छुप गया अपने ग़मों का हाल भी!

उसकी सुख़न-तराज़ियाँ मेरे लिए भी ढाल थीं,
उसकी हँसी में छुप गया अपने ग़मों का हाल भी|

परवीन शाकिर

दिल में यूँ रोज़ इंक़लाब आए!

न गई तेरे ग़म की सरदारी,
दिल में यूँ रोज़ इंक़लाब आए|

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

हमें याद न आए खुद भी!

कितने ग़म थे कि ज़माने से छुपा रक्खे थे,
इस तरह से कि हमें याद न आए खुद भी|

अहमद फ़राज़

आँसू नज़र न आएगा!

तुम्हें ग़मों का समझना अगर न आएगा,
तो मेरी आँख में आँसू नज़र न आएगा|

वसीम बरेलवी

बरा-ए-मेहरबानी दे गया!

उससे मैं कुछ पा सकूँ ऐसी कहाँ उम्मीद थी,
ग़म भी वो शायद बरा-ए-मेहरबानी दे गया|

जावेद अख़्तर

बहुत तेज़ क़दम आते हैं !

कोई लश्कर है के बढ़ते हुए ग़म आते हैं |
शाम के साये बहुत तेज़ क़दम आते हैं ||

बशीर बद्र

सदमात बरतता हूँ !

कुछ और बरतना तो आता नहीं शे’रों में,
सदमात बरतता था, सदमात बरतता हूँ ।

राजेश रेड्डी

कोई बद-दुआ लगे है मुझे!

हर एक रूह में एक ग़म छुपा लगे है मुझे,
ये ज़िन्दगी तो कोई बद-दुआ लगे है मुझे|

जां निसार अख़्तर

लौटे हैं हर इक दुकाँ से हम!

ग़म बिक रहे थे मेले में ख़ुशियों के नाम पर,
मायूस होक लौटे हैं हर इक दुकाँ से हम|

राजेश रेड्डी