हवा का पता न था!

पत्तों के टूटने की सदा घुट के रह गई,
जंगल में दूर-दूर, हवा का पता न था।

मुमताज़ राशिद

लहू अपना पिलाया होगा!

बानी-ए-जश्न-ए-बहारां ने ये सोचा भी नहीं,
किसने कांटों को लहू अपना पिलाया होगा|

कैफ़ी आज़मी

हम कि रूठी हुई रुत को भी मना लेते थे!

हम कि रूठी हुई रुत को भी मना लेते थे,
हम ने देखा ही न था मौसम-ए-हिज्राँ जाना|

अहमद फ़राज़