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बर्बादियों का जश्न मनाता चला गया !

आज एक बार फिर से रफी साहब का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| यह गीत उन्होंने देव साहब के लिए गाया था| रफी साहब के गाये गीतों में बहुत विविधता देखने को मिलती है, इतनी कि बहुत सारे गीतों को सुनकर ही हम अंदाज़ लगा सकते हैं कि वह गीत रफी साहब ने किस कलाकार के लिए गाया है|

हाँ तो यह गीत साहिर लुधियानवी साहब ने लिखा है और फिल्म- ‘हम दोनों’ के लिए देव आनंद जी पर फिल्माया गया है, इसके संगीतकार जयदेव जी थे| देव आनंद साहब मस्ती भरी भूमिकाओं के लिए जाने जाते थे|

 

 

लीजिए इस मस्ती भरे गीत के बोल पढ़कर इस गीत के प्रभाव को याद करते हैं-

 

मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया, 
हर फ़िक्र को धुएँ में उड़ाता चला गया|

 

बर्बादियों का सोग मनाना फ़िज़ूल था,
बर्बादियों का जश्न मनाता चला गया|

 

जो मिल गया उसी को मुक़द्दर समझ लिया,
जो खो गया मैं उस को भुलाता चला गया|

 

ग़म और ख़ुशी में फ़र्क़ न महसूस हो जहाँ,
मैं दिल को उस मक़ाम पे लाता चला गया|

 

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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कोई सपनों के दीप जलाए!

आज फिल्म- ‘आनंद’  के लिए मेरे प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक गीत याद आ रहा है, जो आज तक लोगों की ज़ुबान पर है। उस समय राजेश खन्ना जी सुपर स्टार थे और अमिताभ बच्चन के कैरियर को आगे बढ़ाने में इस फिल्म की महत्वपूर्ण भूमिका थी।

योगेश जी के लिखे इस गीत को मुकेश जी ने सलिल चौधरी जी के संगीत निर्देशन में गाया था। आइए इसके बोलों के बहाने मुकेश जी के गाये इस अमर गीत को याद कर लेते हैं-

 

 

कहीं दूर जब दिन ढल जाए,
साँझ की दुल्हन बदन चुराए
चुपके से आए,
मेरे ख़यालों के आँगन में,
कोई सपनों के दीप जलाए।

 

कहीं दूर जब दिन ढल जाए,
साँझ की दुल्हन बदन चुराए
चुपके से आए।
कभी यूँ हीं, जब हुईं, बोझल साँसें,
भर आई बैठे बैठे, जब यूँ ही आँखें,
तभी मचल के, प्यार से चल के,
छुए कोई मुझे पर नज़र न आए, नज़र न आए।

 

कहीं तो ये, दिल कभी, मिल नहीं पाते,
कहीं से निकल आए, जनमों के नाते।
घनी थी उलझन, बैरी अपना मन,
अपना ही होके सहे दर्द पराये।
दिल जाने, मेरे सारे, भेद ये गहरे,
खो गए कैसे मेरे, सपने सुनहरे,
ये मेरे सपने, यही तो हैं अपने,
मुझसे जुदा न होंगे इनके ये साये, इनके ये साये।

 

कहीं दूर जब दिन ढल जाए,
साँझ की दुल्हन बदन चुराए,
चुपके से आए।

 

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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