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भारतीय दर्शन और हिन्दू धर्म

बहुत पहले कहीं पढ़ा था कि विभिन्न धर्मों का अध्ययन कर रहे एक विदेशी विद्वान से जब पूछा गया कि विभिन्न धर्मों के अपने अध्ययन के आधार पर वे क्या कहना चाहेंगे! इस पर उसने कहा था कि आम आदमी के लिए सबसे आसान है मुस्लिम धर्म- पाँच टाइम नमाज पढ़ो और कोई गलती हुई हो तो उसके लिए अल्लाह से माफी मांग लो| इसके बाद उसने कहा कि सबसे से अधिक व्यापक है हिन्दू दर्शन, इसे अंग्रेजी के ‘रिलीजन’ के दायरे में बांधना संभव नहीं है| ये जीवन दर्शन है| कोई हिन्दू धर्म का अध्ययन संपूर्णता से करना चाहता है तो उसके लिए एक जन्म पर्याप्त नहीं है|

 

 

चिंतन की उदारता के मामले में हिन्दू संस्कृति का कोई मुक़ाबला नहीं है| भारतीय दर्शन के संबंध में विश्व धर्म संसद में गए विवेकानंद जी का उदाहरण हमें गर्वित करता है| अब उनका ज़िक्र आया है तो उनके जीवन से जुड़ा एक प्रसंग याद आ रहा है| विदेश जाने के लिए राजस्थान में खेतड़ी के महाराज ने विवेकानंद जी की सहायता की थी| उसी समय की बात है, विवेकानंद जी राजा के महल में गए, तो मालूम हुआ कि वहाँ एक गणिका नृत्य कर रही थी| उसके गीत की ध्वनि सुनकर विवेकानंद जी द्वार पर ही ठिठक गए| उनका संकोच समझकर गणिका ने अपना गीत बदलकर यह भजन गाया-

प्रभुजी मेरे अवगुण चित न धरो,
एक लोहा पूजा में राखत, एक घर वधिक परो,
यह दुविधा पारस नहीं मानत, कंचन करत खरौ|

यह सुनकर विवेकानन्द जी को अपनी भूल का एहसास हुआ, वे भीतर गए और उस गणिका के चरणों में गिरकर बोले- ‘माँ मुझे क्षमा कर दो, मुझे यह भेद नहीं करना चाहिए था’| यह प्रसंग खेतड़ी के राजा के महल में लिखा हुआ है| हाँ जी,यह है भारतीय संस्कृति और हिन्दू धर्म की विशेषता| यहाँ मन की पवित्रता सबसे बड़ी आवश्यकता है और कोई भी किसी से भी सीख ले सकता है|

मुझे बहुत पहले की एक घटना याद आ रही है, दिल्ली में किसी प्रकाशक ने एक पाठ्य पुस्तक में पैगंबर मुहम्मद साहब की तस्वीर छाप दी थी, तब उसकी प्रेस पर हमला हुआ था, आग लगा दी गई थी| उन लोगों का कहना था कि इंसानी हाथों से पैगंबर की तस्वीर कैसे बनाई जा सकती है! हिन्दू धर्म में कलाकार अपनी कल्पना और प्रतिभा द्वारा जो सुंदर से सुंदर चित्र अथवा मूर्ति बना देता है, उसे लोग ईश्वर का चित्र अथवा मूर्ति मान लेते हैं|

हिन्दू धर्म जिसे कहते हैं, वह कोई उपासना पद्यति मात्र नहीं है जिसका प्रचार किया जाए, लोगों को इसमें आने के लिए प्रेरित या मजबूर किया जाए| देश में बहुत जगहों पर तो गरीबों, आदिवासियों को अनाज आदि देकर कहा जाता है कि देखो तुम्हारा भगवान तुम्हें खाना नहीं देता, हमारा ईश्वर देता है, इसलिए हमारे धर्म में शामिल हो जाओ| इसलिए ज़्यादातर इसमें आस्था और लालच का अंतर है|

बहुत से ऐसे साधु और प्रवचन करने वाले हैं, जो अगर गलत आचरण करते पाए गए हैं तो उनको जेल जाना पड़ा है, भले उनके कितने भी शिष्य बने हों| जबकि अन्य धर्मों के मामले में ‘नन’ आदि पर अन्याय होने पर, उनकी ही ज़ुबान बंद कर दी जाती है|
हिन्दू धर्म में, प्रारंभ से ही चर्चा और शास्त्रार्थ को बढ़ावा दिया जाता रहा है| यहाँ लोग आँख मूंदकर किसी के पीछे नहीं जाते, अगर ऐसा हुआ और बाद में मालूम हुआ कि यह गलत मार्ग है तो लोग उसको छोड़ देते हैं|

हमारी पौराणिक कथाओं में ऐसे अनेक प्रसंग मिलते हैं कि त्रिदेव से आशीर्वाद पाकर आसुरी प्रवृत्ति के लोग अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करते हैं| ऐसे में हमारे त्रिदेव जो आवश्यक होता है वह कदम उठाते हैं| यह स्पष्ट है कि जो गलत आचरण कर रहा है, जो धर्म विरुद्ध है, उसको हराने के लिए जो भी आवश्यक हो किया जा सकता है|

एक उदाहरण याद आ रहा है| असुर राज जलंधर, जो शिवांश था, वह अपनी आसुरी शक्ति से त्रिलोक विजयी हो जाता है, उसकी पतिव्रता पत्नी – वृंदा पूजा करती है, जिसमें उसके शामिल हो जाने के बाद उसका अंत संभव नहीं होता, ऐसे में उसकी पूजा को असफल करना मानवता की रक्षा के लिए आवश्यक था| भगवान नारायण (विष्णु) ऐसे में जलंधर का रूप धरकर इस पूजा को असफल कराते हैं, इसके लिए उनको वृंदा का श्राप भी झेलना पड़ता है| लेकिन मानवता की रक्षा के लिए वे यह काम करते हैं| वृंदा को आज भी हरि मंदिर में ‘तुलसी’ के रूप में पूजा जाता है|

इसी प्रकार मानवता की रक्षा के लिए विषपान करने वाले महादेव का उदाहरण और कहाँ मिलेगा|

बस इतना ही कहना चाहूँगा कि हिन्दू धर्म की व्यापकता किनारे पर बैठकर नहीं समझी जा सकती, हाँ कुछ सतही बुद्धिजीवी जैसे आतंकवादियों के मानवाधिकारों की वकालत करते हैं, वैसे ही धर्म विरुद्ध आचरण करने वालों के पक्ष में दलील देते रहते हैं| यह स्पष्ट है कि दशानन रावण की विद्वत्ता अथवा किसी का वृहद ज्ञान उस समय किसी काम का नहीं रहता, जब उसका आचरण धर्म विरुद्ध होता है|

बातें बहुत सारी हैं, एक और प्रसंग याद आ रहा है, अपने भाई सुग्रीव को अनेक प्रकार से सताने वाले बाली को राम मारते हैं, तब वह पूछता है कि ऐसा क्या है कि मैं आपका वैरी हो गया और सुग्रीव आपका मित्र है| इस पर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम कहते हैं-

अनुज वधु भगिनी सुत नारी। सुनु सठ कन्या सम ए चारी।
इन्हहिं कुदृष्टि बिलोकइ जोई। ताहि बधें कछु पाप न होई।।

बातें बहुत हैं कहने के लिए, हिन्दू धर्म के बारे में लोग अक्सर बिना ज्ञान के टिप्पणी करना अपना धर्म समझते हैं, बल्कि शायद ऐसा करना ही सैक्युलर होने की पहचान माना जाता है| इसलिए मन हुआ कि कुछ बात इस विषय में कर ली जाए|

एक दो बातें और याद आ रही हैं, वो भी कह दूँ, पता नहीं फिर कब ऐसे विषय पर बात करने का मन होगा| हिन्दू धर्म के साथ रचनात्मकता भी कैसी दिव्य जुड़ी है| मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ की तुलसीदास और सूरदास जी जैसा प्रतिभाशाली कवि, पूरी दुनिया में नहीं हुआ है| खास तौर से धार्मिक आख्यान पर आधारित महाकाव्य रचने के लिए, जो रचनाएँ श्रद्धालु पाठकों के लिए अमृत के समान हैं| विशेष रूप से मेरे जैसे लोगों के लिए, जिनके लिए वेद-पुराण आदि का अध्ययन करना संभव नहीं है| आपको गाँव-देहात में ऐसे अनपढ़ लोग मिल जाएंगे जिनको तुलसीदास जी के रामचरितमानस की चौपाइयाँ कंठस्थ हैं| मुझे मालूम है कि कई धर्मों के प्रचार के लिए लोगों को अत्यधिक आकर्षक राशियों का प्रस्ताव किया गया कि वे ‘मानस’ जैसा ग्रंथ लिख दें, परंतु ऐसी रचना केवल गहन आस्था और अटूट श्रद्धा द्वारा ही संभव है|

जहां मानस के प्रसंग, जनसाधारण को सामान्य भाषा में हमारे ग्रन्थों के सार से परिचित कराते हैं, हनुमान चालीसा भी लोगों को कंठस्थ है, जो प्रभु के अनन्य भक्त हनुमान जी का गुणगान करती है, वहीं श्रीकृष्ण जी द्वारा अर्जुन के माध्यम से दुनिया को दिया गया गीता का संदेश ऐसा है जिसके एक-एक श्लोक पर विद्वान लोग, कई दिन तक व्याख्यान देते हैं, अनेक प्रसिद्ध विद्वानों ने इनकी व्याख्याएँ लिखी हैं| पूरी दुनिया आज गीता, रामायण के संदेश से लाभान्वित हो रही है|

लेकिन अपने देश में तो यही है कि जो हिन्दू धर्म की बुराई करे वह सेक्युलर और जो आतंकवादियों के मानवाधिकारों की वकालत करे, वही प्रगतिशील|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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राष्ट्रीयता और राष्ट्रद्रोह

मैं इन दिनों लंदन प्रवास में हूँ और यहाँ की वर्तमान और पिछले वर्ष की यात्राओं के अनुभव इन दिनों शेयर कर रहा हूँ। ये अनुभव मैं आगे भी शेयर करता रहूंगा।

इस बीच एक और विषय पर बात करने का मन है, अभी ‘राष्ट्र, राष्ट्रीयता और राष्ट्रद्रोह’ विषय पर चर्चा चल रही थी, इस विषय में मैंने भी अपने विचार रखे, आज अलग से इससे जुड़े विषय पर अपनी सम्मति देने का मन है।

 

 

हमने पिछले कुछ वर्षों में ऐसी गतिविधियां देखी हैं, जिनको राष्ट्रद्रोही कहने में कम से कम मुझे तो कोई संदेह नहीं है। मैं  जेएनयू में हुई गतिविधियों का उल्लेख कर रहा हूँ, जिनमें हमारे सैनिकों के शहीद होने पर खुशी मनाना, बुरहान बानी को फांसी का विरोध और इस प्रकार के नारे लगाया जाना शामिल है- ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा अल्लाह, इंशा अल्लाह’। अभी कश्मीर के संबंध में सरकार द्वारा लिए गए ऐतिहासिक कदम के बाद ‘जेएनयू’ फैक्ट्री से ही निकली एक कश्मीरी युवती ‘शेहला रशीद’  द्वारा ट्वीट करके, झूठी अफवाह फैलाया जाना भी इसका उदाहरण है कि यह प्रतिष्ठित संस्थान आज राष्ट्रद्रोह का अड्डा बन गया है।

इस सबके पीछे देखा जाए तो लॉर्ड मैकाले द्वारा भारत को मानसिक रूप से गुलाम बनाए रखने के लिए चलाई गई शिक्षा पद्यति का बहुत बड़ा हाथ है। हमारी बहुत समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर रही है और लॉर्ड मैकाले का यही सिद्धांत था कि भारतीयों को अपने सांस्कृतिक मूल्यों से काट दो, उनके मन से राष्ट्र-गौरव निकाल दो, तब उनको गुलाम बनाए रखना आसान होगा और वे भौतिक रूप से आज़ाद हो जाएं तब भी वे मानसिक रूप से गुलाम बने रहेंगे, और इसके लिए अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था लानी होगी और तभी इस देश में शरीर से भारतीय लेकिन दिमाग से अंग्रेज पैदा होंगे और जब इस देश की यूनिवर्सिटी से निकलेंगे तो हमारे हित में काम करेंगे।

हम विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक हैं, हमें विश्व-गुरू का दर्जा प्राप्त था। मैक्समूलर जैसे अनेक विदेशी विद्वान भारतीय संस्कृति का लंबे समय तक अध्ययन करते रहे, फादर क़ामिल बुल्के जैसे विदेशी मानस मर्मज्ञ रहे।

हमारे राष्ट्रकवि श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी ने संस्कृति के चार अध्याय पुस्तक और कितना सुंदर साहित्य लिखा। उनका एक प्रसंग याद आ रहा है। दिनकर जी ने एम.ए. नहीं किया था, सो उनके मन में आया और उन्होंने एम.ए. के लिए फॉर्म भर दिया। उस समय बिहार विश्वविद्यालय के कुलपति भी विख्यात हिंदी साहित्यकार थे, मुझे उनका नाम अभी याद नहीं आ रहा, उन्होंने दिनकर जी को बुलाया और कहा- ये क्या कर रहे हो दिनकर, लोग आपकी पुस्तकें, कवितायें आदि कोर्स में पढ़ रहे हैं, उन पर शोध कर रहे हैं, तुम्हे क्या जरूरत है एम.ए. करने की!

मैं जिस तरफ संकेत करना चाहता हूँ वो ये हि कि हमारे यहाँ डिग्री वाले नहीं अध्यवसाय वाले विद्वान रहे हैं, भारत एक सांस्कृतिक रूप से समृद्ध देश रहा है। हमारे अनपढ़ कबीर को पूरी दुनिया पढ़कर समझने का प्रयास कर रही है। तुलसीदास जी कहाँ के पढ़े-लिखे थे, जिनकी चौपाइयां आज भी गांवों में अनपढ़ बुज़ुर्ग संदर्भ के लिए जब-तब दोहराते हैं।

एक लंबी संस्कृति रही है, पीढ़ी दर पीढ़ी ज्ञान को आगे बढाने की परंपरा रही है। एक भारतीय संत- स्वामी विवेकानंद जब विश्व धर्म संसद में खड़ा होकर बोलता है, तब उसका संबोधन-‘भाइयो और बहनो’ सबको अकस्मात चौंका देता है, जो तब तक ‘देवियो और सज्जनो’ ही सुनते आए थे, विश्व बंधुत्व की अवधारणा को मन से अपनाने वाले इस संत की वाणी को दुनिया मंत्रमुग्ध होकर सुनती है, यह कोई किस्सा-कहानी नहीं है!

लेकिन आज, मैकाले की सफलता इस बात में है कि हमारे डिग्रीधारी विद्वान इस पश्चिमी अवधारणा को स्वीकार करते हैं कि ‘राष्ट्र’ एक काल्पनिक इकाई है, एक कल्पना है, हम बस यह मान लेते हैं कि यह हमारा देश है।

हाँ यह भी सच है कि बहुत सी बातें विश्वास पर ही कायम हैं, वरना कोई किसी को अपना पिता अथवा संतान भी नहीं माने। सुना है कि ओशो रजनीश के व्याख्यान स्थल पर लिखा रहता था, ‘कृपया अपने जूते और दिमाग बाहर छोड़कर आएं।‘

आज के डिग्रीधारी विद्वानों के साथ दिक्कत यह है कि जो बात कोई बाहरी विद्वान कहता है उसे वे तुरंत मान लेते हैं, लेकिन जो उनको भारतीय परंपरा से मिलती है उसको वे मानने को तैयार नहीं होते और इसकी परिणति यहाँ तक होती है जैसा जेएनयू में देखने को मिला।

अंत में एक बात अवश्य जोड़ना चाहूंगा, जो लोग दूसरों को सुधारने का, अपने हिसाब से भारतीय बनाने का और जाति और धर्म के नाम पर अत्याचार का काम करते हैं वे भारतीयता के सबसे बड़े दुश्मन हैं।

ऐसे ही आज कुछ विचार मन में आए, मैं यहाँ किसी को संतुष्ट करने का प्रयास नहीं कर रहा हूँ, मैं कोई विदेशी लेखक नहीं हूँ इसलिए कुछ लोगों का तो मेरी बात से सहमत होना संभव ही नहीं है।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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