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चोट खाते रहे गुनगुनाते रहे!

स्वर्गीय डॉ राही मासूम रज़ा साहब हिन्दी-उर्दू साहित्य के एक प्रमुख रचनाकार रहे हैं| वे कविता, शायरी और उपन्यास लेखन, सभी क्षेत्रों में समान रूप से सक्रिय थे और पाठकों, श्रोताओं के चहेते रहे हैं| उनको अनेक साहित्यिक और राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुए थे|



आज मैं डॉ राही मासूम रज़ा साहब की यह प्रसिद्ध गजल शेयर कर रहा हूँ-

अजनबी शहर के अजनबी रास्ते, मेरी तन्हाई पर मुस्कुराते रहे,
मैं बहुत देर तक यूं ही चलता रहा, तुम बहुत देर तक याद आते रहे|

ज़हर मिलता रहा ज़हर पीते रहे, रोज़ मरते रहे रोज़ जीते रहे,
ज़िंदगी भी हमें आज़माती रही, और हम भी उसे आज़माते रहे|

ज़ख़्म जब भी कोई ज़ेह्न-ओ-दिल पे लगा, ज़िंदगी की तरफ़ एक दरीचा खुला,
हम भी गोया किसी साज़ के तार हैं, चोट खाते रहे गुनगुनाते रहे|

कल कुछ ऐसा हुआ मैं बहुत थक गया, इसलिये सुन के भी अनसुनी कर गया,
इतनी यादों के भटके हुए कारवाँ, दिल के ज़ख़्मों के दर खटखटाते रहे|

सख़्त हालात के तेज़ तूफानों में , घिर गया था हमारा जुनून-ए-वफ़ा,
हम चिराग़े-तमन्ना जलाते रहे, वो चिराग़े-तमन्ना बुझाते रहे|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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