हमें याद न आए खुद भी!

कितने ग़म थे कि ज़माने से छुपा रक्खे थे,
इस तरह से कि हमें याद न आए खुद भी|

अहमद फ़राज़

आँसू नज़र न आएगा!

तुम्हें ग़मों का समझना अगर न आएगा,
तो मेरी आँख में आँसू नज़र न आएगा|

वसीम बरेलवी

बरा-ए-मेहरबानी दे गया!

उससे मैं कुछ पा सकूँ ऐसी कहाँ उम्मीद थी,
ग़म भी वो शायद बरा-ए-मेहरबानी दे गया|

जावेद अख़्तर

बहुत तेज़ क़दम आते हैं !

कोई लश्कर है के बढ़ते हुए ग़म आते हैं |
शाम के साये बहुत तेज़ क़दम आते हैं ||

बशीर बद्र

सदमात बरतता हूँ !

कुछ और बरतना तो आता नहीं शे’रों में,
सदमात बरतता था, सदमात बरतता हूँ ।

राजेश रेड्डी

कोई बद-दुआ लगे है मुझे!

हर एक रूह में एक ग़म छुपा लगे है मुझे,
ये ज़िन्दगी तो कोई बद-दुआ लगे है मुझे|

जां निसार अख़्तर

लौटे हैं हर इक दुकाँ से हम!

ग़म बिक रहे थे मेले में ख़ुशियों के नाम पर,
मायूस होक लौटे हैं हर इक दुकाँ से हम|

राजेश रेड्डी

ज़िन्दगी को मोहब्बत बना दें!

हर एक मोड़ पर हम ग़मों को सज़ा दें,
चलो ज़िन्दगी को मोहब्बत बना दें|

सुदर्शन फ़ाकिर

मेरी मुस्कानों के नीचे—

मेरी मुस्कानों के नीचे,
ग़म के खज़ाने गड़े हुए हैं|

राजेश रेड्डी