कशमकश-ए-ज़िंदगी से हम!

तंग आ चुके हैं कशमकश-ए-ज़िंदगी से हम,
ठुकरा न दें जहाँ को कहीं बे-दिली से हम|

साहिर लुधियानवी

कशमकश-ए-ज़िंदगी से हम!

तंग आ चुके हैं कशमकश-ए-ज़िंदगी से हम,
ठुकरा न दें जहाँ को कहीं बे-दिली से हम|

साहिर लुधियानवी

बेटी बेटे!

हमारी हिन्दी फिल्मों के माध्यम से हमको अनेक अमर गीत देने वाले स्वर्गीय शैलेन्द्र जी का आज एक गीत शेयर कर रहा हूँ| यह गीत फिल्म- बेटी-बेटे में फिल्माया गया| गीत में यही है कि किस प्रकार एक माँ अपने बेटे-बेटी को समझाती है कि आज का दिन तो बीत गया अब हमको कल की तैयारी करनी है|

लीजिए प्रस्तुत है शैलेन्द्र जी का यह गीत जो माँ की ममता और गरीबी के संघर्ष को भी बड़ी खूबी से अभिव्यक्त करता है –

आज कल में ढल गया
दिन हुआ तमाम
तू भी सो जा सो गई
रंग भरी शाम|

साँस साँस का हिसाब ले रही है ज़िन्दगी
और बस दिलासे ही दे रही है ज़िन्दगी
रोटियों के ख़्वाब से चल रहा है काम
तू भी सोजा ….

रोटियों-सा गोल-गोल चांद मुस्‍कुरा रहा
दूर अपने देश से मुझे-तुझे बुला रहा
नींद कह रही है चल, मेरी बाहें थाम
तू भी सोजा…

गर कठिन-कठिन है रात ये भी ढल ही जाएगी
आस का संदेशा लेके फिर सुबह तो आएगी
हाथ पैर ढूंढ लेंगे , फिर से कोई काम
तू भी सोजा…


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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रस्तों की धूल थे पहले!

जिनके नामों पे आज रस्ते हैं,
वे ही रस्तों की धूल थे पहले|

सूर्यभानु गुप्त

तुमसे नाराज़ तो नहीं हूँ मैं!

आज मैं फिर से अपने अत्यंत प्रिय कवि एवं नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जो मुझे अत्यंत प्रिय रहा है| शायद इस गीत का कुछ भाग मैंने पहले भी शेयर किया हो| यह गीत व्यक्ति के आशावाद और जीवट शक्ति को प्रबल अभिव्यक्ति देता है| परेशानियों से हार न मानने और संघर्ष करते जाने की ऊर्जा और उत्साह का गीत|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत-

फैली है दूर तक परेशानी
तिनके-सा तिरता हूँ, तो क्या है ?
तुमसे नाराज़ तो नहीं हूँ मैं|

आँसू का शिलालेख है जीवन
बिना पढ़ा, बिना छुआ
अन्धी बरसात बद्‍दुआओं की
नफ़रत का घना धुँआ,

मकड़ी के जाले-सी पेशानी
साथ लिए फिरता हूँ, तो क्या है ?
टूटी आवाज़ तो नहीं हूँ मैं|

मैं दूँगा भाग्य की लकीरों को
रोशनी सवेरे की
देखूँगा कितने दिन चलती है
दुश्मनी अँधेरे की,

जीऊँ क्यों माँग कर मेहरबानी
संकट में घिरता हूँ, तो क्या है ?
कोई सरताज तो नहीं हूँ मैं|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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वह झंकार है कविता!

नीलम सिंह जी एक सृजनशील कवियित्री हैं, उनके एक गीत की पंक्तियां मुझे अक्सर याद आती हैं-

धूप, धुआँ, पानी में,
ऋतु की मनमानी में,
सूख गए पौधे तो
मन को मत कोसना,
और काम सोचना|

आज प्रस्तुत है नीलम सिंह जी की एक और प्रभावशाली कविता, जो वास्तव में ‘कविता’ की क्षमता और प्रभाविता के बारे में ही है –

शब्दों के जोड़-तोड़ से
गणित की तरह
हल की जा रही है जो
वह कविता नहीं है|

अपनी सामर्थ्य से दूना
बोझ उठाते-उठाते
चटख गई हैं जिनकी हड्डियाँ
उन मज़दूरों के
ज़िस्म का दर्द है कविता
भूख से लड़ने के लिये
तवे पर पक रही है जो
उस रोटी की गंध है कविता|


उतार सकता है जो
ख़ुदा के चेहरे से भी नकाब
वो मज़बूत हाथ है कविता
जीती जा सकती है जिससे
बड़ी से बड़ी जंग
वह हथियार है कविता|

जिसके आँचल की छाया में
पलते हैं हमारी आँखों के
बेहिसाब सपने
उस माँ का प्यार है कविता
जिसके तुतलाते स्वर
कहना चाहते हैं बहुत कुछ
उस बच्चे की नई वर्णमाला का
अक्षर है कविता|


कविता एकलव्य का अँगूठा नहीं है
कि गुरु-दक्षिणा के बहाने
कटवा दिया जाय
वह अर्जुन का गाण्डीव है, कृष्ण का सुदर्शन चक्र ।

कविता नदी की क्षीण रेखा नहीं
समुद्र का विस्तार है
जो गुंजित कर सकती है
पूरे ब्रह्माण्ड को
वह झंकार है कविता ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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उधर रास्ता न था!

पत्थर सुलग रहे थे कोई नक्श-ए-पा न था,
हम जिस तरफ़ चले थे उधर रास्ता न था।

मुमताज़ राशिद

ठंडा लोहा – धर्मवीर भारती

एक बार फिर से आज मैं स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| धर्मवीर भारती जी हिन्दी के श्रेष्ठ उपन्यास एवं कहानी लेखक, निबंध लेखक, कवि और गीतकार के अलावा धर्मयुग के जाने-माने संपादक थे| आज मैं भारती जी की एक प्रसिद्ध रचना ‘ठंडा लोहा’ शेयर कर रहा हूँ|

लीजिए आज प्रस्तुत है धर्मवीर भारती जी जी की यह कविता –

ठंडा लोहा! ठंडा लोहा! ठंडा लोहा!
मेरी दुखती हुई रगों पर ठंडा लोहा!

मेरी स्वप्न भरी पलकों पर
मेरे गीत भरे होठों पर
मेरी दर्द भरी आत्मा पर
स्वप्न नहीं अब
गीत नहीं अब
दर्द नहीं अब
एक पर्त ठंडे लोहे की
मैं जम कर लोहा बन जाऊँ –
हार मान लूँ –
यही शर्त ठंडे लोहे की


ओ मेरी आत्मा की संगिनी!
तुम्हें समर्पित मेरी सांस सांस थी, लेकिन
मेरी सासों में यम के तीखे नेजे सा
कौन अड़ा है?
ठंडा लोहा!
मेरे और तुम्हारे भोले निश्चल विश्वासों को
कुचलने कौन खड़ा है ?
ठंडा लोहा!

ओ मेरी आत्मा की संगिनी!
अगर जिंदगी की कारा में
कभी छटपटाकर मुझको आवाज़ लगाओ
और न कोई उत्तर पाओ
यही समझना कोई इसको धीरे धीरे निगल चुका है
इस बस्ती में दीप जलाने वाला नहीं बचा है

सूरज और सितारे ठंडे
राहें सूनी
विवश हवाएं
शीश झुकाए खड़ी मौन हैं
बचा कौन है?
ठंडा लोहा! ठंडा लोहा! ठंडा लोहा!



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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गुर्बत में बड़े हुए हैं!

दुख के मुका़बिल खड़े हुए हैं,
हम गुर्बत में बड़े हुए हैं|

राजेश रेड्डी