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धूप-भरे सूने दालान!

एक सुरीले गीतकार और भारतीय काव्य मंचों की शान श्री सोम ठाकुर जी का एक प्यारा सा गीत आज शेयर कर रहा हूँ| गीत का सौंदर्य और अभिव्यक्ति की दिव्यता स्वयं ही पाठक/श्रोता को सम्मोहित कर लेती है|


लीजिए प्रस्तुत है प्रतीक्षा का यह प्यारा सा गीत–


खिड़की पर आंख लगी,
देहरी पर कान।

धूप-भरे सूने दालान,
हल्दी के रूप भरे सूने दालान।


परदों के साथ-साथ उड़ता है-
चिड़ियों का खण्डित-सा छाया क्रम
झरे हुए पत्तों की खड़-खड़ में
उगता है कोई मनचाहा भ्रम
मंदिर के कलशों पर-
ठहर गई सूरज की कांपती थकान
धूप-भरे सूने दालान।


रोशनी चढ़ी सीढ़ी-सीढ़ी
डूबा मन
जीने के
मोड़ों को
घेरता अकेलापन|

ओ मेरे नंदन!
आंगन तक बढ़ आया
एक बियाबान।
धूप भरे सूने दालान।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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मिला नहीं कोई भी ऐसा, जिससे अपनी पीर कहूं मैं!

आज फिर से मैं अपने एक अत्यंत प्रिय गीत कवि स्व. भारत भूषण जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। कविता, गीत आदि स्वयं अपनी बात कहते हैं और जितना ज्यादा प्रभावी रूप से कहते हैं, वही उसकी सफलता की पहचान है। लीजिए आज के लिए स्व. भारत भूषण जी का यह गीत आपको समर्पित है-

 

जिस पल तेरी याद सताए, आधी रात नींद जग जाये,
ओ पाहन! इतना बतला दे, उस पल किसकी बाहँ गहूँ मैं।
अपने अपने चाँद भुजाओं,
में भर भर कर दुनिया सोये।
सारी सारी रात अकेला,
मैं रोऊँ या शबनम रोये।
करवट में दहकें अंगारे, नभ से चंदा ताना मारे,
प्यासे अरमानों को मन में दाबे कैसे मौन रहूँ मैं।

 

गाऊँ कैसा गीत कि जिससे,
तेरा पत्थर मन पिघलाऊँ,
जाऊँ किसके द्वार जहाँ ये,
अपना दुखिया मन बहलाऊँ।
गली गली डोलूँ बौराया, बैरिन हुई स्वयं की छाया,
मिला नहीं कोई भी ऐसा, जिससे अपनी पीर कहूं मैं।

 

टूट गया जिससे मन दर्पण,
किस रूपा की नजर लगी है।
घर घर में खिल रही चाँदनी,
मेरे आँगन धूप जगी है।
सुधियाँ नागन सी लिपटी हैं, आँसू आँसू में सिमटी हैं।
छोटे से जीवन में कितना, दर्द-दाह अब और सहूँ मैं।

 

फटा पड़ रहा है मन मेरा,
पिघली आग बही काया में।
अब न जिया जाता निर्मोही,
गम की जलन भरी छाया में।
बिजली ने ज्यों फूल छुआ है, ऐसा मेरा हृदय हुआ है।
पता नहीं क्या क्या कहता हूँ, अपने बस में आज न हूँ मैं।

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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