कैसा मौसम है कुछ नहीं खुलता!

कैसा मौसम है कुछ नहीं खुलता,
बूंदा-बांदी भी धूप भी है अभी|

अहमद फ़राज़

उँगलियों से फिसल रही है!

वो ढल रहा है तो ये भी रंगत बदल रही है,
ज़मीन सूरज की उँगलियों से फिसल रही है|

जावेद अख़्तर

किताबों को हटाकर देखो!

धूप में निकलो घटाओं में नहाकर देखो
ज़िन्दगी क्या है, किताबों को हटाकर देखो |

निदा फ़ाज़ली

न कहा हुआ न सुना हुआ!

कोई फूल धूप की पत्तियों में, हरे रिबन से बंधा हुआ।
वो ग़ज़ल का लहजा नया-नया, न कहा हुआ न सुना हुआ।

बशीर बद्र

मिलावट न करो छाँव में!

ऐ मेरे हम-सफ़रों तुम भी थाके-हारे हो,
धूप की तुम तो मिलावट न करो छाँव में|

क़तील शिफ़ाई

सूर्य और दीपनिष्ठा

एक श्रेष्ठ व्यक्ति और कवि जो सांसद भी रहे हैं और संसदीय राजभाषा समिति का एक सदस्य होने के नाते उन्होंने राजभाषा हिन्दी की प्रगति हेतु भी प्रयास किए हैं, ऐसे स्वर्गीय बालकवि बैरागी जी की तीन छोटी छोटी रचनाएं आज शेयर कर रहा हूँ| बैरागी जी का कविता पढ़ने का अपना अनूठा अंदाज़ था, जो सभी श्रोताओं को बरबस अपनी ओर आकर्षित करता था|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बालकवि बैरागी जी की यह रचनाएं–


सूर्य उवाच

आज मैंने सूर्य से बस ज़रा सा यूँ कहा
‘‘आपके साम्राज्य में इतना अँधेरा क्यूँ रहा ?’’
तमतमा कर वह दहाड़ा—‘‘मैं अकेला क्या करूँ ?
तुम निकम्मों के लिए मैं ही भला कब तक मरूँ ?
आकाश की आराधना के चक्करों में मत पड़ो
संग्राम यह घनघोर है, कुछ मैं लड़ूँ कुछ तुम लड़ो।’’

हैं करोड़ों सूर्य

हैं करोड़ों सूर्य लेकिन सूर्य हैं बस नाम के
जो न दें हमको उजाला वे भला किस काम के ?
जो रात भर लड़ता रहे उस दीप को दीजे दुआ
सूर्य से वह श्रेष्ठ है तुच्छ है तो क्या हुआ ?
वक्त आने पर मिला ले हाथ जो अँधियारे से
सम्बन्ध उनका कुछ नहीं है सूर्य के परिवार से।।

दीपनिष्ठा को जगाओ

यह घड़ी बिल्कुल नहीं है शांति और संतोष की
‘सूर्यनिष्ठा’ सम्पदा होगी गगन के कोष की
यह धरा का मामला है घोर काली रात है
कौन जिम्मेदार है यह सभी को ज्ञात है
रोशनी की खोज में किस सूर्य के घर जाओगे
‘दीपनिष्ठा’ को जगाओ अन्यथा मर जाओगे।।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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कट-कट के सहर तक पहुँची!

तुम तो सूरज के पुजारी हो तुम्हे क्या मालूम,
रात किस हाल में कट-कट के सहर तक पहुँची|

राहत इन्दौरी

रौशनी अपने मकान की!

औरों के घर की धूप उसे क्यूँ पसंद हो
बेची हो जिसने रौशनी अपने मकान की|

गोपालदास ‘नीरज’

धूप चली मीलों तक!

ज़िंदगी यूं भी जली, यूं भी जली मीलों तक,
चाँदनी चार क‍़दम, धूप चली मीलों तक|

कुंवर बेचैन

तेरे साये में आ कर देखूं!

तेरे बारे में सुना ये है के तू सूरज है
मैं ज़रा देर तेरे साये में आ कर देखूं |

राहत इन्दौरी