चराग़ों को आफ़्ताब करूँ!

अब अपनी रूह के छालों का कुछ हिसाब करूँ,
मैं चाहता था चराग़ों को आफ़्ताब करूँ|

राहत इन्दौरी

सूरज की है जितनी अज़्मत!

आपकी नज़रों में सूरज की है जितनी अज़्मत,
हम चराग़ों का भी उतना ही अदब करते हैं|

राहत इन्दौरी

सिपाही मोम के थे घुल के आ गए!

सूरज से जंग जीतने निकले थे बेवक़ूफ़,
सारे सिपाही मोम के थे घुल के आ गए|

राहत इन्दौरी

बुझने दो उनको हवा तो चले!

चाँद सूरज बुज़ुर्गों के नक़्श-ए-क़दम,
ख़ैर बुझने दो उनको हवा तो चले|

कैफ़ी आज़मी

दस्त-ए-साक़ी में आफ़्ताब आए!

बाम-ए-मीना से माहताब उतरे,
दस्त-ए-साक़ी में आफ़्ताब आए|

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

हाथ लगा तो निचोड़ दूँगा उसे!

पसीने बाँटता फिरता है हर तरफ़ सूरज,
कभी जो हाथ लगा तो निचोड़ दूँगा उसे|

राहत इंदौरी

धूप को बरगद कोई मिला!

दरिया के पास धूप को बरगद कोई मिला,
दरिया के पास धूप ज़रा काकुली हुई|

सूर्यभानु गुप्त

झुलस रहे हैं यहाँ छाँव बाँटने वाले!

झुलस रहे हैं यहाँ छाँव बाँटने वाले,
वो धूप है कि शजर इलतिजाएँ करने लगे|

राहत इन्दौरी

हवाएँ करने लगे!

लहूलोहान पड़ा था ज़मीं पे इक सूरज,
परिन्दे अपने परों से हवाएँ करने लगे|

राहत इन्दौरी

कुछ दूर माहताब के साथ!

ज़मीन तेरी कशिश खींचती रही हमको,
गए ज़रूर थे कुछ दूर माहताब के साथ|

शहरयार