जो अश्क है आँखों में!

ये किसका तसव्वुर है ये किसका फ़साना है,
जो अश्क है आँखों में तस्बीह का दाना है|

जिगर मुरादाबादी

टूटे हुए पर बोलते हैं!

मेरी परवाज़ की सारी कहानी,
मेरे टूटे हुए पर बोलते हैं|

राजेश रेड्डी

पुराना खत खोला अनजाने में!

खुशबू जैसे लोग मिले अफ़साने में,
एक पुराना खत खोला अनजाने में|

गुलज़ार

वो फ़साना जो कभी–

सुन लिया कैसे ख़ुदा जाने ज़माने भर ने,
वो फ़साना जो कभी हमने सुनाया भी नहीं|

क़तील शिफ़ाई

ऐसी कहानी दे गया!

जाते जाते वो मुझे अच्छी निशानी दे गया,
उम्र भर दोहराऊँगा ऐसी कहानी दे गया|

जावेद अ
ख़्तर

नहीं हैं अपनी कहानी में हम कहीं!

मिलते नहीं हैं अपनी कहानी में हम कहीं,
गायब हुए हैं जब से तेरी दास्ताँ से हम|

राजेश रेड्डी

ताऊ जी!

 

आज ताऊ जी के बारे में कुछ बात कर लेते हैं।

 

 

ताऊ जी, हमारे बहुत पहले छूटे हुए गांव के एक ऐसे कैरेक्टर हैं, जिनको शुरू से ही घूमना, विशेष रूप से शहर की रौनक देखना पसंद रहा है।

ताऊ जी जब घर में आते हैं तो थोड़ा बहुत गांव भी घर में आ जाता है, घर के बने ताज़ा गुड़ और देसी घी की गंध में लिपटा हुआ। हाँ घर में लोगों को कुछ समझाना पड़ता है कि वे अपनी आधुनिकता का, शहरीपन का प्रदर्शन थोड़ा कम करें, और अपने मन में सहेजकर रखे गए गांव को झाड़-पोंछकर कुछ हद तक जागृत करने का प्रयास करें।

हाँ यह भी है कि जब ताऊ जी वापस गांव लौटते हैं तब शहर में नए-नए प्रचलन में आए खिलौने भी साथ लेकर जाते हैं, उनके ऊपर गांव में कुछ खास ज़िम्मेदारी भी नहीं है, उनके बच्चे ही वहाँ का कामकाज संभालते हैं, (वैसे अब तो बहुत ज्यादा रहा भी नहीं है संभालने के लिए!), हाँ तो ताऊ जी जब यहाँ आते तब यहाँ बच्चे यह जानने को बेचैन रहते हैं कि गांव से क्या लेकर आए हैं और इसी प्रकार यहाँ से जो आधुनिक रंग-बिरंगी लाइट वाले खिलौने वो लेकर जाते थे, उनसे भी वहाँ कुछ दिन तक तो काफी रौनक रहती है, शायद कुछ युद्ध भी लड़े जाते हों।

ताऊ जी कुछ बातों को स्वीकार करने को तैयार ही नहीं होते, जैसे मुझे याद है कि जब नील आर्मस्ट्रॉन्ग के चांद पर पहुंचने की खबर आई थी तब उन्होंने यह माना ही नहीं कि कोई चांद पर चला जाएगा और वहाँ से नीचे धरती पर नहीं गिरेगा!

ताऊ जी किस्से बहुत अच्छे सुनाते हैं, जैसे अंग्रेजों के ज़माने में देहात के किसी व्यक्ति ने किस प्रकार उस इलाके की रानी को बचाया था, उसके किस्से वे सुनाते थे और आल्हा-ऊदल के किस्से भी वो कहानी में और वीरता भरे गीत के रूप में सुनाया करते थे। इसलिए पहले जब वे आते थे तब घर में वीर-रस का माहौल बन जाता था। बच्चे इसके लिए बेचैन रहते थे कि कब मौका मिले और वे ताऊ जी से वीरता की और कुछ रहस्य की भी रोचक कहानियां सुनें।

समय के साथ ताऊ जी का आना कुछ कम हो गया है, बच्चे भी अब उस उम्र के नहीं रहे कि वे उनसे कहानियां सुनें। वीरता की जगह उनकी रुचि अब आध्यात्म में बढ़ गई है। हर बार उनका आना कुछ अलग तरह से होता है, गांव की सूचनाएं भी ऐसी कि अब उनको सुनकर ज्यादा खुशी नहीं होती थी। जहाँ उनके आने पर हमें पहले गांव के भाईचारे की खबरें मिलती थीं, किस प्रकार सब मिल-जुलकर रहते थे, इसकी अनेक मिसाल पहले देखने को मिलती थीं। अब आते हैं तो ऐसी खबरें सुनाते हैं कि किसने किस पर मुकदमा किया हुआ है, किन लोगों के बीच जमकर मारपीट हुई। गांव में डॉक्टर की, शिक्षकों आदि की भले ही ठीक से कमाई न हो पा रही हो, लेकिन वकीलों को गांव से काफी कमाई की उम्मीद रहती है।

एक फर्क़ और पड़ा है, पहले आते थे तो उनके साथ पान-तंबाकू की व्यवस्था रहती थी, उसके बाद कुछ  वर्षों तक पान-तंबाकू वाली थैली की जगह उनके साथ दवाइयों की व्यवस्था होती थी, सुबह के लिए, दोपहर के लिए और शाम के लिए अलग-अलग टेब्लेट और कैप्सूल उनके साथ हुआ करते थे। लेकिन वो ज़माना भी अब गुज़र चुका है, अब ताऊ जी को दवाइयों से कोई उम्मीद नहीं रह गई है। अब उनके हाथ में सुमिरनी रहती थी और वे ईश्वर से ही लगन लगाए रहते थे।

जो ताऊ जी पहले किस्सागोई के लिए प्रसिद्ध थे, मौका मिलते ही कोई किस्सा छेड़ देते थे, अब कुछ गिने-चुने वाक्य ही उनके मुंह से निकलते हैं, जैसी ईश्वर की इच्छा!  कुछ प्रश्न पूछने पर अक्सर गहरी निगाहों से देखते रह जाते हैं अब, कुछ उत्तर देते-देते फिर रुक जाते हैं। अब कोई खबर उनको विचलित नहीं करती, जैसे वे एक प्रकार से अपनी अंतिम-यात्रा के लिए तैयार हैं और प्लेटफॉर्म पर धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा कर रहे हैं। और शायद उनके साथ ही हमारे सपनों का गांव भी अब अंतिम पड़ाव पर है। जैसे हम अपने शहरों में पुराने नाम सुनकर जानते हैं कि यहाँ कुछ गांव थे, धीरे-धीरे वे गांव शहर के विकास के लिए अपना अस्तित्व न्यौछावर करते जाते हैं।

बस आज ऐसे ही काल्पनिक ताऊ जी को, और इस बहाने छूटे हुए गांव के सुनहरे परिवेश को याद कर लिया।

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार।