फैल गई बात शनासाई की!

कू-ब-कू फैल गई बात शनासाई की,
उसने ख़ुशबू की तरह मेरी पज़ीराई की|

परवीन शाकिर

न पूरे शहर पर छाए तो कहना!

धुआँ जो कुछ घरों से उठ रहा है,
न पूरे शहर पर छाए तो कहना|

जावेद अख़्तर

तेरे हिज्र में तन्हा समझ बैठे थे हम!

रफ़्ता रफ़्ता इश्क़ मानूस-ए-जहाँ होता चला,
ख़ुद को तेरे हिज्र में तन्हा समझ बैठे थे हम|

फ़िराक़ गोरखपुरी

जो पहले से मुरझाई भी होती है!

बिखरती है वही अक्सर ख़िज़ाँ-परवर बहारों में,
चमन में जो कली पहले से मुरझाई भी होती है|

क़तील शिफ़ाई

बिखरने से न रोके कोई!

अक़्स-ए-ख़ुशबू हूँ, बिखरने से न रोके कोई,
और बिखर जाऊँ तो, मुझको न समेटे कोई|

परवीन शाकिर