ख़्वाबों से आँखें नहीं फोड़ा करते!

जागने पर भी नहीं आँख से गिरतीं किर्चें,
इस तरह ख़्वाबों से आँखें नहीं फोड़ा करते|

गुलज़ार

अंगारे न देख!

राख़ कितनी राख़ है, चारों तरफ बिख़री हुई,
राख़ में चिनगारियाँ ही देख अंगारे न देख ।

दुष्यंत कुमार