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अरे, लखिय बाबुल मोरे!

अमीर खुसरो जी की एक रचना आज शेयर कर रहा हूँ| खुसरो जी एक सूफी, आध्यात्मिक कवि थे, और ऐसा भी माना जाता है की खड़ी बोली में कविता का प्रारंभ उनसे ही हुआ था| उनका जन्म 1253 ईस्वी में पटियाली में हुआ था और देहांत 1325 ईस्वी में दिल्ली में हुआ|

लीजिए प्रस्तुत है बेटी की विदाई के अवसर से जुड़ी, खुसरो जी की यह रचना, जो आज भी लोकप्रिय है-

काहे को ब्याहे बिदेस, अरे, लखिय बाबुल मोरे
काहे को ब्याहे बिदेस|

भैया को दियो बाबुल महले दो-महले
हमको दियो परदेस,
अरे, लखिय बाबुल मोरे|
काहे को ब्याहे बिदेस|


हम तो बाबुल तोरे खूँटे की गैयाँ
जित हाँके हँक जैहें
अरे, लखिय बाबुल मोरे|
काहे को ब्याहे बिदेस|

हम तो बाबुल तोरे बेले की कलियाँ
घर-घर माँगे हैं जैहें
अरे, लखिय बाबुल मोरे|
काहे को ब्याहे बिदेस|


कोठे तले से पलकिया जो निकली
बीरन में छाए पछाड़
अरे, लखिय बाबुल मोरे|
काहे को ब्याहे बिदेस|

हम तो हैं बाबुल तोरे पिंजरे की चिड़ियाँ
भोर भये उड़ जैहें
अरे, लखिय बाबुल मोरे|
काहे को ब्याहे बिदेस|


तारों भरी मैंने गुड़िया जो छोडी
छूटा सहेली का साथ
अरे, लखिय बाबुल मोरे|
काहे को ब्याहे बिदेस|

डोली का पर्दा उठा के जो देखा
आया पिया का देस
अरे, लखिय बाबुल मोरे|
काहे को ब्याहे बिदेस|


अरे, लखिय बाबुल मोरे
काहे को ब्याहे बिदेस|
अरे, लखिय बाबुल मोरे|



आज के लिए इतना ही
नमस्कार|
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