बाज़ारों में ख़ामोशी पहचाने कौन!

मुँह की बात सुने हर कोई दिल के दर्द को जाने कौन,
आवाज़ों के बाज़ारों में ख़ामोशी पहचाने कौन|

निदा फ़ाज़ली

आहटें, घबराहटें, परछाइयां !

क्या यही होती है शाम-ए-इंतिज़ार,
आहटें, घबराहटें, परछाइयाँ|

कैफ़ भोपाली