन जाने क्या से क्या हो गया|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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भाषा वंदना

आदरणीय सोम ठाकुर जी का बहुत प्रसिद्ध गीत है जो हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी की वंदना का गीत है| हिन्दी की समृद्ध परंपरा और शक्ति का जो वर्णन इस गीत में बहुत सहज भाव से कर दिया गया है, उसका वर्णन करने में विद्वानों को काफी लंबा विवरण देना पड़ता है|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री सोम ठाकुर जी का यह भाषा वंदना का अमर गीत –

करते है तन मन से वंदन जन -गण -मन की अभिलाषा का
अभिनंदन अपनी संस्कृति का, आराधान अपनी भाषा का

यह अपनी शक्ति – सर्जना के
माथे की है चंदन रोली
माँ के आँचल की छाया में
हमने जो सीखी है बोली

यह अपनी बँधी हुई अंजूरी, यह अपने महके शब्द सुमन
यह पूजन अपनी संस्कृति का, यह अर्चन अपनी भाषा का

अपने रत्नाकर के रहते
किसकी धारा के बीच बहें
हम इतने निर्धन नहीं कि
वाणी से औरों के ऋणी रहें

इसमे प्रतिबिंबित है अतीत, आकर ले रहा वर्तमान
यह दर्शन अपनी संस्कृति का, यह दर्पण अपनी भाषा का

यह उँचाई है तुलसी की
यह सूर – सिंध की गहराई
टंकार चंदबरदाई की
यह विद्यापति की पुरवाई

जयशंकर का जयकार, निराला का यह अपराजय ओज
यह गर्जन अपनी संस्कृति का, यह गुंजन अपनी भाषा का|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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पत्र तुम्हारे नाम


आज एक बार फिर से हिन्दी के प्रतिष्ठित, लोकप्रिय और सुरीले गीतकार श्री सोम ठाकुर जी एक और गीत शेयर कर रहा हूँ| आदरणीय सोम जी ने देश प्रेम, भाषा प्रेम और शुद्ध प्रेम के भी अनूठे गीत लिखे हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है आदरणीय सोम ठाकुर जी का यह प्रेम से परिपूर्ण गीत-

White and Green Floral Wall Decor


सुर्ख सुबह
चम्पई दुपहरी
रंग रंग से लिख जाता मन
पत्र तुम्हारे नाम|

बाहों के ख़ालीपन पर यह
बढ़ता हुआ दवाब
चहरे पर थकान के जाले
बुनता हुआ तनाव
बढ़ने लगे देह से लिपटी
यादों के आयाम|

घबराहट भरती चुप्पी ने
नाप लिया है दिन
पत्थर -पत्थर हुए जा रहे
हाथ कटे पलछिन
मिटते नहीं मिटाए अब तो
होंठो लगे विराम|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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अंग-अंग डोल गई रंग भरी बातें!

आज एक बार फिर से मधुर और सृजनशील गीतकार सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| सोम जी ने जहां राष्ट्र और राष्ट्रभाषा को लेकर बहुत प्रेरक गीत लिखे हैं, वहीं उन्होंने बहुत नाजुक मनोभावों और मनः स्थितियों का चित्रण भी अपने गीतों में बड़ी कुशलता से किया है|

लीजिए आज प्रस्तुत है, माननीय सोम ठाकुर जी का यह गीत-



महुए – से महके दिन
मेंहदी – सी रातें
केसर – सी घोल गई
रंग भरी बातें

सुनी जो मिली कहीं खेतों की राहें
सरसों की पगडंडी , आमों कि छाहें
सुने जो मिले कहीं मुड़ते गलियारे
लहरों के चित्र -लिखे रेतिया किनारे
ठहर गया मन , ठहरे पाँव भी अजाने
अंग-अंग डोल गई रंग भरी बातें|

गीत रचे धरती, आकाश गुनगुनाए
पूरब ने गाए, पश्चिम ने दुहराए
शाकुन्तल स्वप्न बहे गीत के बहाने
कानों ने जाने, प्राणों ने पहचाने
वंशी के संग -संग जाने कब -कैसे
कंगन को तोल गई रंग भरी बातें|

उड़ती हैं चाहों की अनगिन कंदीलें

नैनों के हंस, रूप – रंगों की झीलें
हार गये बंद द्वार, गंध पवन जीती
हो गई ये बीती घड़ियाँ अनबीती
मन -मन को बाँध गई लौटती विदायें
गाँठ -गाँठ खोल गई रंग भरी बातें
|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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