ये चोट भी नई है अभी!

कुछ तो नाज़ुक मिज़ाज हैं हम भी,
और ये चोट भी नई है अभी|

नासिर काज़मी

शहर की भाषा धुली हुई!

कुछ बूढ़े मेरे गांव के संजीदा हो गये,
फेंकी जो मैंने शहर की भाषा धुली हुई|

सूर्यभानु गुप्त

नाज़ुक सा फ़साना है!

आँखों में नमी सी है चुप चुप से वो बैठे हैं,
नाज़ुक सी निगाहों में नाज़ुक सा फ़साना है|

जिगर मुरादाबादी